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  "type": "article",
  "title": "झुमरी तिलैया के दिलीप कुमार ने बदली अपनी तकदीर, बेकरी व्यवसाय से कमा रहे हैं हर महीने लाखों रुपये",
  "summary": "कोडरमा के झुमरी तिलैया निवासी दिलीप कुमार ने कभी ड्राइवर की नौकरी की थी और आज सरकारी योजना की मदद से खुद की बेकरी इकाई चलाकर आत्मनिर्भर बन चुके हैं।",
  "content": "झारखंड के कोडरमा जिले के अंतर्गत आने वाले झुमरी तिलैया शहर के बिशुनपुर रोड के रहने वाले दिलीप कुमार की सफलता की कहानी उन तमाम युवाओं के लिए एक प्रेरणा है जो अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारना चाहते हैं। एक समय ऐसा था जब वह एक बेकरी फैक्ट्री में गाड़ी चलाने का काम करते थे और पूरे महीने की कड़ी मेहनत के बाद उन्हें बमुश्किल 10 हजार रुपये मिलते थे। परिवार के भरण-पोषण और घर की तमाम जिम्मेदारियों को संभालते हुए उस छोटी सी आय में गुजारा करना उनके लिए बेहद संघर्षपूर्ण साबित हो रहा था। किसी के अधीन काम करने की बजाय उन्होंने खुद का स्वतंत्र व्यवसाय शुरू करने का पक्का मन बनाया और यहीं से उनके जीवन का नया अध्याय शुरू हुआ। उन्होंने सही दिशा में प्रयास करते हुए सरकारी योजनाओं की जानकारी जुटाई और आज वह उसी बेकरी क्षेत्र में अपनी खुद की इकाई के मालिक बनकर गर्व से जीवन जी रहे हैं।\n\nपीएमएफएमई योजना से मिली बड़ी मदद\nअपनी इस कारोबारी यात्रा के बारे में उन्होंने विशेष बातचीत में विस्तार से जानकारी साझा करते हुए बताया कि उन्होंने अपनी खुद की खाद्य प्रसंस्करण इकाई स्थापित करने का फैसला किया था। इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना के तहत ऑनलाइन माध्यम से आवेदन प्रक्रिया पूरी की। विभाग द्वारा उनकी बेकरी इकाई की एक विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार की गई। उन्होंने बताया कि इस पूरे उद्योग को स्थापित करने में कुल लागत करीब 7 लाख रुपये आई थी। स्थानीय बैंक के जरिए उन्हें इसके लिए ऋण उपलब्ध कराया गया और इस केंद्रीय योजना के प्रावधानों के तहत उन्हें कुल लागत पर 35 प्रतिशत की भारी सब्सिडी का लाभ भी प्राप्त हुआ। अपनी इस बेकरी के सुचारू संचालन के लिए उन्हें आवश्यक मशीनरी बिहार के दरभंगा शहर के एक अधिकृत सप्लायर से प्राप्त हुई। वर्तमान में उनकी इस इकाई में इलेक्ट्रॉनिक भट्टी यानी ओवन, मिक्सिंग मशीन, ब्रेड काटने वाली मशीन, बेकिंग ट्रे और अन्य तमाम छोटे-बड़े उपकरण लगाए गए हैं। इन आधुनिक और उपयोगी मशीनों की सहायता से उनकी यूनिट में विभिन्न प्रकार के स्वादिष्ट खाद्य उत्पादों का निर्माण किया जाता है।\n\nविभिन्न बेकरी उत्पादों का होता है निर्माण\nउनकी इस बेकरी यूनिट में रोजाना कई प्रकार की चीजें तैयार की जाती हैं जिनमें मुख्य रूप से टोस्ट, ताज़ा ब्रेड, क्रीम केक, मीठी पापड़ी और अलग-अलग तरह के बिस्किट शामिल हैं। यहाँ बनने वाले इन सभी तैयार उत्पादों की आपूर्ति स्थानीय स्तर पर की जाती है और कोडरमा जिले के विभिन्न बाजारों की खुदरा दुकानों तक इन्हें पहुँचाया जाता है। उन्होंने बताया कि उनकी बेकरी में हर रोज लगभग 60 से 70 किलोग्राम खाद्य सामग्री का उत्पादन होता है। इन उत्पादों की दैनिक बिक्री से उन्हें रोजाना करीब 5 से 6 हजार रुपये तक का कारोबार मिल जाता है। इस प्रकार उनकी इस बेकरी से हर महीने औसतन डेढ़ से दो लाख रुपये तक का कुल कारोबार आसानी से हो जाता है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति काफी मजबूत हुई है।\n\nपारिवारिक सहयोग से चल रहा है पूरा काम\nइस व्यवसाय की एक सबसे बड़ी और खास विशेषता यह है कि फिलहाल दिलीप कुमार ने बाहर से किसी पेशेवर कारीगर या मजदूर को वेतन पर काम पर नहीं रखा है। उनके पिता, सगे भाई और परिवार के अन्य नजदीकी सदस्य इस बेकरी के संचालन में उनका पूरा हाथ बंटाते हैं। घर के सभी लोग मिलकर विभिन्न प्रकार के खाद्य उत्पादों को तैयार करने की प्रक्रिया में सहयोग करते हैं। इसके अलावा, बनकर तैयार होने वाले सामान की मार्केटिंग करने और उसे समय पर विभिन्न दुकानों तक पहुँचाने की जिम्मेदारी भी परिवार के सदस्य ही आपस में मिलकर पूरी निष्ठा के साथ संभालते हैं।\n\nइसका आप पर असर\nयह सफलता की कहानी उन लोगों के लिए बेहद खास है जो कम पूंजी में खुद का रोजगार शुरू करना चाहते हैं।\n\n• भारत में: केंद्र सरकार की सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम योजना देश भर के छोटे उद्यमियों को वित्तीय सहायता और सब्सिडी का लाभ देती है। इस तरह की योजनाओं से जुड़कर पारंपरिक हुनर रखने वाले लोग बिना बड़े जोखिम के अपना खुद का कारोबार खड़ा कर सकते हैं।\n• कोडरमा में: स्थानीय युवाओं और श्रमिकों के लिए यह उदाहरण साबित करता है कि सरकारी ऋण और तकनीकी सहायता का सही उपयोग करके स्थानीय स्तर पर आय के नए स्रोत तैयार किए जा सकते हैं। इससे जिले में छोटे उद्योगों के विकास को बढ़ावा मिलता है और बेरोजगारी कम होती है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nकम आय वाली नौकरी से निकलकर खुद का व्यवसाय स्थापित करने का यह निर्णय सुनियोजित सरकारी सहायता के माध्यम से संभव हो सका।\n\n• सीमित आय का संकट: ड्राइवर के रूप में मिलने वाले मात्र 10 हजार रुपये मासिक वेतन से परिवार का भरण-पोषण करना अत्यधिक कठिन था, जिसने उन्हें नए विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित किया।\n• सरकारी योजना का लाभ: प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम योजना के तहत आवेदन करने पर बैंक ऋण और 35 प्रतिशत की भारी सब्सिडी मिलने से शुरुआती पूंजी की बड़ी बाधा दूर हो गई।\n• पारिवारिक सहयोग: बाहरी कारीगरों को रखने के बजाय परिवार के सदस्यों द्वारा उत्पादन और मार्केटिंग खुद संभालने से लागत में कमी आई और व्यवसाय तेजी से आगे बढ़ा।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. दिलीप कुमार पहले क्या काम करते थे?\nवह पहले एक बेकरी फैक्ट्री में वाहन चालक के रूप में काम करते थे।\n\n2. उन्हें नौकरी में हर महीने कितने रुपये मिलते थे?\nमहीने भर की कड़ी मेहनत के बाद उन्हें 10 हजार रुपये मिलते थे।\n\n3. उन्होंने अपनी बेकरी किस योजना के तहत शुरू की?\nउन्होंने प्रधानमंत्री सूक्ष्म खाद्य प्रसंस्करण उद्यम उन्नयन योजना के तहत आवेदन किया था।\n\n4. उनकी बेकरी इकाई की कुल लागत कितनी थी?\nउनकी इकाई की कुल लागत करीब 7 लाख रुपये थी।\n\n5. उन्हें योजना के तहत कितने प्रतिशत सब्सिडी मिली?\nउन्हें इस योजना के तहत 35 प्रतिशत सब्सिडी का लाभ मिला।\n\n6. बेकरी की मशीनें कहाँ से मंगाई गई थीं?\nबेकरी संचालन के लिए आवश्यक मशीनें दरभंगा के एक सप्लायर से मिली थीं।\n\n7. उनकी बेकरी में कौन-कौन से उत्पाद तैयार होते हैं?\nउनकी बेकरी में टोस्ट, ब्रेड, क्रीम केक, मीठी पापड़ी और बिस्किट तैयार किए जाते हैं।\n\n8. उनकी बेकरी से महीने में कितना कारोबार हो जाता है?\nबेकरी से महीने में लगभग डेढ़ से दो लाख रुपये का कारोबार हो जाता है।\n\nप्रेरणा और सबक\nदिलीप कुमार की यह यात्रा उन सभी लोगों के लिए एक ठोस सबक है जो अपने दम पर कुछ बड़ा करना चाहते हैं।\n\n• नौकरी से बेहतर उद्यमिता: सीमित वेतन पर जीवन गुजारने के बजाय अपनी क्षमता को पहचानकर खुद का काम शुरू करना दीर्घकालिक रूप से अधिक फायदेमंद साबित हो सकता है।\n• सरकारी योजनाओं का सदुपयोग: सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न स्वरोजगार और सब्सिडी योजनाओं की समय पर जानकारी जुटाकर उनका लाभ उठाना चाहिए।\n• पारिवारिक एकजुटता की ताकत: व्यवसाय के शुरुआती दौर में बाहरी खर्चों को कम करने के लिए परिवार के सदस्यों के श्रम और सहयोग का सही उपयोग करना चाहिए।\n• कड़ी मेहनत का विकल्प नहीं: फैक्ट्री में ड्राइवर के रूप में किया गया संघर्ष और बाद में व्यवसाय में दी गई मेहनत ही सफलता की असली कुंजी है।",
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  "category": "झारखंड",
  "publishedAt": "2026-09-25",
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