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  "type": "article",
  "title": "झुमरी तिलैया में पीजी डिग्रीधारक ममता कुमारी ने सिलाई सीखकर शुरू किया बुटीक, हर महीने कमा रहीं 15 हजार रुपये",
  "summary": "कोडरमा के झुमरी तिलैया की ममता कुमारी ने खादी बोर्ड से मिले स्टाइपेंड के 27 हजार रुपये जोड़कर अपना बुटीक शुरू किया, जहां से अब वे हर महीने 15 हजार रुपये कमाकर अन्य महिलाओं को भी हुनरमंद बना रही हैं।",
  "content": "उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद पारंपरिक नौकरियों के पीछे भागने के बजाय स्वरोजगार की राह चुनना किसी भी युवा के लिए एक बड़ा फैसला होता है। कोडरमा जिले के अंतर्गत झुमरी तिलैया शहर के बजरंग नगर इलाके में रहने वाली ममता कुमारी ने इसी सोच को हकीकत में बदलकर दिखाया है। पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने किसी दफ्तर में नौकरी तलाशने के बजाय खुद का उद्यम खड़ा करने का संकल्प लिया। आज वे न केवल अपने हुनर के बलबूते आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन चुकी हैं, बल्कि अपने इलाके की अन्य महिलाओं को भी अपने पैरों पर खड़े होने के लिए लगातार प्रेरित कर रही हैं।\n\nखादी ग्रामोद्योग से मिली छह महीने की निशुल्क ट्रेनिंग\nममता कुमारी की इस कामयाबी की शुरुआत एक सरकारी कौशल विकास कार्यक्रम से हुई। उन्होंने झारखंड राज्य खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड द्वारा संचालित सिलाई प्रशिक्षण केंद्र से छह महीने का निशुल्क प्रशिक्षण हासिल किया। यह केंद्र झुमरी तिलैया में तिलैया थाना के बिल्कुल नजदीक स्थित खादी भवन में संचालित होता है। इस प्रशिक्षण की सबसे अहम बात यह थी कि सीखने के साथ-साथ प्रशिक्षुओं को आर्थिक संबल भी दिया जा रहा था। केंद्र में प्रतिदिन 150 रुपये के हिसाब से स्टाइपेंड का प्रावधान था। छह महीने की इस पूरी प्रशिक्षण अवधि के दौरान ममता को कुल मिलाकर करीब 27 हजार रुपये की राशि प्राप्त हुई।\n\nअधिकतर लोग इस तरह के भत्ते को रोजमर्रा के खर्चों में लगा देते हैं, लेकिन ममता ने दूरगामी योजना बनाई। उन्होंने इस पूरी रकम को फिजूलखर्ची से बचाकर अपने आने वाले कल को संवारने में लगाया। स्टाइपेंड के इन 27 हजार रुपयों से उन्होंने सिलाई मशीन खरीदी और अपना स्वतंत्र काम शुरू करने के लिए बुनियादी उपकरण और ढांचा तैयार किया। इस तरह सरकारी भत्ते की एक-एक पाई उनके नए उद्यम की शुरुआती पूंजी बन गई।\n\nपारिवारिक तालमेल और पति का मिला पूरा सहयोग\nपोस्ट ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद ममता के मन में यह स्पष्ट था कि उन्हें आत्मनिर्भर बनना है और खुद का कोई काम शुरू करना है। इसी दौरान उन्हें तिलैया थाना के पास खादी भवन में चलने वाले निशुल्क प्रशिक्षण सत्र की जानकारी मिली। ममता ने इस बारे में अपने पति रवि पासवान से विस्तार से चर्चा की। उनके पति ने न केवल उनके इस विचार का स्वागत किया, बल्कि उन्हें इस कार्यक्रम में शामिल होने के लिए पूरा प्रोत्साहन भी दिया।\n\nसिलाई सीखने के दौरान उनके पति का सहयोग केवल बातों तक सीमित नहीं रहा। वे रोजाना ममता को प्रशिक्षण केंद्र तक बाइक से छोड़ने जाते थे और शाम को जब सत्र खत्म होता था, तो उन्हें वापस घर लाते थे। परिवार और जीवनसाथी से मिले इस मजबूत सहारे ने ममता के आत्मविश्वास को कई गुना बढ़ा दिया। नतीजतन, उन्होंने पूरे छह महीने तक बिना किसी रुकावट के पूरी लगन और अनुशासन के साथ सिलाई और कटाई के बारीक गुर सीखे।\n\nपानी टंकी के पास शुरू हुआ बुटीक सेंटर\nप्रशिक्षण का पाठ्यक्रम सफलतापूर्वक पूरा करने के बाद ममता ने जमीनी स्तर पर काम शुरू करने में देर नहीं की। उन्होंने शहर में पानी टंकी के समीप ममता बुटीक सेंटर नाम से अपने प्रतिष्ठान की नींव रखी। इस केंद्र पर महिलाओं के विभिन्न प्रकार के परिधान तैयार किए जाते हैं, जिनमें डिजाइनर सूट, लहंगा, ब्लाउज और आधुनिक शैलियों के कपड़े प्रमुख हैं। अपनी बेहतरीन फिनिशिंग और ग्राहकों की पसंद का ध्यान रखने के कारण धीरे-धीरे पूरे इलाके में उनके काम की चर्चा होने लगी।\n\nममता के अनुसार, आम दिनों में वे रोजाना दो से तीन पोशाकें आसानी से तैयार कर लेती हैं। वहीं शादी-ब्याह और त्योहारों के मौसम में काम की मांग कई गुना बढ़ जाती है और बुटीक पर आर्डरों की भरमार रहती है। उन्होंने अपने काम को आधुनिक दौर की जरूरतों के मुताबिक ढाला है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जैसे इंस्टाग्राम पर जो नए फैशन और डिजाइन ट्रेंड करते हैं, ग्राहक अक्सर उनकी तस्वीरें लेकर बुटीक पहुंचते हैं। ममता उन ऑनलाइन डिजाइनों को समझकर ग्राहकों की मांग के अनुसार परिधान सिलकर तैयार करती हैं।\n\nघरेलू जिम्मेदारियों के बीच हर माह 15 हजार की बचत\nममता की दिनचर्या उन तमाम महिलाओं के लिए एक मिसाल है जो परिवार और काम के बीच संतुलन बनाने की चुनौती से जूझती हैं। वे सुबह सवेरे उठकर अपने घर के सारे कामकाज निपटाती हैं और बच्चों की देखभाल पूरी करती हैं। इसके बाद वे अपने बुटीक पर पहुंच जाती हैं। वहां शाम तक पूरी एकाग्रता के साथ सिलाई का काम करती हैं और फिर समय पर घर लौटकर दोबारा परिवार की जिम्मेदारियों में हाथ बंटाती हैं।\n\nफिलहाल वे अपने इस बुटीक का सारा कामकाज अकेले ही संभालती हैं। दुकान और सामग्री से जुड़े तमाम खर्च निकालने के बाद वे हर महीने करीब 15 हजार रुपये की शुद्ध आमदनी अर्जित कर लेती हैं। त्योहारी सीजन में जब ऑर्डरों की संख्या बढ़ती है, तब उनकी यह मासिक कमाई और अधिक हो जाती है। इस कमाई से वे न केवल अपनी व्यक्तिगत जरूरतें पूरी करती हैं, बल्कि अपने बच्चों की छोटी-बड़ी फरमाइशें पूरी करने और घर के बजट को सहारा देने में भी बड़ा योगदान देती हैं।\n\nअन्य महिलाओं को हुनरमंद बनाने की नई मुहिम\nखुद आर्थिक रूप से मजबूत होने के बाद ममता अब इस सफलता को समाज के साथ साझा कर रही हैं। वे चाहती हैं कि बजरंग नगर और आसपास के इलाकों की अन्य लड़कियां और गृहिणियां भी आत्मनिर्भर बनें। इसके लिए उन्होंने अपने बुटीक परिसर में ही अतिरिक्त सिलाई मशीनों की व्यवस्था की है। जो महिलाएं या युवतियां सिलाई का काम सीखने की इच्छुक हैं, उन्हें वे वहां बाकायदा प्रशिक्षण दे रही हैं। ममता का दृढ़ विश्वास है कि यदि किसी महिला के पास कोई व्यावहारिक हुनर हो, तो वह घर-गृहस्थी की जिम्मेदारियों को निभाते हुए भी समाज में अपनी स्वतंत्र पहचान बना सकती है और परिवार को आर्थिक मजबूती दे सकती है।\n\nइसका आप पर असर\nसरकारी कौशल विकास योजनाओं से मिलने वाले स्टाइपेंड का सही वित्तीय उपयोग करके महिलाएं घर के पास ही टिकाऊ स्वरोजगार स्थापित कर सकती हैं।\n\n• भारत में: खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड जैसी संस्थाओं के निशुल्क प्रशिक्षण और वजीफे का लाभ उठाकर शिक्षित युवा बिना बड़े कर्ज के अपना काम शुरू कर सकते हैं। यह मॉडल ग्रामीण और छोटे शहरों के युवाओं को नौकरी तलाशने वाले के बजाय आत्मनिर्भर उद्यमी बनने का व्यावहारिक मार्ग दिखाता है।\n• कोडरमा में: झुमरी तिलैया और आसपास के क्षेत्रों की गृहिणियां और युवतियां ममता बुटीक सेंटर या स्थानीय खादी भवन से सिलाई सीखकर अपनी आमदनी का साधन बना सकती हैं। इससे स्थानीय महिलाओं को घर के कामकाज के साथ 10 से 15 हजार रुपये मासिक कमाने का सुलभ अवसर मिलता है।\n• पारिवारिक वित्तीय स्थिरता: परिवार की महिलाओं द्वारा घरेलू जिम्मेदारियों के साथ नियमित कमाई करने से बच्चों की शिक्षा और बुनियादी जरूरतों में सीधा संबल मिलता है। इससे एकल आय पर निर्भर परिवारों पर आर्थिक दबाव काफी कम हो जाता है।\n• स्थानीय स्तर पर रोजगार: छोटे शहरों में बुटीक और परिधान निर्माण जैसे काम बढ़ने से स्थानीय स्तर पर ही नए हुनरमंद कारीगरों के लिए रोजगार और सीखने के अवसर पैदा होते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nयह पहल उच्च शिक्षा के बाद बेरोजगारी के सामने घुटने टेकने के बजाय सरकारी कौशल कार्यक्रमों के उपयोग और परिवार के सकारात्मक सहयोग से संभव हुई।\n\n• स्वरोजगार का निर्णय: पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा करने के बाद पारंपरिक नौकरियों की सीमित उपलब्धता और आत्मनिर्भर बनने की इच्छा ने ममता कुमारी को खुद का व्यवसाय शुरू करने के लिए प्रेरित किया।\n• सरकारी सहायता का लाभ: तिलैया थाना के पास स्थित खादी भवन में संचालित झारखंड राज्य खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड के छह महीने के निशुल्क प्रशिक्षण और दैनिक 150 रुपये के स्टाइपेंड ने प्रारंभिक वित्तीय रुकावट को दूर कर दिया।\n• परिवार का समर्थन: पति रवि पासवान द्वारा प्रशिक्षण के दौरान दिए गए दैनिक सहयोग और मानसिक संबल ने उन्हें बिना किसी बाधा के छह महीने का पाठ्यक्रम पूरा करने में मदद की।\n• बचत का पुनर्नििवेश: स्टाइपेंड के मिले 27 हजार रुपये को खर्च करने के बजाय सिलाई मशीन और बुटीक सेटअप में लगाने की समझदारी ने उन्हें तुरंत काम शुरू करने में सक्षम बनाया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. ममता कुमारी कहां की रहने वाली हैं और उनकी शैक्षणिक योग्यता क्या है?\nममता कुमारी कोडरमा जिले के झुमरी तिलैया शहर स्थित बजरंग नगर की निवासी हैं और उन्होंने पोस्ट ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी की है।\n\n2. ममता कुमारी ने सिलाई का प्रशिक्षण कहां से प्राप्त किया?\nउन्होंने झुमरी तिलैया में तिलैया थाना के पास स्थित खादी भवन में झारखंड राज्य खादी एवं ग्रामोद्योग बोर्ड द्वारा संचालित केंद्र से छह महीने का निशुल्क प्रशिक्षण लिया।\n\n3. प्रशिक्षण के दौरान ममता को कितना स्टाइपेंड मिला था?\nउन्हें 150 रुपये प्रतिदिन के हिसाब से छह महीने की पूरी प्रशिक्षण अवधि में कुल करीब 27 हजार रुपये का स्टाइपेंड मिला।\n\n4. ममता ने स्टाइपेंड के पैसों का क्या उपयोग किया?\nउन्होंने इस 27 हजार रुपये की राशि से सिलाई मशीन खरीदी और पानी टंकी के पास ममता बुटीक सेंटर शुरू करने के लिए जरूरी सेटअप तैयार किया।\n\n5. ममता बुटीक सेंटर से ममता कुमारी हर महीने कितनी कमाई करती हैं?\nसभी खर्च निकालने के बाद वे हर महीने करीब 15 हजार रुपये की शुद्ध आमदनी कमाती हैं, जो त्योहारों के सीजन में और बढ़ जाती है।\n\n6. ममता कुमारी के इस सफर में उनके परिवार का क्या सहयोग रहा?\nउनके पति रवि पासवान ने उनके फैसले का समर्थन किया और छह महीने तक उन्हें रोजाना प्रशिक्षण केंद्र लाने और ले जाने में सहयोग किया।\n\nप्रेरणा और सबक\nममता कुमारी की सफलता दर्शाती है कि सीमित साधनों और भत्तों के अनुशासित निवेश से एक गृहिणी भी सफल उद्यमी बन सकती है।\n\n• स्टाइपेंड को पूंजी बनाएं: प्रशिक्षण के दौरान मिलने वाले वजीफे या छोटी बचत को तात्कालिक उपभोग में खर्च करने के बजाय अपने काम के उपकरण खरीदने में लगाना चाहिए।\n• पारिवारिक सामंजस्य से सफलता: घर की जिम्मेदारियों और व्यावसायिक काम के बीच सुनियोजित समय प्रबंधन रखकर बिना किसी समझौते के उद्यम चलाया जा सकता है।\n• आधुनिक मांग से कदमताल: सोशल मीडिया और इंस्टाग्राम पर दिखने वाले नए ट्रेंड्स को अपने काम में शामिल करके छोटे शहरों में भी ग्राहकों को तेजी से आकर्षित किया जा सकता है।\n• हुनर को आगे बढ़ाना: अपनी सफलता के बाद समुदाय की दूसरी महिलाओं को भी प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बनाना सच्ची सामाजिक प्रगति है।",
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  "category": "झारखंड",
  "publishedAt": "2026-10-09",
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