# कल्याणकोचा के दिलशान की संघर्ष भरी दास्तान: घने जंगलों से सूखी लकड़ियां चुनकर चलाते हैं परिवार की सांसें

> झारखंड के कोवाली प्रखंड स्थित कल्याणकोचा गांव के दिलशान हर सुबह 5 बजे साइकिल से जंगल पहुंचकर सूखी लकड़ियां चुनते हैं और बाजार में बेचकर प्रतिदिन 350 से 400 रुपये कमाते हैं।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-10-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/kalyankocha-ke-dilshan-ki-sngharsha-bhari-dastana-ghane-jngalon-se-sukhi-lakariyan-chunakara-chalate-hain-parivara-ki-sansen-49565 · **Language:** Hindi
**Tags:** जमशेदपुर, झारखंड, कल्याणकोचा, कोवाली, ग्रामीण आजीविका, वन संपदा, दैनिक मजदूर, सूखी लकड़ी

झारखंड के वनांचल क्षेत्रों में आज भी प्रकृति और मानव जीवन का अटूट रिश्ता कायम है। तकनीकी विकास और शहरीकरण के इस दौर में जहां ग्रामीण युवा रोजगार की तलाश में बड़े शहरों का रुख कर रहे हैं, वहीं जमशेदपुर के निकटवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में कई परिवार अब भी पारंपरिक वनाधारित संसाधनों के जरिए अपना जीवनयापन कर रहे हैं। इन इलाकों में रहने वाले जनजातीय और ग्रामीण समुदाय के लोग किसी औपचारिक नौकरी या बड़े कारोबार के अभाव में शारीरिक परिश्रम को ही अपनी आजीविका का संबल बनाए हुए हैं। सुबह की पहली किरण फूटने से पहले ही ये लोग अपनी साधारण साइकिलों के साथ वनों की ओर रवाना हो जाते हैं, ताकि दिन ढलने से पूर्व अपनी मेहनत को बाजार में ले जाकर दो वक्त की रोटी का प्रबंध कर सकें।

## सुबह 5 बजे से शुरू होती है आजीविका की कठिन डगर
जमशेदपुर से सटे कोवाली प्रखंड के अंतर्गत आने वाले कल्याणकोचा गांव के निवासी दिलशान की दिनचर्या इस जमीनी संघर्ष की स्पष्ट तस्वीर पेश करती है। दिलशान हर रोज तड़के करीब 5 बजे अपने घर से साइकिल लेकर निकल पड़ते हैं। उनका गंतव्य गांव से दूर स्थित सघन जंगल होता है, जहां जमीन पर गिरी हुई सूखी लकड़ियों की तलाश की जाती है। जंगल के भीतरी और दुर्गम हिस्सों तक पहुंचना अपने आप में जोखिम और थकान भरा काम होता है। वहां जमीन पर बिखरी लकड़ियों को खोजना, उन्हें छांटना और फिर एक जगह इकट्ठा करना शारीरिक रूप से बेहद थका देने वाली प्रक्रिया है।

## मेहनत के दो से तीन घंटे और दो फीट के टुकड़ों की तैयारी
जंगल के भीतर पहुंचकर सूखी लकड़ियों को बटोरने और उन्हें साइकिल पर व्यवस्थित ढंग से बांधने में दिलशान को नियमित रूप से दो से तीन घंटे का कड़ा समय लगता है। इस दौरान वह केवल सूखी और गिरी हुई डालियों को ही एकत्र करते हैं। जंगल से लकड़ियां जुटाने के बाद उन्हें लगभग दो फीट के निश्चित आकार में काटा जाता है। लकड़ियों को इस विशेष नाप में काटने के पीछे एक व्यावहारिक कारण है। दरअसल, ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में रहने वाले ग्राहक इन लकड़ियों का उपयोग घरेलू चूल्हों में भोजन पकाने और पानी गर्म करने के लिए करते हैं। दो फीट लंबे टुकड़े साधारण मिट्टी के चूल्हों में आसानी से समा जाते हैं, जिससे खरीदारों को इन्हें जलाने में कोई असुविधा नहीं होती।

## पूरे दिन की मशक्कत और 400 रुपये तक की सीमित आय
लकड़ियों का गट्ठर अपनी साइकिल के दोनों तरफ और करियर पर मजबूती से लादने के बाद दिलशान स्थानीय बाजार की ओर प्रस्थान करते हैं। साइकिल पर भारी वजन संतुलित करते हुए कई किलोमीटर का सफर तय करना आसान नहीं होता। बाजार पहुंचने पर वे ग्राहकों की प्रतीक्षा करते हैं। दिलशान के अनुसार, पूरी साइकिल भरकर सूखी लकड़ी बेचने के बाद उन्हें लगभग 350 से 400 रुपये की प्राप्ति होती है। सुबह 5 बजे से दोपहर तक चलने वाले इस भारी श्रमसाध्य कार्य के बदले मिलने वाला यह पारिश्रमिक काफी सीमित है। हालांकि, मौजूदा परिस्थितियों में यही दैनिक आमदनी उनके परिवार के भरण-पोषण और अनिवार्य खर्चों का एकमात्र सहारा बनती है।

## सीमित आवश्यकताओं के बीच प्रकृति पर आधारित जीवनशैली
कम आमदनी और अत्यधिक शारीरिक मेहनत के बावजूद दिलशान इस काम को पूरी निष्ठा से करते हैं। उनका मानना है कि वनों के आसपास बसे ग्रामीणों के लिए जंगल हमेशा से जीवन रक्षक की भूमिका निभाते आए हैं। ग्रामीण अंचलों में जीवनशैली बेहद सादी होती है और दैनिक जरूरतें भी सीमित रहती हैं, जिसके चलते 350 से 400 रुपये की इस दैनिक आय से वे अपनी गृहस्थी की गाड़ी खींचने का प्रयास करते हैं। दिलशान का यह संघर्ष केवल एक व्यक्ति की कहानी नहीं है, बल्कि यह उन तमाम अनाम श्रमजीवियों का प्रतिनिधित्व करता है जो किसी शिकायत के बिना प्रतिदिन प्रकृति की गोद से अपनी रोजी-रोटी तलाशते हैं।

## इसका आप पर असर
यह समाचार दर्शाता है कि ग्रामीण और वनांचल क्षेत्रों में गैर-कृषि औपचारिक रोजगार की कमी के चलते परिवार अब भी ईंधन के पारंपरिक व्यापार पर निर्भर हैं।

- **झारखंड में:** ग्रामीण इलाकों में पारंपरिक ईंधन की उपलब्धता उन कमजोर तबकों को जीने का साधन देती है जो पूरी तरह बाजार की गैस सिलेंडरों पर निर्भर नहीं हो सकते। यह स्थिति ग्रामीण कौशल विकास और स्थानीय स्तर पर टिकाऊ रोजगार सृजन की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करती है।
- **भारत में:** देश भर के असंगठित वन श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं और दुर्घटना बीमा का दायरा बढ़ाना आवश्यक है। नीति निर्माताओं के लिए यह जरूरी है कि वे ऐसे हाशिए पर खड़े परिवारों के लिए वैकल्पिक आय के स्रोत तैयार करें।
- **घरेलू उपभोक्ताओं के लिए:** शहरी और उपनगरीय उपभोक्ता जो चूल्हे पर निर्भर हैं, उन्हें अपेक्षाकृत सस्ता खाना पकाने का ईंधन मिलता रहता है। इससे एलपीजी कीमतों के उतार-चढ़ाव के बीच उनके घरेलू बजट पर दबाव कम रहता है।
- **श्रम सुधार के नजरिए से:** यह दैनिक शारीरिक श्रम की वास्तविकता को दर्शाता है जहां न्यूनतम मजदूरी से कम कमाई में पूरे परिवार का खर्च चलाना पड़ता है। ऐसे कामगारों को सरकारी कल्याणकारी योजनाओं से सीधे जोड़ना एक व्यावहारिक समाधान हो सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
ग्रामीण इलाकों में औपचारिक रोजगार के सीमित विकल्पों और प्राकृतिक जंगलों की निकटता के कारण कई परिवार सूखी लकड़ी की बिक्री को आजीविका बनाते हैं।

- **रोजगार के विकल्पों की कमी:** कोवाली और आसपास के ग्रामीण इलाकों में उद्योगों या संगठित नौकरियों के अवसर नगण्य हैं। कृषि में मौसमी निर्भरता के कारण बाकी दिनों में आजीविका के लिए जंगल से मिलने वाले संसाधनों का रुख करना पड़ता है।
- **घरेलू ईंधन की निरंतर मांग:** आसपास के कस्बों और ग्रामीण घरों में पारंपरिक चूल्हों के लिए लकड़ी की मांग आज भी बनी हुई है। गैस सिलेंडरों की ऊंची लागत के चलते कई परिवार रोजमर्रा के उपयोग के लिए सस्ती लकड़ी खरीदना पसंद करते हैं।
- **पारंपरिक वन निर्भरता:** सदियों से जंगलों के निकट रहने वाले समुदाय सूखी लकड़ी और वनोपज एकत्र करने को एक स्वाभाविक पेशा मानते हैं। यह काम बिना किसी पूंजीगत निवेश के केवल शारीरिक श्रम और साइकिल के सहारे शुरू किया जा सकता है।
- **सीमित आय पर निर्भरता:** दिनभर की मशक्कत से मिलने वाले 350 से 400 रुपये तात्कालिक नकद जरूरतें पूरी कर देते हैं। इस तात्कालिक नकदी के प्रवाह के कारण स्थानीय लोग इस कठिन दिनचर्या को जारी रखने को विवश हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. दिलशान किस गांव और प्रखंड के रहने वाले हैं?
दिलशान झारखंड के जमशेदपुर के समीप कोवाली प्रखंड स्थित कल्याणकोचा गांव के निवासी हैं।

### 2. दिलशान अपने काम के लिए सुबह कितने बजे घर से निकलते हैं?
वे प्रतिदिन सुबह करीब 5 बजे अपनी साइकिल लेकर जंगलों की ओर निकल जाते हैं।

### 3. जंगल में सूखी लकड़ी एकत्र करने में उन्हें कितना समय लगता है?
लकड़ियां तलाशने, उन्हें इकट्ठा करने और साइकिल पर लादने में लगभग दो से तीन घंटे लग जाते हैं।

### 4. लकड़ियों को दो फीट के टुकड़ों में क्यों काटा जाता है?
लकड़ियों को दो फीट के टुकड़ों में इसलिए काटा जाता है ताकि वे घरेलू चूल्हों में जलाने के लिए आसानी से फिट हो सकें।

### 5. एक साइकिल लकड़ी बेचने पर दिलशान को कितनी आमदनी होती है?
एक साइकिल भर सूखी लकड़ी बाजार में बेचने पर उन्हें करीब 350 से 400 रुपये तक मिल जाते हैं।

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