कटड़ों में जानलेवा बन सकती है पथरी, पशुपालक खानपान और शुरुआती लक्षणों पर दें ध्यान भैंस के नर बच्चों में पथरी और पेशाब रुकने की समस्या गंभीर रूप ले सकती है, जिससे बचाव के लिए सही खानपान और समय पर डॉक्टरी सलाह बेहद जरूरी है। पशुपालन में सही पोषण और उचित देखभाल की कमी के चलते भैंस के बच्चों में यूरोलिथियासिस यानी मूत्र मार्ग में पथरी बनने का विकार सामने आता है। यह स्थिति पशु के लिए अत्यधिक कष्टदायी साबित होती है क्योंकि पथरी यूरेथ्रा में फंसकर मूत्र प्रवाह को बाधित कर देती है। समय रहते ध्यान न देने पर यह समस्या गंभीर रूप धारण कर सकती है। बोकारो स्थित चास मॉडल पशु चिकित्सालय के वरिष्ठ पशु चिकित्सक डॉ. अजीत शरण ने इस बीमारी की गंभीरता, इसके कारण, पहचान और बचाव के आवश्यक तौर-तरीकों की जानकारी दी है। नर बच्चों में सात से आठ महीने की उम्र पर अधिक खतरा पशु विशेषज्ञों के मुताबिक यूरोलिथियासिस का प्रभाव मुख्य रूप से भैंस के नर बच्चों यानी कटड़ों में सबसे ज्यादा देखने को मिलता है। शारीरिक संरचना के कारण उनके मूत्र मार्ग में पथरी अटकने की संभावना अधिक होती है। जब बच्चे सात से आठ महीने की उम्र में पहुंचते हैं, तब यह परेशानी सबसे ज्यादा उभरती है। इस अवस्था में मूत्र नलिका में पथरी फंस जाने से मूत्र निष्कासन में पूर्ण या आंशिक रुकावट आ जाती है, जिससे पशु गंभीर दर्द से छटपटाने लगता है। सूखा पुआल खिलाने की लापरवाही बनती है मुख्य वजह इस बीमारी के पनपने का एक प्रमुख कारण असंतुलित खानपान और गलत तरीके से चारा खिलाना है। जब छोटे पशु पुआल या बिचाली खाना प्रारंभ करते हैं, तब अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। अक्सर कई पशुपालक जानवरों को सीधे सूखा पुआल खिला देते हैं। सूखे पुआल में मौजूद कैल्शियम ऑक्सलेट पशु के पाचन और मूत्र तंत्र पर सीधा असर डालता है, जिससे पथरी का निर्माण तेज हो जाता है। इस जोखिम को घटाने के लिए पुआल को रातभर साफ पानी में भिगोकर रखना चाहिए और अगली सुबह उस पानी को पूरी तरह फेंककर ही भीगा हुआ पुआल पशु को परोसना चाहिए। सर्दियों में ब्लैडर फटने का बढ़ता है जोखिम मौसम बदलने पर, विशेषकर शीत ऋतु के दौरान पशुपालकों को अत्यधिक चौकन्ना रहना पड़ता है। ठंड के असर से पशुओं के मूत्र मार्ग में संकुचन आ जाता है, जिससे पेशाब निकलने में सामान्य से अधिक रुकावट आने लगती है। यदि मूत्र मार्ग में पहले से ही पथरी के कण मौजूद हैं, तो पेशाब का रास्ता पूरी तरह बंद हो सकता है। पेशाब न निकल पाने की वजह से मूत्राशय में लगातार पेशाब भरता रहता है। लगातार बढ़ते दबाव के चलते ब्लैडर फटने की नौबत आ सकती है, जिसके कारण पशु की जान भी जा सकती है। व्यवहार में बदलाव की पहचान और स्थायी उपचार इस बीमारी की रोकथाम के लिए पशुपालकों को अपने पशुओं के उठने-बैठने और पेशाब करने के तौर-तरीकों पर लगातार नजर रखनी चाहिए। यदि भैंस का नर बच्चा बार-बार जोर लगाकर पेशाब करने की कोशिश कर रहा हो, लेकिन पेशाब बिल्कुल न निकले या फिर सिर्फ बूंद-बूंद करके टपके, तो इसे सामान्य मानकर टालना खतरनाक हो सकता है। ऐसे लक्षण दिखते ही बिना किसी देरी के पशु चिकित्सक से जांच करानी चाहिए। जिन मामलों में यह विकार बार-बार दोहराता है, वहां पशु चिकित्सक के परामर्श से स्थायी सर्जरी का विकल्प चुनना सबसे सुरक्षित माना जाता है। इसके अलावा पशु को आहार में नियमित रूप से मिनरल मिक्सर देना चाहिए और उसके शारीरिक वजन के अनुपात में ही हरा चारा और सूखा चारा संतुलित मात्रा में खिलाना चाहिए। इसका आप पर असर पशुपालकों के लिए अपने मवेशियों के खानपान और मौसमी बदलावों के प्रति सजग रहकर संभावित वित्तीय नुकसान और पशु मृत्यु को रोकना बेहद जरूरी है। • भारत में: डेयरी और पशुपालन करने वाले किसानों को छोटे कटड़ों के आहार में सूखा पुआल सीधे देने से बचना चाहिए। पुआल को रातभर पानी में भिगोकर रखने और पानी फेंककर खिलाने की आदत अपनाने से पशुओं को पथरी के जोखिम से सुरक्षित रखा जा सकता है। • बोकारो में: स्थानीय पशुपालक मूत्र अवरोध के लक्षण दिखने पर चास मॉडल पशु चिकित्सालय से तुरंत संपर्क कर सकते हैं। समय रहते पेशेवर जांच और आवश्यकता पड़ने पर सर्जिकल उपचार कराने से गंभीर स्थिति में पशु की जान बचाई जा सकती है। • दैनिक प्रबंधन: मवेशियों के मूत्र त्यागने के व्यवहार और उठने-बैठने के ढंग पर नियमित रूप से पैनी नजर रखें। यदि कटड़ा बार-बार जोर लगा रहा हो या बूंद-बूंद पेशाब कर रहा हो, तो घरेलू उपचार में समय गंवाए बिना विशेषज्ञ को दिखाएं। • आहार संतुलन: पशु के शरीर के वजन के अनुसार हरा चारा और सूखा चारा मिलाकर ही परोसना चाहिए। आहार में मिनरल मिक्सर को अनिवार्य रूप से शामिल करने से मवेशियों का समग्र स्वास्थ्य और उत्पादकता दोनों बेहतर बने रहते हैं। ऐसा क्यों हुआ भैंस के छोटे नर बच्चों में यूरोलिथियासिस का मुख्य कारण खानपान की गलत आदतें और मौसम के प्रतिकूल प्रभाव का संयोजन है। • सूखे चारे में मौजूद ऑक्सलेट: सीधे सूखा पुआल खिलाने से उसमें पाया जाने वाला कैल्शियम ऑक्सलेट मूत्र तंत्र को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। यही ऑक्सलेट धीरे-धीरे जमा होकर मूत्र मार्ग में पथरी का रूप ले लेता है। • शारीरिक और उम्र संबंधी संवेदनशीलता: यह समस्या मुख्य रूप से 7 से 8 महीने के नर बच्चों में सामने आती है। नर पशुओं की मूत्र नली की बनावट के कारण थोड़ी सी भी पथरी रुकावट पैदा कर देती है। • सर्दियों में मूत्र मार्ग का संकुचन: ठंड के दिनों में तापमान गिरने से मूत्र नली में प्राकृतिक रूप से सिकुड़न आ जाती है। यदि नली में पहले से पथरी मौजूद हो, तो पेशाब पूरी तरह रुक जाता है और मूत्राशय फटने का खतरा पैदा हो जाता है। सवाल-जवाब 1. भैंस के बच्चों में यूरोलिथियासिस की समस्या किस उम्र में सबसे ज्यादा होती है? यह समस्या विशेष रूप से 7 से 8 महीने की उम्र के आसपास भैंस के नर बच्चों में सबसे अधिक देखने को मिलती है। 2. सूखा पुआल खिलाने से पशु में पथरी की शिकायत क्यों बढ़ती है? सूखे पुआल में कैल्शियम ऑक्सलेट मौजूद होता है, जो बिना भिगोए खिलाने पर पशु के मूत्र मार्ग में पथरी बनने का कारण बनता है। 3. पुआल खिलाते समय पशुपालकों को क्या सावधानी बरतनी चाहिए? पुआल को रातभर पानी में भिगोकर रखना चाहिए और अगले दिन उस पानी को फेंकने के बाद ही भीगा हुआ पुआल पशु को खिलाना चाहिए। 4. ठंड के मौसम में यह बीमारी अधिक जानलेवा क्यों बन जाती है? ठंड में मूत्र मार्ग में सिकुड़न आने से पेशाब पूरी तरह रुक सकता है, जिससे मूत्राशय में पेशाब भरने से ब्लैडर फटने और पशु की मृत्यु का खतरा रहता है। 5. पशु में मूत्र मार्ग में रुकावट के शुरुआती लक्षण क्या हैं? पशु का बार-बार पेशाब करने की कोशिश करना, पेशाब न निकल पाना या फिर केवल बूंद-बूंद पेशाब आना इसके मुख्य लक्षण हैं। 6. बार-बार पथरी बनने की स्थिति में क्या उपचार सुझाया गया है? समस्या के बार-बार सामने आने पर पशु चिकित्सक की सलाह से स्थायी सर्जरी कराना एक सुरक्षित और बेहतर उपचार विकल्प है। https://trendkia.com/jharkhand/kataron-men-janaleva-bana-sakati-hai-pathari-pashupalaka-khanapana-aura-shuruati-lakshanon-para-den-dhyana-53742 TrendKia — Har trend, sabse pehle.