खाली जमीन की घेराबंदी में आरसीसी बाउंड्री वॉल बन रही किफायती विकल्प, ईंट के मुकाबले बचेंगे आधे पैसे खाली प्लॉट या घर के चारों तरफ बाउंड्री वॉल बनाने के लिए प्रीकास्ट आरसीसी स्लैब पारंपरिक ईंट की दीवार से लगभग आधी लागत में तैयार हो जाती है। जमीन की सुरक्षा के लिए चारदीवारी खड़ी करना हर भूखंड मालिक की पहली प्राथमिकता होती है, लेकिन निर्माण सामग्री और मजदूरी की बढ़ती कीमतें अक्सर बजट बिगाड़ देती हैं। ऐसे में झुमरी तिलैया स्थित इंदरवा बस्ती के झरना कुंड रोड पर कार्यरत महाकाय बिल्डटेक के वरुण कुणाल ने बताया कि प्रीकास्ट आरसीसी बाउंड्री तकनीक से घेराबंदी का काम काफी कम खर्च और बेहद कम समय में पूरा किया जा सकता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस आधुनिक तकनीक से काम कराने पर ईंट, पानी और मजदूरों की लंबी कतार पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं पड़ती। ईंट की चारदीवारी से करीब आधी बैठती है लागत लागत के गणित को समझाते हुए वरुण कुणाल ने कोडरमा क्षेत्र के एक कट्ठा यानी 1740 वर्गफीट के प्लॉट का पैमाना साझा किया। यदि इतनी जमीन पर लाल ईंट, सीमेंट, गिट्टी, बालू और लोहे की छड़ों से पारंपरिक चारदीवारी खड़ी की जाए, तो कुल बजट लगभग 1.40 लाख से 1.50 लाख रुपये तक पहुंच जाता है। दूसरी तरफ, उसी परिधि पर मजबूत आरसीसी स्लैब और पिलर से बाउंड्री तैयार कराने का कुल खर्च मात्र 80 से 85 हजार रुपये के आसपास आता है। इस तरह जमीन मालिकों की सीधी बचत हो जाती है और बजट पर भारी दबाव नहीं बनता। पिलर और स्लैब के इंटरलॉकिंग सिस्टम से कैसे बनती है यह दीवार वरुण कुणाल के अनुसार इस संरचना को खड़ा करने का तरीका बेहद व्यवस्थित है। जमीन की सीमा पर हर छह फीट की निश्चित दूरी पर मजबूत सीमेंट पिलर खड़े किए जाते हैं। इन पिलरों की कुल लंबाई करीब आठ फीट होती है, जिसमें से लगभग दो फीट गहरा हिस्सा नींव के तौर पर जमीन में धंसाया जाता है। जमीन से बाहर दिखने वाले छह फीट के ढांचे के बीच खांचों में आरसीसी स्लैब एक के ऊपर एक सजाकर फिट कर दिए जाते हैं। दीवार में लगने वाले प्रत्येक स्लैब की लंबाई छह फीट, ऊंचाई एक फीट और मोटाई करीब दो इंच रखी जाती है। ग्राहक अपनी जरूरत के मुताबिक जितनी ऊंचाई चाहते हैं, उतनी ही संख्या में स्लैब पिरोकर दीवार तैयार कर ली जाती है। कम समय, कम पानी और रोजाना 100 फीट तक काम पारंपरिक निर्माण में राजमिस्त्री और मजदूरों की बड़ी टोली लगती है और प्रगति भी काफी धीमी रहती है। साथ ही ईंट की चिनाई पूरी होने के बाद कई दिनों तक पानी से नियमित तराई करनी पड़ती है, जिससे भूजल की भारी बर्बादी होती है। इसके विपरीत, आरसीसी बाउंड्री सिस्टम में स्लैब और खंभे पहले ही फैक्ट्री में तैयार और पूरी तरह परिपक्व हो चुके होते हैं। वरुण कुणाल ने कहा कि साइट पर सिर्फ असेंबलिंग का काम बाकी रहता है, जिसके कारण एक ही दिन में करीब 100 फीट लंबी बाउंड्री आसानी से खड़ी की जा सकती है। इस पूरी प्रक्रिया में सीमेंट के गारे और पानी की जरूरत नाममात्र की रह जाती है। रीलोकेशन की सुविधा और आकर्षक डिजाइन विकल्प इस आधुनिक बाउंड्री वॉल का सबसे अनूठा पहलू इसका डिसमेंटल होकर दोबारा काम आना है। यदि भविष्य में जमीन की सीमा बढ़ानी हो या सेटअप को किसी नए भूखंड पर ले जाना पड़े, तो इन पिलरों और स्लैब को सुरक्षित खोलकर दूसरी जगह दोबारा लगाया जा सकता है। पारंपरिक ईंट की दीवार के मामले में ऐसा सोचना भी नामुमकिन है, क्योंकि उसे तोड़ने पर सिर्फ मलबा ही हाथ लगता है। इसके अतिरिक्त, निर्माण में छड़, बालू, सीमेंट और उच्च गुणवत्ता वाली गिट्टी का संयोजन इस्तेमाल होने से यह अत्यधिक मजबूत साबित होती है। साथ ही विभिन्न सांचों की मदद से दीवार को खूबसूरत और आकर्षक आकृतियां भी दी जा सकती हैं, जिससे आवासीय परिसर का लुक और बेहतर दिखता है। इसका आप पर असर खाली भूखंड या आवासीय जमीन की चारदीवारी कराने वाले लोगों के लिए यह तकनीक निर्माण लागत और समय दोनों को आधा कर देती है। • सीधी आर्थिक बचत: ईंट की दीवार पर 1.40 से 1.50 लाख रुपये के मुकाबले यह काम 80 से 85 हजार रुपये में हो जाता है। इससे एक कट्ठा जमीन घेरने पर आम नागरिक के लगभग 55 से 65 हजार रुपये बचते हैं। • तेज निर्माण गति: पहले से बने स्लैब होने के कारण प्रतिदिन करीब 100 फीट तक दीवार खड़ी की जा सकती है। इससे हफ्तों तक चलने वाला काम चंद दिनों में निपट जाता है और संपत्ति तुरंत सुरक्षित हो जाती है। • पानी और मजदूरी की बचत: साइट पर ईंट की तराई और अधिक मजदूरों की आवश्यकता नहीं पड़ती। जहां पानी की किल्लत या नल कनेक्शन नहीं है, वहां भी बिना रुकावट निर्माण संभव है। • दोबारा इस्तेमाल की सुविधा: यदि भविष्य में प्लॉट का विस्तार करना हो या निर्माण बदलना हो, तो स्लैब और पिलर खोलकर दूसरी जगह लगाए जा सकते हैं। पारंपरिक ईंट की तरह आपकी पूरी पूंजी मलबे में तब्दील नहीं होती। ऐसा क्यों हुआ बढ़ती निर्माण लागत, जल संकट और मजदूरों की किल्लत के चलते लोग अब पारंपरिक ईंट चिनाई की जगह प्रीकास्ट कंक्रीट विकल्पों को अपना रहे हैं। • महंगी निर्माण सामग्री: लाल ईंट, सीमेंट और बालू की कीमतों में लगातार उछाल आने से पारंपरिक घेराबंदी काफी खर्चीली साबित हो रही थी। प्रीफैब्रिकेटेड तकनीक मानकीकृत उत्पादन के जरिए इस सामग्री लागत को काफी कम कर देती है। • कार्यबल और समय की कमी: कुशल राजमिस्त्री और मजदूरों की कमी से पारंपरिक निर्माण कार्य अक्सर लंबा खिंच जाता है। आरसीसी सिस्टम फैक्टरी-निर्मित स्लैब पर आधारित होने से कुछ ही कर्मियों के साथ तेजी से पूरा हो जाता है। • साइट पर संसाधन की बाधाएं: खाली पड़े भूखंडों पर पानी की व्यवस्था न होने से ईंटों की अनिवार्य तराई करना बेहद मुश्किल होता है। पहले से पके और सूखे कंक्रीट स्लैब लाकर लगाने से यह जमीनी समस्या पूरी तरह हल हो जाती है। सवाल-जवाब 1. कोडरमा में एक कट्ठा जमीन पर आरसीसी बाउंड्री वॉल बनाने में कितना खर्च आता है? कोडरमा में 1740 वर्गफीट (एक कट्ठा) जमीन की घेराबंदी आरसीसी बाउंड्री वॉल से कराने पर लगभग 80 से 85 हजार रुपये का खर्च आता है। 2. पारंपरिक ईंट की दीवार के मुकाबले आरसीसी बाउंड्री कितनी सस्ती पड़ती है? एक कट्ठा जमीन पर ईंट की दीवार बनाने में 1.40 लाख से 1.50 लाख रुपये खर्च होते हैं, जबकि आरसीसी बाउंड्री में करीब आधी लागत आती है। 3. आरसीसी बाउंड्री वॉल में पिलर और स्लैब का क्या माप होता है? पिलर लगभग आठ फीट लंबे होते हैं जिन्हें हर छह फीट पर लगाया जाता है और दो फीट जमीन में गाड़ा जाता है, जबकि स्लैब की लंबाई छह फीट, ऊंचाई एक फीट और मोटाई दो इंच होती है। 4. एक दिन में आरसीसी बाउंड्री का कितना काम पूरा किया जा सकता है? आरसीसी स्लैब पहले से तैयार होने के कारण कुशल टीम द्वारा एक दिन में करीब 100 फीट तक बाउंड्री लगाने का काम आसानी से पूरा हो जाता है। 5. क्या आरसीसी बाउंड्री वॉल को बाद में हटाकर दूसरी जगह इस्तेमाल किया जा सकता है? हां, इसके पिलर और स्लैब के पूरे ढांचे को खोलकर बिना नुकसान पहुंचाए किसी अन्य भूखंड पर दोबारा लगाया जा सकता है। https://trendkia.com/jharkhand/khali-jamina-ki-gherabndi-men-rcc-boundary-wall-bana-rahi-kiphayati-vikalpa-inta-ke-mukabale-bachenge-adhe-paise-40026 TrendKia — Har trend, sabse pehle.