# महिला के कपड़े उतारने की कोशिश पर झारखंड हाईकोर्ट ने रेप के आरोप से दी राहत

> झारखंड हाईकोर्ट ने 26 साल पुराने एक मामले में कहा कि रात में महिला के घर घुसकर कपड़े उतारने की कोशिश गंभीर अपराध है, लेकिन इसे रेप का प्रयास नहीं माना जा सकता, अदालत ने आरोपी को कम गंभीर अपराध का दोषी ठहराया।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-09-08 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/mahila-ke-kapare-utarane-ki-koshisha-para-jharkhand-high-court-ne-repa-ke-aropa-se-di-rahata-29354 · **Language:** Hindi
**Tags:** झारखंड हाईकोर्ट, रेप का प्रयास, पूर्वी सिंहभूम, कोर्ट का फैसला, आपराधिक अपील, महिला सुरक्षा कानून

झारखंड हाईकोर्ट ने एक फैसले में साफ किया है कि रात के अंधेरे में किसी महिला के घर में जबरन घुसकर उसके कपड़े खींचने की कोशिश करना बड़ा अपराध तो है, मगर इसे हर बार रेप की कोशिश की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। यह फैसला 26 साल पुराने एक मामले में सुनाया गया है।

## पूर्वी सिंहभूम का 1999 का मामला
मामला पूर्वी सिंहभूम जिले से जुड़ा है। पुलिस के मुताबिक 26 दिसंबर 1999 की रात एक व्यक्ति एक महिला के घर में घुस गया और उसके कपड़े उतारने की कोशिश की। अगले ही दिन, यानी 27 दिसंबर को पुलिस ने उसे पकड़ लिया और बाद में उसके खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी गई। सुनवाई के दौरान निचली अदालत ने इसे रेप की कोशिश का मामला मानते हुए आरोपी को चार साल की सश्रम कैद की सजा सुना दी।

सजा से असंतुष्ट आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया और रेप के प्रयास वाले आरोप को चुनौती दी।

## हाईकोर्ट ने बताया कानून में क्या फर्क है
जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव ने 31 अगस्त को इस अपील पर सुनवाई करते हुए कहा कि रात में महिला के घर घुसकर कपड़े उतारने की कोशिश करना गंभीर अपराध हो सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर ऐसी घटना रेप के प्रयास में गिनी जाए। बेंच ने साफ किया कि कानून में महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने की नीयत से आपराधिक बल इस्तेमाल करना, और रेप का प्रयास करना, ये दोनों अलग-अलग अपराध हैं और इन्हें एक ही तराजू पर नहीं तौला जा सकता।

## सजा में बदलाव की वजह
अदालत ने कहा कि किसी घटना को रेप की कोशिश मानने के लिए जरूरी है कि आरोपी की हरकत उस अपराध को पूरा करने के बेहद नजदीक पहुंच चुकी हो, सिर्फ इशारा भर काफी नहीं। इस केस के सबूतों की जांच में बेंच ने पाया कि आरोपी ने महिला की गरिमा भंग करने के इरादे से बल का इस्तेमाल तो किया, लेकिन यह हरकत रेप के प्रयास वाली कानूनी सीमा तक नहीं पहुंचती। इसी वजह से हाईकोर्ट ने निचली अदालत का रेप के प्रयास वाला फैसला पलट दिया और आरोपी को कम गंभीर अपराध, यानी गरिमा भंग करने के इरादे से बल प्रयोग, का दोषी करार दिया।

## करीब आठ महीने की हिरासत को माना काफी
कोर्ट ने गौर किया कि आरोपी इस मामले में पहले ही करीब आठ महीने जेल में बिता चुका है। अदालत ने कहा कि नए अपराध के हिसाब से न्याय के लिए इतनी अवधि ही पर्याप्त है। इसी आधार पर बेंच ने अपील को आंशिक रूप से मंजूर करते हुए आरोपी को आगे जेल भेजने से राहत दे दी, हालांकि कम गंभीर अपराध की सजा बरकरार रखी गई।

इस फैसले से यह भी साफ होता है कि अदालतें ऐसे मामलों में सिर्फ घटना के बाहरी रूप को नहीं, बल्कि आरोपी की नीयत और वह अपराध पूरा करने के कितने करीब पहुंचा, इसे भी बारीकी से परखती हैं।

## इसका आप पर असर
इस फैसले से आम लोगों को यह समझने में मदद मिलती है कि कानून में जबरदस्ती और रेप के प्रयास के बीच फर्क कैसे तय होता है।

- **भारत में:** यह फैसला भविष्य में ऐसे ही मामलों में अदालतों के लिए एक नजीर बन सकता है, जहां आरोपी की नीयत और हरकत की गंभीरता के आधार पर सही धारा तय की जाएगी। इससे पीड़िता और आरोपी दोनों के लिए मुकदमे में सही कानूनी आधार तय करना आसान होगा।
- **झारखंड में:** राज्य की निचली अदालतों को अब ऐसे मामलों में सबूतों की बारीकी से जांच करनी होगी ताकि सही धारा के तहत ही सजा तय हो। पूर्वी सिंहभूम जैसे जिलों में लंबित पुराने मामलों की सुनवाई पर भी इस फैसले का असर पड़ सकता है।
- **पीड़ितों के लिए:** महिला सुरक्षा से जुड़े मामलों में शिकायत दर्ज कराते समय घटना का पूरा ब्योरा और सबूत जुटाना पहले से ज्यादा अहम हो गया है, क्योंकि अदालतें अब हरकत की गंभीरता को बारीकी से परखेंगी।
- **आरोपियों के लिए:** अगर सबूत रेप के प्रयास की कानूनी शर्तें पूरी नहीं करते, तो अदालत कम गंभीर धारा में सजा दे सकती है, जैसा इस मामले में हुआ, जहां पहले से बिताई गई हिरासत को ही पर्याप्त सजा माना गया।

## ऐसा क्यों हुआ
अदालत ने रेप के प्रयास के आरोप को हटाने का फैसला सबूतों की सीमा और कानून में तय मापदंड के आधार पर लिया।

- **प्रॉक्सिमिटी टेस्ट:** हाईकोर्ट के मुताबिक किसी हरकत को रेप की कोशिश मानने के लिए जरूरी है कि आरोपी उस अपराध को पूरा करने के बेहद करीब पहुंच चुका हो। मौजूदा मामले में सबूत सिर्फ बल प्रयोग तक सीमित थे।
- **निचली अदालत का आकलन:** ट्रायल कोर्ट ने 1999 की सुनवाई में घटना को सीधे रेप के प्रयास के तौर पर देखा था, जिसकी वजह से चार साल की सजा सुनाई गई थी। हाईकोर्ट ने इस आकलन को सबूतों के लिहाज से अधूरा माना।
- **कानूनी फर्क:** बेंच ने कहा कि गरिमा भंग करने के इरादे से बल का इस्तेमाल और रेप का प्रयास, कानून की नजर में दो अलग-अलग स्तर के अपराध हैं, इसलिए दोनों को एक जैसा नहीं माना जा सकता।

## सवाल-जवाब

### 1. यह घटना कब हुई थी?
यह घटना 26 दिसंबर 1999 की रात की है और आरोपी को अगले दिन यानी 27 दिसंबर को गिरफ्तार किया गया था।

### 2. निचली अदालत ने क्या सजा सुनाई थी?
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को रेप के प्रयास का दोषी मानते हुए चार साल की सश्रम कैद की सजा सुनाई थी।

### 3. झारखंड हाईकोर्ट ने क्या बदलाव किया?
हाईकोर्ट ने आरोपी को रेप के प्रयास के आरोप से मुक्त कर दिया और उसे महिला की गरिमा भंग करने के इरादे से आपराधिक बल इस्तेमाल करने का दोषी माना।

### 4. यह फैसला किसने सुनाया?
यह फैसला जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की बेंच ने 31 अगस्त को सुनाया।

### 5. मामला किस जिले से जुड़ा है?
यह मामला झारखंड के पूर्वी सिंहभूम जिले का है।

### 6. क्या आरोपी को अब और जेल जाना होगा?
नहीं, हाईकोर्ट ने पहले से बिताई गई करीब आठ महीने की हिरासत को ही पर्याप्त मानते हुए आगे की सजा से राहत दे दी।

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