{
  "type": "article",
  "title": "मकराना संगमरमर पर तस्वीरें उकेर रहे पलामू के संजीव, कोलकाता और कानपुर तक फैली हुनर की चमक",
  "summary": "पलामू के बिसफुटा में श्रीराम मूर्ति कला केंद्र चला रहे संजीव कुमार चौधरी तस्वीरों को देखकर मकराना के पत्थरों पर हूबहू मूर्तियां तैयार करते हैं। उनकी इस अनोखी कला की मांग झारखंड के पलामू से लेकर कोलकाता, रायपुर और कानपुर तक बढ़ रही है।",
  "content": "झारखंड के पलामू जिले में यादों को पत्थर पर उकेरने की एक अनूठी कला लोगों का ध्यान खींच रही है। मेदिनीनगर में बिसफुटा के पास स्थित श्रीराम मूर्ति कला केंद्र में तस्वीरों के आधार पर हुबहू संगमरमर की मूर्तियां तैयार की जा रही हैं। लोग अपने दिवंगत दादा-दादी, नाना-नानी या परिवार के अन्य सदस्यों की पुरानी फोटो देकर उनकी आदमकद या छोटी प्रतिमाएं बनवा रहे हैं। मूर्तिकार तस्वीर में दिख रहे चेहरे की बनावट, हाव-भाव, आंख-नाक और पहनावे का बारीक अध्ययन कर पत्थर पर वही रूप ढाल देते हैं। इस तरह कागज की तस्वीरों में कैद स्मृतियों को पत्थर की प्रतिमाओं के माध्यम से पीढ़ियों तक सहेजने का काम किया जा रहा है।\n\nतस्वीरों से आकार लेती यादें और संजीव चौधरी का 20 साल का सफर\nइस कला केंद्र का संचालन संजीव कुमार चौधरी कर रहे हैं, जो पिछले करीब 20 वर्षों से पलामू में मूर्ति निर्माण के कार्य से जुड़े हुए हैं। उन्होंने बताया कि दो दशक पहले मूर्तियों की लागत बहुत कम हुआ करती थी और साधारण मूर्तियां 100 रुपये से लेकर 500 रुपये के बीच में भी तैयार हो जाती थीं। समय बीतने के साथ-साथ संगमरमर, पत्थर और नक्काशी में इस्तेमाल होने वाली अन्य सामग्रियों के दाम काफी बढ़ चुके हैं। पहले यह काम अघोर आश्रम के समीप किया जाता था, लेकिन अब इसका संचालन बिसफुटा के पास नए परिसर में हो रहा है। इस केंद्र में केवल तस्वीरों से ही मूर्तियां नहीं बनतीं, बल्कि यहां भगवान गणेश, भगवान शंकर, देवी दुर्गा और मां काली सहित विभिन्न देवी-देवताओं की सुंदर प्रतिमाएं भी अलग-अलग कलात्मक डिजाइनों में तैयार की जाती हैं।\n\nजयपुर के मकराना संगमरमर को तराशने की जटिल प्रक्रिया\nप्रतिमाओं के निर्माण के लिए उपयोग किया जाने वाला पत्थर विशेष रूप से राजस्थान के जयपुर स्थित मकराना से मंगाया जाता है। मकराना का संगमरमर अपनी मजबूती और चमक के लिए जाना जाता है। संजीव कुमार चौधरी बताते हैं कि मूर्ति बनाने की शुरुआत जरूरत के मुताबिक सही आकार के पत्थर के चुनाव से होती है। इसके बाद पारंपरिक औजारों जैसे छैनी और हथौड़ी की मदद से पत्थर के अतिरिक्त हिस्सों को काटकर अलग किया जाता है और एक प्रारंभिक ढांचा तैयार किया जाता है। इसके बाद कलाकार तस्वीर को सामने रखकर बेहद सावधानी से काम शुरू करते हैं। फोटो में देखकर आंख, नाक, होंठ, बाल और चेहरे के विशिष्ट भावों को पत्थर पर उकेरा जाता है। बारीक औजारों से नक्काशी पूरी होने के बाद सबसे महत्वपूर्ण चरण सतह की घिसाई और फिनिशिंग का होता है। पत्थर को पूरी तरह चिकना करने के बाद मूर्ति की सफाई और रंग-रोगन कर उसे अंतिम रूप दिया जाता है।\n\nएक प्रतिमा बनने का समय और लागत का पूरा ब्योरा\nएक सुंदर और सटीक प्रतिमा तैयार करने में कलाकार को करीब 10 दिन का समय लग जाता है। पत्थर की गुणवत्ता और नक्काशी की मेहनत के हिसाब से इनकी कीमतें तय की जाती हैं। आम धार्मिक मूर्तियों की शुरुआती कीमत लगभग 5 हजार रुपये से प्रारंभ होती है। यदि कोई ग्राहक तस्वीर के आधार पर 1.5 फीट की कस्टमाइज्ड मूर्ति बनवाता है, तो उसका खर्च लगभग 17 हजार रुपये आता है। वहीं भगवान की 2 से 2.5 फीट ऊंची मूर्तियां 15 हजार रुपये से लेकर 20 हजार रुपये तक के बजट में बनकर तैयार हो जाती हैं। मकराना के पत्थर की अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय बाजार में बढ़ती कीमतों के कारण मूर्तियों के दाम में भी बीते सालों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है।\n\nपलामू से निकलकर कोलकाता, रायपुर और कानपुर तक बढ़ा दायरा\nश्रीराम मूर्ति कला केंद्र की बनी मूर्तियों की मांग अब केवल पलामू या आसपास के इलाकों तक सीमित नहीं रह गई है। संजीव कुमार चौधरी द्वारा तराशी गई मूर्तियों के ऑर्डर अब पश्चिम बंगाल के कोलकाता, छत्तीसगढ़ के रायपुर और उत्तर प्रदेश के कानपुर जैसे बड़े शहरों से भी आ रहे हैं। अलग-अलग आकार और कलात्मक डिजाइनों में बनने वाली इन प्रतिमाओं को लोग दूर-दूर से मंगवा रहे हैं। यह कला अब सिर्फ मंदिरों और पूजा-पंडालों के लिए देवी-देवताओं की मूर्तियों तक सीमित नहीं है, बल्कि अपनों की याद में कस्टमाइज्ड स्मारक प्रतिमाएं बनवाने का एक बड़ा माध्यम बन चुकी है।\n\nइसका आप पर असर\nतस्वीर से पत्थर पर हूबहू मूर्ति बनवाने की सुविधा पुरानी यादों को हमेशा के लिए जीवंत रखने का एक अनूठा माध्यम बनकर उभरी है।\n\n• भारत भर में: जो लोग अपने दिवंगत पूर्वजों या प्रियजनों की स्थायी प्रतिमा बनवाना चाहते हैं, वे फोटो भेजकर मकराना मार्बल पर ऐसी कलाकृतियां तैयार करवा सकते हैं। इससे दूरदराज के शहरों में रहने वाले परिवारों को भी व्यक्तिगत स्मारक मूर्तियां बनवाने का विकल्प मिलता है।\n• पलामू और झारखंड में: स्थानीय निवासियों के लिए मेदिनीनगर में 10 दिन के भीतर कस्टमाइज्ड मूर्तियां बनवाने की सुविधा उपलब्ध है। बिसफुटा स्थित केंद्र से लोग 1.5 फीट की फोटो-आधारित प्रतिमा 17 हजार रुपये में बनवा सकते हैं।\n• कला क्षेत्र के लिए: पारंपरिक धार्मिक मूर्ति निर्माण के साथ-साथ व्यक्तिगत स्मारक कला के जुड़ने से स्थानीय मूर्तिकारों के लिए आय के नए रास्ते खुले हैं। इससे मकराना संगमरमर जैसे पारंपरिक पत्थरों की मांग और कारीगरों का दायरा अंतरराज्यीय स्तर पर बढ़ रहा है।\n• पारिवारिक विरासत हेतु: कागज की तस्वीरों के समय के साथ खराब होने का डर रहता है, जबकि पत्थर की मूर्तियां पीढ़ियों तक सुरक्षित रहती हैं। परिवार अपने दादा-दादी या माता-पिता की यादों को अपने घरों में स्थायी रूप से संजोकर रख सकते हैं।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. पलामू में फोटो देखकर मूर्ति बनाने का काम कौन करता है?\nपलामू के मेदिनीनगर बिसफुटा स्थित श्रीराम मूर्ति कला केंद्र के संचालक संजीव कुमार चौधरी पिछले 20 वर्षों से तस्वीरों से संगमरमर की मूर्तियां बना रहे हैं।\n\n2. प्रतिमाएं बनाने के लिए किस पत्थर का उपयोग किया जाता है और वह कहां से आता है?\nमूर्तियों के निर्माण के लिए राजस्थान के जयपुर स्थित मकराना से प्रसिद्ध संगमरमर पत्थर मंगवाया जाता है।\n\n3. फोटो के आधार पर 1.5 फीट की मूर्ति बनवाने में कितना खर्च आता है?\nफोटो के आधार पर 1.5 फीट की कस्टमाइज्ड प्रतिमा तैयार कराने में लगभग 17 हजार रुपये का खर्च आता है।\n\n4. एक मूर्ति तैयार करने में कितना समय लगता है?\nएक प्रतिमा को तराशने, फिनिशिंग करने और तैयार करने में लगभग 10 दिन का समय लगता है।\n\n5. पलामू के अलावा इन मूर्तियों की मांग कहां-कहां है?\nपलामू के अलावा कोलकाता, रायपुर और कानपुर जैसे शहरों से भी इन मूर्तियों के ऑर्डर आते हैं।\n\nप्रेरणा और सबक\nपलामू के मूर्तिकार संजीव कुमार चौधरी का 20 वर्षों का सफर लगन, अनुकूलनशीलता और अपनी कला के विस्तार की एक प्रेरणादायक कहानी है।\n\n• समय के साथ बदलाव को अपनाना: केवल पारंपरिक देवी-देवताओं की मूर्तियां बनाने तक सीमित न रहकर संजीव ने तस्वीरों से प्रियजनों की प्रतिमाएं बनाने की नई विधा को अपनाया, जिससे उनके काम को नई पहचान मिली।\n• गुणवत्ता से समझौता न करना: पलामू में काम करते हुए भी उन्होंने मूर्तियों के लिए जयपुर के प्रसिद्ध मकराना संगमरमर का ही इस्तेमाल बनाए रखा, जिससे ग्राहकों का भरोसा मजबूत हुआ।\n• स्थानीय स्तर से राष्ट्रीय पहचान: एक छोटे केंद्र से शुरुआत करके अपनी कला की मांग कोलकाता, रायपुर और कानपुर जैसे बड़े शहरों तक पहुंचाना साबित करता है कि हुनर और मेहनत भौगोलिक सीमाओं को तोड़ देती है।\n• धैर्य और बारीक हुनर: एक प्रतिमा पर 10 दिनों तक लगातार छैनी-हथौड़ी से काम करके चेहरे के सटीक हाव-भाव उकेरना सिखाता है कि महान कलाकृति के लिए अत्यधिक धैर्य आवश्यक है।",
  "url": "https://trendkia.com/jharkhand/makrana-sngamaramara-para-tasviren-ukera-rahe-palamu-ke-sanjeev-kolkata-aura-kanpur-taka-phaili-hunara-ki-chamaka-23475",
  "category": "झारखंड",
  "publishedAt": "2026-08-28",
  "tags": [
    "पलामू",
    "संजीव कुमार चौधरी",
    "मकराना संगमरमर",
    "मूर्ति कला",
    "मेदिनीनगर",
    "श्रीराम मूर्ति कला केंद्र",
    "झारखंड"
  ],
  "language": "hi",
  "site": "TrendKia"
}