# माता-पिता के संघर्ष को मुकाम देकर रांची में चमके विपुल, सिविल इंजीनियरिंग में जीता स्वर्ण पदक

> जम्मू से आकर बीआईटी मेसरा में सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाले विपुल परासर संस्थान के दीक्षांत समारोह में स्वर्ण पदक विजेता बने हैं। अपने परिवार के पहले इंजीनियर बनने वाले विपुल अब सिविल सर्विसेज में जाना चाहते हैं।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-10-12 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/mata-pita-ke-sngharsha-ko-mukama-dekara-ranchi-men-chamake-vipul-civil-engineering-men-jita-svarna-padaka-46667 · **Language:** Hindi
**Tags:** बीआईटी मेसरा, विपुल परासर, सिविल इंजीनियरिंग, गोल्ड मेडल, दीक्षांत समारोह, रांची, जम्मू, सफलता की कहानी

झारखंड की राजधानी स्थित बिरला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी मेसरा के दीक्षांत समारोह में जम्मू के रहने वाले छात्र विपुल परासर ने उल्लेखनीय शैक्षणिक सफलता दर्ज की है। सिविल इंजीनियरिंग संकाय की पढ़ाई पूरी करते हुए उन्होंने अपनी कक्षा में शीर्ष स्थान हासिल किया और स्वर्ण पदक अपने नाम किया। एक साधारण पृष्ठभूमि से निकलकर इस प्रतिष्ठित तकनीकी संस्थान तक पहुंचना और फिर वहां अपनी विधा में सर्वश्रेष्ठ साबित होना उनके लंबे व्यक्तिगत और पारिवारिक समर्पण का परिणाम है। यह उपलब्धि उनके पूरे परिवार के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ साबित हुई है, क्योंकि वह अपने खानदान में इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल करने वाले पहले सदस्य बन गए हैं।

## साधारण पृष्ठभूमि और माता-पिता का बड़ा सपना
विपुल का पारिवारिक परिवेश बेहद साधारण रहा है। उनके माता-पिता जम्मू में निवास करते हैं, जहां उनके पिता केवल 11वीं कक्षा तक ही औपचारिक शिक्षा हासिल कर पाए थे, जबकि उनकी मां पढ़ी-लिखी नहीं हैं और घर-परिवार संभालने की जिम्मेदारी निभाती हैं। सीमित साधनों और औपचारिक उच्च शिक्षा के अभाव के बावजूद इन दोनों अभिभावकों की दिली इच्छा थी कि उनका बेटा उच्च शिक्षा प्राप्त कर एक पेशेवर इंजीनियर बने। अपने परिवार की आर्थिक तंगियों, संसाधनों की कमी और लगातार संघर्षों को करीब से देखने वाले विपुल ने माता-पिता की इस आकांक्षा को अपना मुख्य जीवन लक्ष्य बना लिया। जम्मू से रांची के बीआईटी मेसरा तक का सफर उन्होंने अपने कुछ मित्रों के परामर्श और संस्थान की शैक्षणिक प्रतिष्ठा को देखकर तय किया था।

## स्वास्थ्य की गंभीर चुनौती और प्लेसमेंट का दौर
कॉलेज के वर्षों के दौरान विपुल का सफर चुनौतियों से मुक्त नहीं था। जब कैंपस में बहुप्रतीक्षित प्लेसमेंट प्रक्रिया चल रही थी, ठीक उसी संवेदनशील समय में एक अप्रत्याशित घटना घटी और उन्हें एक बिल्ली ने काट लिया। इस घटना के बाद उचित समय पर वैक्सीन लेने के बावजूद उनकी शारीरिक सेहत काफी बिगड़ गई और वह पूरे एक वर्ष तक लगातार अस्वस्थ रहे। शारीरिक कमजोरी और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के बीच प्लेसमेंट और शैक्षणिक परीक्षाओं का सामना करना बेहद कठिन था। इस संकट की घड़ी में उनकी वर्षों की नियमित अध्ययन की आदत, मानसिक दृढ़ता और पूर्व की निरंतर मेहनत काम आई। उन्होंने बीमारी के बीच हिम्मत नहीं हारी और न केवल अपनी पढ़ाई जारी रखी, बल्कि कैंपस चयन प्रक्रिया में भाग लेकर एक कॉर्पोरेट नौकरी का ऑफर भी सफलतापूर्वक हासिल किया।

## नौकरी छोड़कर सिविल सर्विसेज का चुना नया रास्ता
कैंपस चयन प्रक्रिया के माध्यम से रोजगार मिलने के कुछ समय बाद ही विपुल के मन में अपने करियर को लेकर एक नया दृष्टिकोण विकसित हुआ। निजी क्षेत्र की इस तकनीकी नौकरी में उनका मन अधिक समय तक नहीं लगा, जिसके चलते उन्होंने कुछ ही समय काम करने के बाद वह पद छोड़ दिया। अब उनका ध्यान पूरी तरह से देश की प्रशासनिक व्यवस्था और सिविल सर्विसेज परीक्षा की ओर मुड़ चुका है। विपुल का लक्ष्य एक स्थिर और जनसेवा से जुड़ी सरकारी सेवा में स्थान बनाना है। अपने खानदान का पहला इंजीनियर बनकर उन्होंने जिस शैक्षणिक आधारशिला को तैयार किया है, उसी के बल पर अब वह पूर्ण समर्पण के साथ प्रशासनिक सेवा परीक्षाओं की तैयारी में जुटने जा रहे हैं।

## विद्यार्थियों के लिए संतुलित जीवन और निरंतरता का मंत्र
अपनी इस शैक्षणिक यात्रा और अनुभवों के आधार पर विपुल युवा पीढ़ी और इंजीनियरिंग विद्यार्थियों को जीवन में संतुलन बनाए रखने का महत्वपूर्ण परामर्श देते हैं। उनका मानना है कि विद्यार्थियों को केवल किताबों में कैद होकर तनावग्रस्त नहीं होना चाहिए। जीवन का आनंद लेने के लिए खेलकूद, मित्रों के साथ बाहर जाना और सामाजिक गतिविधियां उतनी ही आवश्यक हैं, जितनी कि पढ़ाई। हालांकि, इन मनोरंजनों के साथ अनुशासन का होना जरूरी है। बाहर से लौटने के बाद रोजाना कम से कम दो से तीन घंटे एकाग्रचित्त होकर नियमित अध्ययन करना चाहिए। परीक्षा के अंतिम दिनों में पढ़ाई का बोझ उठाने के बजाय पूरे साल भर निरंतरता बनाए रखना ही बिना किसी बोरियत के उत्कृष्ट परिणाम दिलाने का सबसे सरल मार्ग है।

## इसका आप पर असर
यह प्रेरणादायक यात्रा दिखाती है कि सीमित पारिवारिक संसाधनों और गंभीर स्वास्थ्य संकटों के बावजूद निरंतर अनुशासन से उच्च शैक्षणिक मुकाम पाया जा सकता है।

- **इंजीनियरिंग छात्रों के लिए:** कॉलेज में रोजाना दो से तीन घंटे की नियमित पढ़ाई करने से परीक्षा और प्लेसमेंट के दौरान अनावश्यक तनाव से बचा जा सकता है। यह दृष्टिकोण साल भर मस्ती और अकादमिक उत्कृष्टता दोनों के बीच संतुलन स्थापित करने में मदद करता है।
- **करियर चयन के मामले में:** कैंपस प्लेसमेंट मिलने के बाद भी अपनी वास्तविक रुचि को पहचानकर वैकल्पिक रास्तों, जैसे सिविल सर्विसेज, की ओर कदम बढ़ाया जा सकता है। अपनी प्राथमिकताओं को समय रहते पहचानना पेशेवर संतुष्टि के लिए जरूरी होता है।
- **प्रतिकूल परिस्थितियों में:** गंभीर बीमारी या अप्रत्याशित संकट के दौरान पहले से स्थापित अध्ययन की निरंतरता ही सबसे बड़ा संबल बनती है। विपरीत समय में धैर्य रखने से लंबे समय की मेहनत बेकार नहीं जाती।
- **सीमित पृष्ठभूमि वाले परिवारों के लिए:** माता-पिता की सीमित औपचारिक शिक्षा या आर्थिक तंगी कभी भी बच्चों की उच्च शैक्षणिक उपलब्धियों में स्थायी बाधा नहीं बनती। सही मार्गदर्शन और लगन से पहली पीढ़ी के पेशेवर भी शीर्ष पदक हासिल कर सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
विपुल परासर की यह शैक्षणिक उपलब्धि पारिवारिक प्रेरणा, नियमित अध्ययन अनुशासन और कठिन परिस्थितियों में भी न झुकने के संकल्प के संयोजन से संभव हुई है।

- **पारिवारिक संकल्प का प्रभाव:** विपुल के पिता केवल 11वीं पास थे और माता निरक्षर थीं, लेकिन दोनों ने अपने बेटे को इंजीनियर बनाने का गहरा सपना देखा और आर्थिक कठिनाइयों को झेला। इस पारिवारिक त्याग ने विपुल के भीतर अपनी पढ़ाई को शीर्ष तक पहुंचाने का मजबूत दायित्व बोध पैदा किया।
- **निरंतर अध्ययन की कार्यप्रणाली:** केवल अंतिम समय में रटने के बजाय साल भर हर दिन दो से तीन घंटे का गंभीर अध्ययन करने की उनकी पद्धति ने मजबूत बुनियादी समझ तैयार की। इसी ठोस तैयारी के कारण वह सिविल इंजीनियरिंग संकाय में अव्वल रहे।
- **अप्रत्याशित स्वास्थ्य संकट से निपटना:** प्लेसमेंट के संवेदनशील दौर में बिल्ली के काटने के बाद वह एक साल तक बीमार रहे, जिससे उनकी तैयारी बाधित हो सकती थी। हालांकि, वैक्सीन लेने के साथ-साथ पूर्व की निरंतर मेहनत और व्यक्तिगत धैर्य ने उन्हें इस कठिन अवधि में टूटने नहीं दिया।
- **करियर में बदलाव का निर्णय:** प्लेसमेंट के जरिए निजी नौकरी हासिल करने के बाद उनका मन उसमें नहीं लगा, क्योंकि उनकी वास्तविक महत्वाकांक्षा देश की प्रशासनिक सेवा में जाने की थी। इसी कारण उन्होंने नौकरी छोड़कर सिविल सर्विसेज की तैयारी का फैसला किया।

## सवाल-जवाब

### 1. विपुल परासर को किस संस्थान में और किस विषय में स्वर्ण पदक मिला?
विपुल परासर को रांची स्थित बीआईटी मेसरा के दीक्षांत समारोह में सिविल इंजीनियरिंग संकाय में स्वर्ण पदक मिला।

### 2. विपुल के परिवार की शैक्षणिक पृष्ठभूमि क्या रही है?
उनके पिता केवल 11वीं पास हैं और माता निरक्षर हैं, जिसके चलते विपुल अपने पूरे खानदान के पहले इंजीनियर बने हैं।

### 3. प्लेसमेंट के दौरान विपुल को किस स्वास्थ्य समस्या का सामना करना पड़ा था?
प्लेसमेंट के समय विपुल को एक बिल्ली ने काट लिया था, जिसके बाद उचित वैक्सीन लेने के बावजूद वह पूरे एक वर्ष तक अस्वस्थ रहे।

### 4. कैंपस प्लेसमेंट मिलने के बाद विपुल ने नौकरी क्यों छोड़ दी?
नौकरी में उनका दिल नहीं लगा, इसलिए उन्होंने पद छोड़ दिया ताकि वह सिविल सर्विसेज परीक्षा की तैयारी कर सकें।

### 5. विपुल अन्य छात्रों को पढ़ाई और जीवन के बारे में क्या सलाह देते हैं?
वह छात्रों को खेलकूद और मौज-मस्ती के साथ-साथ रोजाना दो से तीन घंटे नियमित व निरंतर पढ़ाई कर जीवन में संतुलन बनाने की सलाह देते हैं।

## प्रेरणा और सबक
विपुल परासर का यह सफर साबित करता है कि साधन सीमित हों और रास्ते में परेशानियां आएं, तब भी अटूट संकल्प से इतिहास रचा जा सकता है।

- **माता-पिता के त्याग का सम्मान:** पारिवारिक कठिनाइयों को अपनी कमजोरी मानने के बजाय उन्हें आगे बढ़ने की प्रेरणा बनाएं, ताकि परिवार के सपनों को साकार किया जा सके।
- **निरंतरता ही असली ताकत:** प्रतिदिन केवल दो से तीन घंटे का नियमित अध्ययन लंबी अवधि में असाधारण परिणाम देता है और परीक्षा के दबाव को समाप्त करता है।
- **मुसीबतों के आगे न झुकना:** गंभीर बीमारी या अप्रत्याशित संकट के समय हिम्मत न हारें; आपकी पहले की गई मेहनत कठिन समय में संबल बनकर सामने आती है।
- **जीवन में सही संतुलन:** पढ़ाई के साथ-साथ दोस्तों, खेलकूद और मनोरंजन को जगह दें ताकि मानसिक ताजगी बनी रहे और जीवन का आनंद कम न हो।
- **अपने वास्तविक लक्ष्य का चयन:** यदि किसी नौकरी में मन न लगे तो उससे अलग होकर अपने असली ध्येय और जनसेवा के रास्तों को चुनने का साहस रखें।

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