# माटीकला बोर्ड की 90 फीसदी सब्सिडी ने बदली पलामू के अर्जुन प्रजापति की तकदीर, कुल्हड़ उद्योग से हर महीने 50 हजार तक मुनाफा

> पलामू के नीलांबर-पीतांबरपुर में अर्जुन प्रजापति ने सरकारी अनुदान वाली मशीनों से पारंपरिक कुल्हड़ निर्माण को आधुनिक रफ्तार दी है। इस उद्यम से वह महीने के 40 से 50 हजार रुपये कमा रहे हैं और अन्य ग्रामीणों को भी काम दे रहे हैं।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-11-04 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/matikala-borda-ki-90-phisadi-sabsidi-ne-badali-palamu-ke-arjun-prajapati-ki-takadira-kulhara-udyoga-se-hara-mahine-50-hajara-taka--56656 · **Language:** Hindi
**Tags:** पलामू, अर्जुन प्रजापति, माटीकला बोर्ड, कुल्हड़ निर्माण, ग्रामीण स्वरोजगार, प्रेस मशीन सब्सिडी

झारखंड के पलामू जिले में मिट्टी के बर्तनों के पारंपरिक शिल्प को आधुनिक तकनीक का सहारा मिलने से ग्रामीण आजीविका की नई राह तैयार हुई है। नीलांबर-पीतांबरपुर प्रखंड के रहने वाले अर्जुन प्रजापति ने माटीकला बोर्ड के सहयोग से मिलने वाली मशीनरी का उपयोग करके कुल्हड़ बनाने के काम को एक व्यवस्थित और मुनाफेदार उद्यम में बदल दिया है। हाथ के धीमे काम की जगह आधुनिक प्रेस मशीन लगने से न केवल काम के घंटे घटे हैं, बल्कि उत्पादन कई गुना बढ़ गया है। चाय की दुकानों और बाजारों में मिट्टी के बर्तनों की बढ़ती पूछ के बीच अर्जुन न केवल घर बैठे आकर्षक आय अर्जित कर रहे हैं, बल्कि अपने साथ गांव के अन्य लोगों को भी नियमित रोजगार उपलब्ध करा रहे हैं।

## माटीकला बोर्ड की योजना और 90 प्रतिशत अनुदान का सहारा
पारंपरिक चाक पर मिट्टी के बर्तन गढ़े जाने में अत्यधिक शारीरिक परिश्रम लगता था और सीमित संख्या में ही बर्तन तैयार हो पाते थे। इस सीमा को तोड़ने के लिए अर्जुन प्रजापति ने बाहर से आधुनिक प्रेस मशीन मंगवाने का फैसला किया। एक प्रेस मशीन की बाजार कीमत करीब 75 हजार रुपये थी, जिसे आम ग्रामीण कारीगर के लिए अकेले जुटाना काफी कठिन था। इस मोड़ पर सरकारी माटीकला बोर्ड की योजना मददगार साबित हुई, जिसके तहत उन्हें मशीन की लागत पर 90 प्रतिशत का भारी अनुदान प्राप्त हुआ। इस आर्थिक संबल के दम पर उन्होंने एक नहीं बल्कि दो प्रेस मशीनें स्थापित कीं। अर्जुन प्रजापति के अनुसार, अरविंद सर के जरिए उन्हें इस सरकारी योजना और उपलब्ध वित्तीय मदद की जानकारी मिली थी, जिसके बाद उन्होंने आवेदन कर इस आधुनिक सेटअप को साकार किया।

## पग मिल और छिलाई तकनीक से तैयार होती है उपयुक्त मिट्टी
कुल्हड़ निर्माण में सबसे संवेदनशील और जरूरी चरण मिट्टी की गुणवत्ता और उसकी संरचना तैयार करना होता है। साधारण गीली मिट्टी सीधे मशीन में नहीं डाली जा सकती, बल्कि उसके लिए भुरभुरी और एकसमान मिट्टी की आवश्यकता होती है। इस प्रक्रिया को आसान और वैज्ञानिक बनाने के लिए पग मिल मशीन का इस्तेमाल किया जाता है। सबसे पहले पग मिल के जरिए मिट्टी को अच्छी तरह से मथा और मिलाया जाता है ताकि उसमें कोई गांठ न रहे। इसके बाद छिलने वाली मशीन की सहायता से मिट्टी को पूरी तरह बारीक, भुरभुरा और सांचे में ढलने योग्य बना दिया जाता है। इस तरह तैयार की गई मिट्टी को प्रेस मशीन के डाई सांचे में डालकर अलग-अलग डिजाइन, मोटाई और आकार के कुल्हड़ तैयार किए जाते हैं। मशीनों को सेट करने की प्रक्रिया बेहद सरल होने की वजह से उत्पादन का पूरा काम सुगम हो गया है।

## उत्पादन क्षमता में भारी उछाल: घंटे में 40 से बढ़कर सैकड़ों कुल्हड़
हाथ से कुल्हड़ बनाने के दौर में एक कुशल कारीगर एक घंटे के भीतर लगभग 40 से 50 कुल्हड़ ही तैयार कर पाता था। दिन भर की कड़ी मशक्कत के बावजूद कुल उत्पादन सीमित रहता था, जिससे बड़े ऑर्डरों की समय पर आपूर्ति मुश्किल हो जाती थी। प्रेस मशीनों के आने से यह समीकरण पूरी तरह बदल गया है। अब एक घंटे में सैकड़ों कुल्हड़ तेजी से तैयार हो जाते हैं। अर्जुन प्रजापति बताते हैं कि उत्पादन क्षमता बढ़ने के साथ-साथ बाजार की पसंद के मुताबिक विभिन्न नए डिजाइनों में कुल्हड़ ढालना बेहद आसान हो गया है। गुणवत्ता और एकसमान फिनिशिंग के कारण बाजार में इन उत्पादों की मांग लगातार बनी रहती है, जिससे व्यवसाय को आसपास के नए बाजारों में फैलाने का अवसर मिल रहा है।

## हर महीने 40 से 50 हजार रुपये की शुद्ध आमदनी
इस ग्रामीण उद्यम के आर्थिक लाभ बेहद उत्साहजनक हैं। अर्जुन प्रजापति के अनुसार, कच्चा माल, बिजली और अन्य संचालन खर्चों को निकालने के बाद वह इस कारोबार से हर महीने करीब 40 से 50 हजार रुपये तक की शुद्ध कमाई कर लेते हैं। कम समय में भारी मात्रा में तैयार होने वाले उत्पाद से लागत घटती है और मुनाफे की गुंजाइश बढ़ जाती है। उनका मानना है कि यदि कारीगर बाजार की वास्तविक मांग का अध्ययन करके योजनाबद्ध तरीके से काम करें, तो मिट्टी के बर्तनों का यह काम परदेस जाकर मजदूरी करने की तुलना में कई गुना अधिक सम्मानजनक और फायदेमंद आजीविका दे सकता है। वर्तमान में उन्होंने खुद के अलावा दो से चार अन्य स्थानीय लोगों को भी इस काम से जोड़ रखा है।

## ग्रामीण महिलाओं के लिए सशक्त रोजगार और समय का सदुपयोग
इस आधुनिक उत्पादन इकाई ने क्षेत्र की महिलाओं को भी घर के नजदीक सम्मानजनक आर्थिक अवसर उपलब्ध कराए हैं। इसी कार्यशाला में काम करने वाली संगीता देवी बताती हैं कि पहले वह केवल घर-गृहस्थी के काम तक सीमित रहती थीं, लेकिन प्रेस मशीन के आने से उन्हें आत्मनिर्भर बनने का जरिया मिल गया है। संगीता देवी लंबे समय से मिट्टी के बर्तनों के काम से जुड़ी रही हैं, लेकिन आधुनिक उपकरण आने के बाद उनकी गति उल्लेखनीय रूप से बढ़ गई है। अब वह अकेले एक घंटे में करीब 150 कुल्हड़ तैयार कर लेती हैं। मशीन संचालन आसान और सुरक्षित होने के कारण महिलाएं बिना अत्यधिक शारीरिक थकान के इस काम को कर पा रही हैं। इस काम से मिलने वाले पारिश्रमिक से बच्चों की पढ़ाई और घर के जरूरी खर्चों में ठोस मदद मिल रही है।

## त्योहारी मांग: दीपावली पर दीयों और कुल्हड़ों का दोहरा उत्पादन
त्योहारों के मौसम में इस इकाई की गतिविधियां और अधिक तेज हो जाती हैं। दीपावली के अवसर पर बाजारों में मिट्टी के दीयों की भारी मांग को देखते हुए यहां कुल्हड़ के साथ-साथ दीयों का भी बड़े पैमाने पर निर्माण किया जा रहा है। पर्व की मांग को समय रहते पूरा करने के लिए कारीगर पूरी तन्मयता से जुटे हैं। अर्जुन प्रजापति और उनके साथियों की यह पहल साबित करती है कि यदि पारंपरिक हस्तशिल्प को सरकारी योजनाओं, उचित सब्सिडी और आधुनिक मशीनों का साथ मिल जाए, तो ग्रामीण अंचल में ही टिकाऊ और स्वावलंबी अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव रखी जा सकती है।

## इसका आप पर असर
सरकारी सब्सिडी आधारित कुल्हड़ उद्योग पारंपरिक कारीगरों और नए ग्रामीण उद्यमियों के लिए कम लागत में स्वावलंबन का एक व्यावहारिक मॉडल पेश करता है।

- **भारत में:** केंद्र व राज्य सरकारों की माटीकला संवर्धन योजनाओं के जरिए आधुनिक मिट्टी प्रसंस्करण और प्रेस मशीनों पर 90 प्रतिशत तक अनुदान उपलब्ध कराया जा रहा है। ग्रामीण कारीगर इस सहायता का लाभ उठाकर न्यूनतम व्यक्तिगत पूंजी से अपना स्वतंत्र विनिर्माण व्यवसाय शुरू कर सकते हैं।
- **पलामू में:** नीलांबर-पीतांबरपुर और आसपास के क्षेत्रों में कुल्हड़ और दीया निर्माण स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन का प्रमुख माध्यम बन रहा है। इससे ग्रामीणों को रोजी-रोटी के लिए बड़े शहरों में पलायन करने की मजबूरी से राहत मिल रही है।
- **महिला कार्यबल:** प्रेस मशीनों के आसान संचालन के कारण ग्रामीण महिलाएं बिना अत्यधिक शारीरिक श्रम के घंटे में 150 तक कुल्हड़ बना रही हैं। यह कमाई सीधे तौर पर घरेलू खर्चों और बच्चों की शिक्षा में योगदान दे रही है।
- **स्थानीय बाजार:** प्लास्टिक और थर्माकोल के विकल्पों के रूप में मिट्टी के बर्तनों की मांग बढ़ने से चाय विक्रेताओं को स्थानीय स्तर पर ही टिकाऊ उत्पाद मिल रहे हैं। इससे छोटे व्यापारियों के लिए आपूर्ति श्रृंखला आसान और किफायती बनी हुई है।

## ऐसा क्यों हुआ
यह आर्थिक बदलाव पारंपरिक चाक की धीमी गति को सरकारी सब्सिडी और उन्नत मशीनरी से बदलकर उत्पादन बढ़ाने की सोच से संभव हुआ है।

- **तकनीकी बाधा का समाधान:** हाथ से कुल्हड़ बनाने में अत्यधिक शारीरिक श्रम लगता था और प्रति घंटे केवल 40 से 50 कुल्हड़ ही बन पाते थे। प्रेस मशीन और पग मिल के आने से उत्पादन प्रति घंटे सैकड़ों इकाइयों तक पहुंच गया।
- **वित्तीय प्रोत्साहन:** करीब 75 हजार रुपये मूल्य की प्रेस मशीन पर माटीकला बोर्ड से 90 प्रतिशत अनुदान मिलने से आवश्यक पूंजी का संकट खत्म हो गया। इस भारी छूट की वजह से अर्जुन प्रजापति एक साथ दो मशीनें स्थापित करने में सक्षम हुए।
- **जागरूकता और मार्गदर्शन:** सरकारी योजनाओं की जमीनी जानकारी न होने से अक्सर पात्र लोग छूट जाते हैं, लेकिन अरविंद सर के जरिए मिली सटीक जानकारी ने आवेदन प्रक्रिया को गति दी। सही मार्गदर्शन ने कारीगर को सीधे संस्थागत योजना से जोड़ दिया।
- **बाजार की अनुकूलता:** चाय प्रेमियों के बीच मिट्टी के कुल्हड़ के प्रति आकर्षण और पर्यावरण अनुकूल बर्तनों की बढ़ती मांग ने तैयार माल की निरंतर बिक्री सुनिश्चित की। इसी मजबूत मांग ने इकाई को महीने में 50 हजार रुपये तक की शुद्ध बचत देने लायक बनाया।

## सवाल-जवाब

### 1. अर्जुन प्रजापति कुल्हड़ निर्माण का यह काम कहां चला रहे हैं?
यह व्यवसाय झारखंड के पलामू जिले के नीलांबर-पीतांबरपुर प्रखंड में चलाया जा रहा है।

### 2. कुल्हड़ बनाने वाली प्रेस मशीन की कीमत कितनी है और कितना अनुदान मिला?
प्रेस मशीन की कीमत करीब 75 हजार रुपये है, जिस पर माटीकला बोर्ड योजना के तहत 90 प्रतिशत सरकारी अनुदान मिला है।

### 3. मिट्टी तैयार करने के लिए किन मशीनों का उपयोग किया जाता है?
मिट्टी को अच्छी तरह मिलाने के लिए पग मिल मशीन और उसे बारीक व भुरभुरा बनाने के लिए छिलने वाली मशीन का उपयोग होता है।

### 4. हाथ से काम करने और मशीन के उत्पादन में क्या फर्क आया है?
पहले हाथ से एक घंटे में केवल 40 से 50 कुल्हड़ बनते थे, जबकि प्रेस मशीन से अब एक घंटे में सैकड़ों कुल्हड़ तैयार हो जाते हैं।

### 5. इस व्यवसाय से अर्जुन प्रजापति को हर महीने कितनी आय हो रही है?
सभी खर्च निकालने के बाद इस काम से महीने में करीब 40 से 50 हजार रुपये तक की शुद्ध कमाई हो रही है।

### 6. संगीता देवी एक घंटे में मशीन से कितने कुल्हड़ तैयार कर लेती हैं?
संगीता देवी प्रेस मशीन की मदद से एक घंटे में करीब 150 कुल्हड़ तैयार कर लेती हैं।

### 7. अर्जुन प्रजापति को इस सरकारी योजना की जानकारी किसके माध्यम से मिली थी?
उन्हें इस सरकारी योजना और अनुदान की जानकारी अरविंद सर के माध्यम से प्राप्त हुई थी।

### 8. दीपावली के मौके पर इस इकाई में किन चीजों का निर्माण किया जा रहा है?
त्योहारी मांग को पूरा करने के लिए कुल्हड़ के साथ-साथ मिट्टी के दीयों का भी बड़े पैमाने पर निर्माण किया जा रहा है।

## प्रेरणा और सबक
पलामू के अर्जुन प्रजापति की यह पहल दर्शाती है कि सही जानकारी, सरकारी मदद और आधुनिक तकनीक अपनाकर पैतृक हुनर को लाभदायक व्यवसाय में कैसे बदला जा सकता है।

- **तकनीक को स्वीकारना:** पारंपरिक काम में नई मशीनों का इस्तेमाल करने से उत्पादन कई गुना बढ़ता है और लागत घटती है। अर्जुन ने पुरानी पद्धतियों से आगे बढ़कर आधुनिक प्रेस और पग मिल को अपनाया।
- **सरकारी योजनाओं का दोहन:** कल्याणकारी योजनाओं और 90 प्रतिशत तक की सब्सिडी के बारे में जागरूक रहकर पूंजी की कमी को दूर किया जा सकता है। सही जानकारी जुटाकर कदम उठाने से वित्तीय जोखिम न्यूनतम हो जाता है।
- **सामुदायिक सशक्तिकरण:** खुद की कमाई बढ़ाने के साथ-साथ गांव के अन्य लोगों और महिलाओं को जोड़कर स्थानीय स्तर पर स्थायी रोजगार दिया जा सकता है। संगीता देवी जैसी महिलाओं का जुड़ाव सामाजिक और आर्थिक दोनों स्तरों पर बदलाव लाता है।
- **पलायन के बजाय स्थानीय समाधान:** बाहर जाकर मजदूरी करने की जगह अपने ही गांव में बाजार की मांग के अनुरूप उत्पादन करके अधिक सम्मानजनक और सुरक्षित कमाई की जा सकती है।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._