# मेड़ पर सहजन लगाकर अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं किसान, जानिए क्या है तरीका

> धान और गेहूं जैसी पारंपरिक फसलों के साथ किसान अपने खेत की खाली मेड़ पर सहजन उगाकर अपनी उपज और आमदनी में बढ़ोतरी कर सकते हैं।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-10-15 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/mera-para-sahjan-lagakara-atirikta-kamai-kara-sakate-hain-kisana-janie-kya-hai-tarika-47723 · **Language:** Hindi
**Tags:** सहजन की खेती, मोरिंगा की खेती, कृषि मुनाफा, किसान आमदनी, देवघर कृषि, खेत की मेड़

अक्सर किसान अपनी जमीन पर धान, गेहूं, आलू और अलग-अलग मौसमी सब्जियों की पैदावार करके अपने घर-परिवार का भरण-पोषण करते हैं। अगर मौसम अनुकूल रहे और पैदावार अच्छी मिल जाए तो ठीक-ठाक गुजर-बसर हो जाती है, मगर कई बार मौसम की बेरुखी या मंडियों में उपज का सही भाव न मिलने की वजह से उम्मीद के मुताबिक मुनाफा हाथ नहीं लग पाता। ऐसी अनिश्चितताओं के बीच थोड़ी सी व्यावहारिक सूझबूझ अपनाकर खेत के भीतर ही कमाई का एक नया जरिया तैयार किया जा सकता है। ज्यादातर किसान अपने खेतों की मेड़ों को बिल्कुल खाली छोड़ देते हैं, जबकि थोड़ी सी योजना के साथ इसी अप्रयुक्त जगह का बेहतर इस्तेमाल कर अतिरिक्त उपज निकाली जा सकती है। देवघर की कृषि विशेषज्ञ अंबिका के अनुसार, किसान अपने खेतों की मेड़ों पर मोरिंगा यानी सहजन के पौधे रोपकर अपनी आमदनी को बढ़ाने का प्रयास कर सकते हैं। इस रणनीति की सबसे बड़ी खूबी यह है कि किसानों को अपनी मुख्य नकदी या पारंपरिक फसलों को छोड़ने की तनिक भी आवश्यकता नहीं पड़ती। धान, गेहूं या सब्जियों की मूल खेती अपनी जगह सामान्य रूप से चलती रहती है और साथ ही साथ मेड़ों पर सहजन के पेड़ भी विकसित हो जाते हैं।

## साल भर मांग में रहने वाला बहुउपयोगी पौधा
सहजन एक ऐसी वनस्पति है जिसकी बाजार में मांग पूरे बारह महीने बनी रहती है। इस पौधे की खासियत यह है कि इसके पत्ते, फूल और फलियां सभी का अलग-अलग ढंग से इस्तेमाल किया जाता है। कई इलाकों में सहजन की फलियों को सुटी के नाम से भी जाना जाता है, जिसे लोग बड़े चाव से सब्जी के रूप में पकाते हैं। इसके अलावा इसके पोषक पत्तों का उपयोग भी खान-पान में व्यापक रूप से किया जाता है। विभिन्न हिस्सों के कई तरह के उपयोग होने के कारण मंडियों में इसकी निरंतर मांग बनी रहती है। अगर कोई किसान अपने खेत की खाली सीमा या मेड़ पर इसके पौधे लगाता है, तो उसे मुख्य फसल की पैदावार के साथ-साथ सहजन से भी अतिरिक्त उपज मिल सकती है। इस प्रकार जिस मेड़ पर अब तक कुछ भी पैदा नहीं हो रहा था, वही बंजर पड़ी जगह आमदनी के एक नए स्रोत में बदल सकती है।

## पौधे रोपते समय इन सावधानियों का रखें ध्यान
मेड़ पर सहजन की बुवाई या रोपाई करने से पहले किसानों को अपने खेत की भौगोलिक बनावट और मिट्टी की स्थिति का भली-भांति आकलन कर लेना चाहिए। पौधों को इस तरह से व्यवस्थित करना बेहद जरूरी है कि जैसे-जैसे उनकी टहनियां और डालियां बढ़ें, वे मुख्य फसल के नियमित कृषि कार्यों में कोई बाधा न डालें। खेत में उग रही अन्य फसलों तक पर्याप्त धूप पहुंचती रहे और उनकी बढ़वार के लिए खुली जगह बनी रहे, इसका विशेष ध्यान रखना पड़ता है। यदि पौधों के बीच की दूरी का सही पैमाना रखा जाए और समय पर उनकी डालियों की छंटाई की जाती रहे, तो मेड़ का उपयोग बिना किसी नुकसान के किया जा सकता है। चूंकि हर खेत की मिट्टी, जल निकासी और स्थितियां एक समान नहीं होती हैं, इसलिए पौधे लगाने से पूर्व स्थानीय कृषि विशेषज्ञों से सही दूरी, रोपाई की विधि और देखभाल के तौर-तरीकों की जानकारी लेना ज्यादा सुरक्षित और फायदेमंद रहता है।

## उपज और देखभाल से बढ़ेगा कुल मुनाफा
कृषि लागत को देखते हुए छोटी से छोटी जगह का सटीक सदुपयोग करना किसानों के लिए बेहद अहम साबित हो सकता है। जब किसान खेत तैयार करते हैं, तो जुताई, बीज, खाद, कीटनाशक, सिंचाई और मजदूरों की मजदूरी पर काफी पूंजी लगानी पड़ती है। ऐसे में यदि मेड़ की खाली पड़ी जमीन पर भी कोई उपयोगी और व्यावसायिक पौधा तैयार हो जाता है, तो उससे प्राप्त उपज का उपयोग या तो घर-परिवार के पोषण में हो सकता है या फिर उसे स्थानीय बाजार में बेचकर नकद पैसे कमाए जा सकते हैं। इस तरीके से होने वाली कुल अतिरिक्त कमाई इस बात पर निर्भर करेगी कि खेत की मेड़ पर कितने पौधे लगाए गए हैं, उनकी देखभाल किस स्तर की है, पौधों से कितना उत्पादन प्राप्त हुआ है और उस समय मंडी में सहजन का क्या भाव चल रहा है।

## इसका आप पर असर
खेत की सीमाओं का सदुपयोग करने से किसानों को बिना अतिरिक्त जमीन खरीदे अपनी आय बढ़ाने का सीधा रास्ता मिलता है।

- **सीमित जमीन में अतिरिक्त उपज:** किसान अपनी मुख्य फसल को नुकसान पहुंचाए बिना मेड़ से अतिरिक्त उत्पादन ले सकते हैं। इससे खेत का प्रत्येक हिस्सा आर्थिक रूप से उपयोगी बन जाता है।
- **लागत की भरपाई में मददगार:** बीज, खाद और मजदूरी पर होने वाले भारी खर्च की भरपाई मेड़ से बिकने वाले सहजन से हो सकती है। यह आमदनी किसानों को मौसमी घाटे से बचाने में सहारा देती है।
- **घरेलू पोषण और बाजार का लाभ:** सहजन की पत्तियां और फलियां घर के खाने में इस्तेमाल होकर पोषण सुरक्षा देती हैं। बची हुई उपज को स्थानीय बाजार में बेचकर तत्काल नकदी हासिल की जा सकती है।
- **विविधीकरण से जोखिम में कमी:** यदि किसी कारण मुख्य फसल को नुकसान पहुंचता है, तो मेड़ पर लगे सहजन से कुछ कमाई सुनिश्चित रहती है। इससे किसान बाजार के उतार-चढ़ाव का बेहतर सामना कर सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
पारंपरिक खेती में मौसम और गिरती कीमतों के कारण होने वाले नुकसान से बचाव के लिए कृषि विशेषज्ञ खाली जगहों के सदुपयोग पर जोर दे रहे हैं।

- **अप्रयुक्त मेड़ों का व्यावसायिक उपयोग:** अधिकांश खेतों में मेड़ें बंजर या खाली पड़ी रहती हैं और उनसे कोई वित्तीय लाभ नहीं मिलता। इन सीमाओं पर नकदी पौधा लगाने से पूरी जोत की उत्पादकता स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है।
- **सहजन की बारहमासी मांग:** सहजन की फलियों, फूलों और पोषक पत्तों की बाजार में पूरे वर्ष निरंतर मांग बनी रहती है। यही कारण है कि स्थानीय मंडियों में इसकी उपज आसानी से बिक जाती है।
- **स्थानीय विशेषज्ञों द्वारा मार्गदर्शन:** देवघर की विशेषज्ञ अंबिका ने किसानों को जागरूक करने के लिए यह सुझाव साझा किया है। उनका उद्देश्य मुख्य फसलों को छेड़े बिना किसानों को अतिरिक्त आय का व्यवहारिक विकल्प देना है।

## सवाल-जवाब

### 1. खेत की मेड़ पर सहजन लगाने का मुख्य फायदा क्या है?
मुख्य फसल को हटाए बिना किसान खाली पड़ी मेड़ से सहजन की अतिरिक्त उपज और आमदनी प्राप्त कर सकते हैं।

### 2. सहजन के कौन-कौन से हिस्से बाजार में बिकते हैं?
सहजन के फल यानी फलियां, फूल और इसके पोषक पत्तों की बाजार में साल भर मांग बनी रहती है।

### 3. सहजन की फली को स्थानीय भाषा में किस नाम से भी जाना जाता है?
कई क्षेत्रों में सहजन के फल या फली को सुटी के नाम से भी पुकारा जाता है।

### 4. मेड़ पर पौधे लगाते समय किस बात का विशेष ध्यान रखना चाहिए?
पौधों को उचित दूरी और छंटाई के साथ लगाना चाहिए ताकि उनकी डालियां मुख्य फसल की धूप और कार्य में रुकावट न बनें।

### 5. सहजन से होने वाली कमाई किन कारकों पर निर्भर करती है?
यह कमाई पौधों की कुल संख्या, उनकी उचित देखभाल, कुल उपज और बाजार में मिलने वाले तात्कालिक भाव पर निर्भर करती है।

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