नीरज ने छोड़ी दिल्ली की नौकरी, उत्तराखंड के पहाड़ों से शुरू किया करोड़पति बनने का अनोखा बिजनेस झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाले एमबीए पास नीरज ने उत्तराखंड के अपने पैतृक गांव लौटकर बुरांश के फूलों से अनोखी गुलाबी चाय बनाने का बिजनेस शुरू किया। आज उनकी इस हर्बल टी का कारोबार करोड़ों रुपये… झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाले नीरज ने अपनी नौकरी को अलविदा कहकर उत्तराखंड के पहाड़ों से एक अनूठा बिजनेस खड़ा कर दिया है। उनके पास अपने पैतृक गांव में कई तरह के फूल और भेड़ें हैं, जिनमें बुरांश का फूल बेहद खास है। इस फूल से एक विशेष गुलाबी चायपत्ती तैयार की जाती है, जो नीले और गुलाबी रंग की होती है और स्वाद में भी काफी बेहतरीन होती है। इस अनोखी चाय की कीमत बाजार में 100 ग्राम के लिए ₹100 तक है, जिससे यह ₹1000 प्रति किलोग्राम के भाव बिकती है। इसके जरिए वह शानदार कमाई कर रहे हैं और उनका यह कारोबार आज एक बड़े मुकाम पर पहुंच चुका है। फूलों की चाय के अलावा नीरज प्राकृतिक सिल्क का कपड़ा भी तैयार करते हैं, जिसकी कीमत बाजार में ₹80,000 तक पहुंच जाती है। उन्होंने बताया कि उन्होंने घर पर ही भेड़ें पाल रखी हैं और सारा काम स्थानीय स्तर पर ही किया जाता है। आज उनका अपना खुद का स्थापित ब्रांड है और उनके उत्पाद पैन इंडिया स्तर पर सप्लाई किए जाते हैं। इस सफलता के सफर में उन्हें सरकारी योजनाओं का भी भरपूर लाभ मिला है, और वह विशेष रूप से नाबार्ड से जुड़े हुए हैं। सरकारी मदद और अपनी मेहनत के दम पर उन्होंने इस काम को एक नया आयाम दिया है। नाबार्ड से मिलती है आर्थिक मदद और सब्सिडी सरकारी संस्था नाबार्ड से जुड़ने के फायदों के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि जो बुनकर या दस्तकार अपने हाथों से खुद चीजें तैयार करते हैं, उन्हें नाबार्ड के जरिए लोन पर भारी सब्सिडी मिल जाती है। उनके अनुसार इस व्यवस्था के तहत उन्हें 90% तक की सब्सिडी प्राप्त होती है। इसके अलावा देश भर में लगने वाले सरकारी मेलों और प्रदर्शनियों में उन्हें अपने स्टॉल लगाने का मौका बिल्कुल मुफ्त मिलता है। इन दोनों सुविधाओं ने उनके व्यापार को आगे बढ़ाने और देश के कोने-कोने तक पहुंचाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। उत्पाद की विविधता के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि उनके पास ग्राहकों के लिए बुरांश, कफल और मसाला चायपत्ती जैसे कई विकल्प उपलब्ध हैं। मसाला चायपत्ती पहाड़ी इलाकों में पाए जाने वाले प्राकृतिक मसालों को पीसकर बनाई जाती है। वहीं कफल एक गुलाबी रंग का पहाड़ी फूल है, जिसकी खेती उनके अपने क्षेत्र में होती है। वह अपने क्षेत्र में इसकी खेती करवाते हैं और फिर इसे सुखाकर पैकेजिंग का काम पूरा करवाते हैं। यह सारा काम गांव की महिलाओं के द्वारा किया जाता है, जिन्हें वह खुद खास तौर पर ट्रेनिंग देते हैं। करोड़ों का सालाना टर्नओवर और बढ़ती मांग उनकी इस खास चायपत्ती की बाजार में जबरदस्त मांग बनी हुई है। उन्होंने बताया कि ₹1000 किलो बिकने वाली इस चाय की मांग इतनी अधिक है कि वह ग्राहकों की जरूरत को पूरा नहीं कर पाते हैं। इस हर्बल टी की खासियत यह है कि कप में इसकी बहुत थोड़ी सी मात्रा ही काफी होती है और इसके लिए अलग से चीनी या किसी अन्य चीज को मिलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। उनके ग्राहक भारत के हर एक राज्य में मौजूद हैं और आज उनका सालाना टर्नओवर करोड़ों रुपये तक पहुंच चुका है। दिल्ली में एमबीए की डिग्री के बाद उन्होंने करीब 40 साल नौकरी की, लेकिन उनका मन हमेशा से कुछ अपना करने का था। अपनी खुद की जमीन और गांव में पुश्तैनी खेती-बाड़ी होने के कारण उनके मन में यह विचार आया कि क्यों न इसका बेहतर उपयोग किया जाए। यहीं से उन्हें यह आइडिया आया कि इस पहाड़ी फूल की चाय को केवल पहाड़ों तक ही क्यों सीमित रखा जाए, बल्कि इसे देश के हर नागरिक तक पहुंचाया जाना चाहिए। इसी सोच के साथ यह सिलसिला शुरू हुआ और आज उनके साथ 200 से अधिक महिलाएं जुड़कर पूरी तरह आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। इसका आप पर असर यह अनोखी सफलता इस बात का प्रमाण है कि पारंपरिक पहाड़ी संसाधनों और सरकारी योजनाओं के सही तालमेल से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किया जा सकता है। • भारत में: कृषि और हर्बल उत्पादों से जुड़ा यह मॉडल देश के अन्य ग्रामीण युवाओं को अपने पैतृक क्षेत्रों में लौटकर नए रोजगार के अवसर तलाशने की प्रेरणा देता है। • उत्तराखंड में: स्थानीय निवासियों और विशेषकर ग्रामीण महिलाओं को घर के पास रोजगार मिलने से पलायन की समस्या कम होती है और आर्थिक स्थिति में सुधार आता है। ऐसा क्यों हुआ यह बिजनेस पारंपरिक पहाड़ी वनस्पतियों की अनूठी खूबियों और सरकारी वित्तीय सहायता के सही संयोजन के कारण तेजी से फला-फूलता गया। • प्राकृतिक संसाधन की उपलब्धता: उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में प्राकृतिक रूप से उगने वाले बुरांश और कफल जैसे फूलों की मौजूदगी ने इस विशेष हर्बल टी के उत्पादन का आधार तैयार किया। • सरकारी योजनाओं का सहयोग: नाबार्ड के माध्यम से बुनकर और निर्माताओं को मिलने वाली 90% तक की भारी सब्सिडी और मुफ्त स्टॉल की सुविधा ने शुरुआती वित्तीय बाधाओं को दूर किया। • बाजार की बढ़ती मांग: मिलावट रहित और स्वास्थ्यवर्धक हर्बल उत्पादों के प्रति देश भर के उपभोक्ताओं में बढ़ती रुचि ने इस अनोखे उत्पाद को करोड़ों के टर्नओवर तक पहुँचाया। सवाल-जवाब 1. नीरज मूल रूप से किस राज्य के रहने वाले हैं और उनका बिजनेस कहां है? नीरज झारखंड की राजधानी रांची में रह रहे हैं, जबकि उनका पैतृक गांव और बिजनेस उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्र में स्थित है। 2. यह खास गुलाबी चाय किस फूल से बनाई जाती है? यह अनोखी गुलाबी चायपत्ती बुरांश के फूलों से तैयार की जाती है, जो नीले और गुलाबी रंग की होती है। 3. इस चायपत्ती की बाजार में कीमत क्या है? इस चायपत्ती की कीमत 100 ग्राम के लिए ₹100 तक है, जिससे यह ₹1000 प्रति किलोग्राम के भाव बिकती है। 4. इस व्यवसाय में किस सरकारी संस्था से मदद मिलती है? इस व्यवसाय को आगे बढ़ाने के लिए उन्हें नाबार्ड से जोड़ा गया है, जिसके माध्यम से लोन पर सब्सिडी और मुफ्त स्टॉल मिलते हैं। 5. चाय के अलावा वह और कौन सा उत्पाद बनाते हैं? चाय के अलावा वह प्राकृतिक सिल्क का कपड़ा भी तैयार करते हैं, जो ₹80,000 तक बिकता है। 6. इस बिजनेस से कितने लोगों को रोजगार मिला है? आज उनके इस कारोबार के साथ 200 से अधिक गांव की महिलाएं जुड़ी हुई हैं जो प्रशिक्षित होकर आत्मनिर्भर बन चुकी हैं। प्रेरणा और सबक नीरज की यह यात्रा ग्रामीण उद्यमिता और पारंपरिक संसाधनों के सही उपयोग के कई महत्वपूर्ण सबक देती है। • अपनी जड़ों की ओर लौटना: पारंपरिक ज्ञान और पैतृक भूमि का सही उपयोग करके महानगरों की नौकरी छोड़कर भी स्थानीय स्तर पर बड़ा मुकाम हासिल किया जा सकता है। • महिला सशक्तिकरण: व्यवसाय के हर चरण में स्थानीय महिलाओं को शामिल करके और उन्हें प्रशिक्षित करके सामाजिक बदलाव लाया जा सकता है। • सरकारी योजनाओं का लाभ: नाबार्ड जैसी संस्थाओं की सब्सिडी और सरकारी मंचों का उपयोग करके बिजनेस की लागत को कम किया जा सकता है। • गुणवत्ता और नवीनता: बाजार की मांग के अनुसार अनोखे और स्वास्थ्यवर्धक उत्पादों को पेश करके ग्राहकों का भरोसा जीता जा सकता है। https://trendkia.com/jharkhand/niraja-ne-chhori-delhi-ki-naukari-uttarakhand-ke-paharon-se-shuru-kiya-karorapati-banane-ka-anokha-bijanesa-32832 TrendKia — Har trend, sabse pehle.