# पलामू के किसान संतरे की बागवानी से कमा सकते हैं लाखों रुपये, जानिए एक एकड़ की लागत और कमाई का पूरा गणित

> झारखंड के पलामू जिले में संतरे और नींबू वर्गीय फलों की खेती की संभावनाएं रंग ला रही हैं। क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र के सफल प्रयोगों के बाद किसान एक एकड़ में लगभग 50 से 60 हजार रुपये लगाकर 4 से 5 लाख रुपये तक की सकल आमदनी हासिल कर सकते हैं।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-11-06 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/palamau-ke-kisana-sntare-ki-bagavani-se-kama-sakate-hain-lakhon-rupaye-janie-eka-ekara-ki-lagata-aura-kamai-ka-pura-ganita-57090 · **Language:** Hindi
**Tags:** पलामू संतरे की खेती, कृषि समाचार, संतरे का गणित, झारखंड किसान, बागवानी, सिट्रस फार्मिंग

झारखंड के पलामू जिले में परंपरागत फसलों से अलग हटकर बागवानी अपनाने वाले किसानों के लिए कमाई के नए रास्ते खुल रहे हैं। पलामू के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र में संतरे और अन्य नींबू वर्गीय फलों के पौधों का सफल परीक्षण किया गया है, जहाँ तैयार पेड़ों पर फल भी आने लगे हैं। इस सफलता से अब स्थानीय किसानों को गुणवत्तापूर्ण संतरे उगाने के लिए नागपुर या इंदौर जैसे पारंपरिक केंद्रों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि उपयुक्त जल निकासी और उचित देखभाल के जरिए किसान संतरे की बागवानी से हर साल लाखों रुपये का मुनाफा कमा सकते हैं।

## सिट्रस की किस्में और पलामू का वातावरण
कृषि वैज्ञानिक डॉ. अखिलेश शाह के अनुसार संतरे और मौसमी जैसे फल सिट्रस यानी नींबू वर्गीय प्रजाति में आते हैं। पलामू के मौसम और मिट्टी को ध्यान में रखते हुए किसान नागपुर संतरा, इंदौर संतरा और मौसमी की किस्मों की खेती कर सकते हैं। सिट्रस वर्ग के पौधों की एक बड़ी खासियत यह है कि एक बार सही ढंग से स्थापित हो जाने के बाद ये पौधे सामान्य परिस्थितियों में कम पानी में भी कुछ समय तक जीवित रहने की क्षमता रखते हैं। हालांकि, व्यावसायिक रूप से बेहतर फल उत्पादन हासिल करने के लिए समय पर सिंचाई और पौधों की उचित देखभाल बेहद जरूरी होती है।

## खेत की तैयारी और पौधों का रोपण
संतरे का बाग लगाने के लिए जमीन का चयन करते समय विशेष सावधानी बरतने की सलाह दी गई है। ऐसी जमीन जहाँ पानी का जमाव होता हो, वह संतरे के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाती। पलामू की ऊपरी और अच्छी जल निकासी वाली भूमि इस खेती के लिए सबसे बेहतर है। एक एकड़ खेत में 5×5 मीटर की दूरी रखते हुए लगभग 160 पौधे लगाए जा सकते हैं। रोपण से पहले करीब एक मीटर गहरा गड्ढा खोदा जाता है। इन गड्ढों में मिट्टी के साथ सड़ी हुई गोबर की खाद और आवश्यक उर्वरकों का मिश्रण भरकर पौधों की रोपाई की जाती है।

## एक एकड़ में लागत और सिंचाई व्यवस्था
एक एकड़ क्षेत्रफल में साइट्रस का बाग स्थापित करने में शुरुआती अनुमानित लागत 50 हजार से 60 हजार रुपये के बीच आती है। इस लागत में खेत की तैयारी, गड्ढों का निर्माण, खाद, उर्वरक और पौधे शामिल हैं। पानी की बचत और पौधों की जड़ों तक संतुलित नमी बनाए रखने के लिए किसान टपक सिंचाई प्रणाली यानी ड्रिप इरिगेशन का भी उपयोग कर सकते हैं। टपक सिंचाई से न केवल पानी की बर्बादी रुकती है, बल्कि पौधों का विकास भी तेजी से होता है।

## उत्पादन का अनुमान और सकल आमदनी
क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र में किए गए परीक्षणों के दौरान संतरे के एक परिपक्व पेड़ से 50 से 100 किलोग्राम तक फल का उत्पादन दर्ज किया गया है। यदि किसान एक एकड़ में 160 पेड़ तैयार करते हैं और औसतन प्रति पेड़ 50 किलोग्राम संतरे का उत्पादन मिलता है, तो कुल पैदावार लगभग 8 हजार किलोग्राम यानी 8 टन हो जाएगी। बाजार में संतरे का थोक या सामान्य मूल्य 50 से 60 रुपये प्रति किलोग्राम रहने पर किसान एक एकड़ से करीब 4 लाख से 5 लाख रुपये तक की सकल आमदनी प्राप्त कर सकते हैं।

## फलों का समय चक्र और संभावी क्षेत्र
संतरे के पौधों में रोपण के तीसरे साल से फल आने की शुरुआत हो सकती है। हालांकि, व्यावसायिक स्तर पर भरपूर और गुणवत्तापूर्ण फल प्राप्त करने के लिए किसानों को लगभग पांच साल तक का इंतजार करना पड़ सकता है। शुरुआती तीन से चार वर्षों में पौधों की कटाई-छंटाई, सिंचाई और कीट नियंत्रण पर विशेष ध्यान देना होता है। पलामू जिले के चियांकी, पाटन, सतबरवा और चैनपुर जैसे इलाकों में संतरे और नींबू वर्गीय फलों की खेती की अपार संभावनाएं देखी गई हैं, जहाँ के किसान इसे अपनाकर अपनी आर्थिक स्थिति मजबूत कर सकते हैं।

## इसका आप पर असर
पलामू में संतरे की सफल खेती से स्थानीय किसानों की आय बढ़ाने और पारंपरिक खेती पर निर्भरता घटाने में बड़ी मदद मिलेगी।

- **झारखंड में:** राज्य के किसानों को संतरे और मौसमी के पौधे तथा तकनीक स्थानीय स्तर पर मिलेगी, जिससे नागपुर या इंदौर से पौधे मंगाने की जरूरत नहीं पड़ेगी।
- **पलामू में:** चियांकी, पाटन, सतबरवा और चैनपुर के किसान एक एकड़ में 50-60 हजार रुपये का निवेश कर 4 से 5 लाख रुपये तक की सकल आमदनी का नया जरिया बना सकते हैं।
- **उपभोक्ताओं के लिए:** स्थानीय बाजार में नागपुर संतरा और मौसमी जैसे ताजे सिट्रस फल कम परिवहन लागत पर आसानी से उपलब्ध हो सकेंगे।
- **तकनीकी बदलाव:** किसान टपक सिंचाई प्रणाली अपनाकर कम पानी वाले इलाकों में भी बागवानी को लंबे समय तक टिकाऊ बना सकते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
पलामू के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र में सिट्रस फलों पर किए गए सफल शोध के कारण संतरे की खेती की नई संभावनाएं उजागर हुई हैं।

- **शोध में सफलता:** अनुसंधान केंद्र में लगाए गए नागपुर और इंदौर किस्म के संतरे के पेड़ों में 50 से 100 किलो तक बेहतर फल उत्पादन दर्ज किया गया।
- **अनुकूल परिस्थितियां:** पलामू की ऊपरी और जल निकासी वाली जमीन सिट्रस पौधों के लिए बेहद मुफीद साबित हुई है।
- **कम पानी में टिकाऊ:** एक बार पौधे जम जाने के बाद कम पानी में भी जीवित रहने की क्षमता के कारण यह शुष्क इलाकों के लिए उपयोगी है।

## सवाल-जवाब

### 1. पलामू में संतरे की कौन-कौन सी किस्में उगाई जा सकती हैं?
पलामू में नागपुर संतरा, इंदौर संतरा और मौसमी (साइट्रस प्रजाति) जैसी किस्मों की खेती की जा सकती है।

### 2. एक एकड़ में संतरे के कितने पौधे लगाए जा सकते हैं?
एक एकड़ खेत में 5×5 मीटर की दूरी रखते हुए लगभग 160 पौधे लगाए जा सकते हैं।

### 3. संतरे का बाग लगाने में एक एकड़ में कितनी लागत आती है?
एक एकड़ में संतरे का बाग स्थापित करने की अनुमानित लागत करीब 50 हजार से 60 हजार रुपये आती है।

### 4. संतरे के एक पेड़ से कितना उत्पादन मिल सकता है?
क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र के अनुसार एक पेड़ से 50 से 100 किलोग्राम तक संतरे का उत्पादन मिल सकता है।

### 5. एक एकड़ से कितनी कमाई की संभावना है?
औसतन 8 हजार किलो उत्पादन होने और 50-60 रुपये प्रति किलो भाव मिलने पर 4 से 5 लाख रुपये तक की सकल आमदनी हो सकती है।

### 6. संतरे के पौधे में फल आने में कितना समय लगता है?
पौधों में तीसरे साल से फल आने शुरू हो सकते हैं, लेकिन व्यावसायिक उत्पादन के लिए लगभग 5 साल तक का इंतजार करना पड़ सकता है।

## प्रेरणा और सबक
पारंपरिक धान-गेहूं की खेती से आगे बढ़कर व्यावसायिक बागवानी अपनाने वाले किसानों के लिए पलामू मॉडल प्रेरणादायी है।

- **विविधता अपनाएं:** केवल पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहने की जगह सिट्रस फलों जैसी उच्च मूल्य वाली नकदी फसलों को प्राथमिकता दें।
- **स्थानीय संसाधनों का उपयोग:** क्षेत्रीय कृषि केंद्रों के शोध और तकनीकों का लाभ उठाकर शुरुआती जोखिम को कम करें।
- **आधुनिक तकनीक:** ड्रिप इरिगेशन और वैज्ञानिक खाद प्रबंधन का इस्तेमाल कर प्रति एकड़ मुनाफा बढ़ाएं।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._