# पलामू के चैनपुर में मंडुआ की खेती का पुनरुत्थान, कुंती देवी ने दो कट्ठे जमीन से शुरू की रागी की नई शुरुआत

> झारखंड के पलामू जिले में महिला किसान कुंती देवी ने प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद दो कट्ठे जमीन पर रागी की पारंपरिक खेती फिर से शुरू की है। बढ़ते पोषण महत्व और ₹5,205 प्रति क्विंटल के सरकारी एमएसपी के बीच मोटा अनाज अब ग्रामीणों के लिए कमाई का नया माध्यम बन रहा है।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-09-03 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/palamu-ke-chainpur-men-mndua-ki-kheti-ka-punarutthana-kunti-devi-ne-do-katthe-jamina-se-shuru-ki-ragi-ki-nai-shuruata-26903 · **Language:** Hindi
**Tags:** पलामू, रागी की खेती, कुंती देवी, मोटा अनाज, एमएसपी, कृषि, झारखंड

खानपान की बदलती आदतों और पारंपरिक आहार के प्रति बढ़ते रुझान ने कृषि क्षेत्र में भी बड़ा बदलाव ला दिया है। झारखंड के पलामू जिला अंतर्गत चैनपुर प्रखंड की रहने वाली महिला किसान कुंती देवी ने इस बदलाव को अपनाते हुए रागी यानी मंडुआ की खेती की दोबारा शुरुआत की है। कृषि विभाग के विशेष प्रशिक्षण से प्रोत्साहन मिलने के बाद उन्होंने अपनी दो कट्ठे जमीन में रागी के बीज बोए हैं। आधुनिक समय में गेहूं और चावल की अत्यधिक खपत के बीच मोटे अनाज का यह पुनरुत्थान न केवल ग्रामीण स्वास्थ्य में सुधार ला रहा है, बल्कि छोटे किसानों के लिए आर्थिक सशक्तिकरण की नई उम्मीदें भी जगा रहा है।

 

## बचपन की यादें और प्रशिक्षण के बाद नई शुरुआत

कुंती देवी के लिए मंडुआ की खेती पूरी तरह से नई नहीं है। अपने बचपन के दिनों को याद करते हुए उन्होंने बताया कि उनके घर और मायके दोनों जगह पारंपरिक रूप से मंडुआ उगाया जाता था। उस समय इसके उत्पादन, रख-रखाव और भोजन में उपयोग की जानकारी उन्हें स्वाभाविक रूप से मिल गई थी। हालांकि, समय बीतने के साथ गांव में मोटे अनाज की खेती धीरे-धीरे बंद हो गई और लोग अन्य फसलों की ओर शिफ्ट हो गए। हाल ही में जब उन्हें कृषि संबंधी प्रशिक्षण दिया गया, तो उनका रुझान फिर से इस पुरानी फसल की तरफ बढ़ा।

प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान उन्हें आत्मा संस्था के माध्यम से रागी के गुणवत्तापूर्ण बीज प्राप्त हुए, जिन्हें उन्होंने अपनी दो कट्ठे भूमि पर बोया। फसल की शुरुआती अवस्था में जब खेतों में छोटे-छोटे अंकुर निकलने लगे, तो गांव के कई लोगों ने इसे सामान्य घास समझ लिया। लेकिन बचपन के अनुभव के कारण कुंती देवी को पूरा विश्वास था कि ये रागी के ही पौधे हैं। उनके परिवार में अतीत से ही मोटे अनाज के सेवन की परंपरा रही है। ग्रामीण जीवन में मक्के का घटा, ज्वार की रोटी और मंडुआ की रोटी जैसे पारंपरिक व्यंजन नियमित खान-पान का हिस्सा हुआ करते थे।

प्रशिक्षण सत्रों में विशेषज्ञों ने उन्हें मोटे अनाज के उच्च पोषाहार मूल्य और खेती की बारीकियों से अवगत कराया। गेहूं और चावल की तुलना में रागी में कैल्शियम, फाइबर और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो शरीर को स्वस्थ रखने में मददगार हैं। इन्हीं स्वास्थ्य लाभों को ध्यान में रखते हुए कुंती देवी ने इसे दोबारा उगाने का फैसला किया। यदि इस सीजन में उपज संतोषजनक रहती है और स्थानीय बाजार में बेहतर दाम मिलते हैं, तो वह आगामी वर्षों में बड़े भूभाग पर रागी की खेती का विस्तार करने की योजना बना रही हैं।

 

## एमएसपी और अंतरराष्ट्रीय बाजार में रागी की मांग

रागी और अन्य मोटे अनाज के प्रति बढ़ती वैश्विक और राष्ट्रीय जागरूकता ने किसानों के लिए वाणिज्यिक अवसर भी खोले हैं। केंद्र सरकार ने खरीफ विपणन सीजन 2026-27 के लिए रागी का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) ₹5,205 प्रति क्विंटल निर्धारित किया है। वहीं, सरकारी आंकड़ों के अनुसार इसकी औसत उत्पादन लागत ₹3,470 प्रति क्विंटल आंकी गई है। लागत और समर्थन मूल्य के बीच का यह अंतर किसानों को बेहतर मुनाफा देने वाला माना जा रहा है।

केवल घरेलू बाजार ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी फिंगर मिलेट (रागी) की मांग में तेजी आई है। वर्ष 2026 के आंकड़ों के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारतीय साबुत रागी की निर्यात दर लगभग 420 डॉलर से 560 डॉलर प्रति टन के बीच दर्ज की गई है। भारतीय मुद्रा में यह कीमत लगभग ₹36 से ₹48 प्रति किलोग्राम के आसपास बैठती है। हालांकि, निर्यात की जाने वाली फसल का वास्तविक मूल्य उसकी गुणवत्ता, सफाई, पैकेजिंग मानकों और निर्यातक एजेंसियों के मापदंडों पर निर्भर करता है।

 

## कृषि वैज्ञानिक का आकलन: प्रति एकड़ लागत और मुनाफा

रागी की खेती के अर्थशास्त्र पर प्रकाश डालते हुए कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार ने बताया कि यह फसल कम लागत में अधिक लाभ देने में सक्षम है। डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार, यदि एक एकड़ खेत में रागी की सही ढंग से देखरेख की जाए, तो औसतन 8 से 10 क्विंटल तक की उपज प्राप्त की जा सकती है। यदि किसान इस फसल को सरकार द्वारा निर्धारित ₹5,205 प्रति क्विंटल के समर्थन मूल्य पर बेचते हैं, तो उन्हें प्रति एकड़ लगभग ₹50,000 से ₹60,000 की सकल आय (विशेष रूप से 10 क्विंटल पर ₹52,050) प्राप्त हो सकती है।

लागत के मोर्चे पर बात करें तो एक एकड़ भूमि में रागी की बुआई से लेकर कटाई तक का कुल खर्च लगभग ₹15,000 से ₹20,000 आता है। इस प्रकार लागत घटाने के बाद भी किसान को प्रति एकड़ एक सम्मानजनक शुद्ध लाभ मिलता है। यदि किसान अपनी उपज को स्थानीय खुले बाजारों, जैविक आउटलेट्स या प्रीमियम पैकेजिंग के साथ बेचते हैं, तो मुनाफे का यह आंकड़ा और भी अधिक बढ़ सकता है। यही कारण है कि कुंती देवी जैसी महिला किसान अब पारंपरिक खेती को नए व्यावसायिक दृष्टिकोण से देख रही हैं।

## इसका आप पर असर
मोटे अनाज की खेती का यह पुनरुत्थान भारत भर के किसानों और उपभोक्ताओं के दैनिक जीवन पर सीधा असर डालता है।

- **भारत में:** गेहूं और चावल पर निर्भरता कम करके भोजन में रागी को शामिल करने से मधुमेह और पोषण की कमी जैसी समस्याओं से राहत मिल सकती है। सरकारी एमएसपी प्रोत्साहन मिलने से छोटे किसानों के पास कम पानी और कम लागत में बेहतर आय कमाने का सीधा विकल्प तैयार हुआ है।

- **पलामू में:** सूखा प्रभावित या कम पानी वाले इलाकों में भी किसान केवल ₹15,000 से ₹20,000 प्रति एकड़ लागत लगाकर ₹50,000 से अधिक की आय अर्जित कर सकते हैं। कुंती देवी जैसी स्थानीय महिला किसानों की सफलता से क्षेत्र के अन्य ग्रामीण भी अपनी बेकार पड़ी जमीन पर रागी बोकर अतिरिक्त कमाई कर सकते हैं।

## सवाल-जवाब

### 1. कुंती देवी ने पलामू में किस फसल की खेती दोबारा शुरू की है?
कुंती देवी ने पलामू जिले के चैनपुर प्रखंड में रागी (मंडुआ) की पारंपरिक खेती दो कट्ठे जमीन पर दोबारा शुरू की है।

### 2. खरीफ सीजन 2026-27 के लिए रागी का सरकारी एमएसपी कितना तय किया गया है?
केंद्र सरकार ने खरीफ विपणन सीजन 2026-27 के लिए रागी का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) ₹5,205 प्रति क्विंटल तय किया है।

### 3. कृषि वैज्ञानिक के अनुसार प्रति एकड़ रागी की खेती से कितनी आय हो सकती है?
कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रमोद कुमार के अनुसार 8 से 10 क्विंटल प्रति एकड़ उपज पर एमएसपी के हिसाब से ₹50,000 से ₹60,000 तक की सकल आय हो सकती है।

### 4. रागी उगाने में प्रति एकड़ औसतन कितना खर्च आता है?
रागी की खेती में प्रति एकड़ औसतन ₹15,000 से ₹20,000 की उत्पादन लागत आती है।

### 5. अंतरराष्ट्रीय बाजार में भारतीय रागी का निर्यात मूल्य क्या चल रहा है?
वर्ष 2026 में भारतीय रागी का अंतरराष्ट्रीय निर्यात मूल्य $420 से $560 प्रति टन (लगभग ₹36 से ₹48 प्रति किलो) के बीच है।

## प्रेरणा और सबक
कुंती देवी की यह पहल ग्रामीण भारत की महिलाओं और छोटे किसानों के लिए प्रेरणा का एक बेहतरीन उदाहरण है।

- **पारंपरिक ज्ञान पर भरोसा:** जब गांव वालों ने नए अंकुरों को घास समझकर खारिज कर दिया, तब भी कुंती देवी ने अपने पारंपरिक अनुभव और ज्ञान पर पूरा भरोसा रखा।

- **प्रशिक्षण को अवसर में बदलना:** केवल पुरानी यादों के सहारे न रहकर उन्होंने कृषि प्रशिक्षण लिया और आधिकारिक संस्था से बीज प्राप्त कर व्यावहारिक कदम उठाया।

- **छोटे स्तर से शुरुआत:** बड़े जोखिम के बजाय उन्होंने अपनी दो कट्ठे जमीन से प्रयोग शुरू किया, ताकि सफलता मिलने पर वे इसका विस्तार कर सकें।

- **बदलाव के साथ तालमेल:** स्वास्थ्य और बाजार की बदलती प्राथमिकताओं को समझकर उन्होंने आधुनिक मांग के अनुसार अपनी खेती की रणनीति को बदला।

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