# पलामू के खेतों में स्ट्रॉबेरी की नई बहार, कम बारिश वाले इलाके में किसान कमा सकते हैं तगड़ा मुनाफा

> सूखा प्रभावित पलामू में स्ट्रॉबेरी की बागवानी किसानों के लिए अतिरिक्त आमदनी का मजबूत जरिया बन रही है, जहां सही प्रबंधन से प्रति एकड़ तीन से चार लाख रुपये तक शुद्ध कमाई संभव है।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-09-24 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/palamu-ke-kheton-men-stroberi-ki-nai-bahara-kama-barisha-vale-ilake-men-kisana-kama-sakate-hain-tagara-munapha-37939 · **Language:** Hindi
**Tags:** स्ट्रॉबेरी की खेती, पलामू, झारखंड कृषि, बागवानी, किसान मुनाफा, टिशू कल्चर, कृषि वैज्ञानिक प्रमोद कुमार

झारखंड के पलामू जैसे शुष्क और कम वर्षा वाले क्षेत्रों में पारंपरिक फसलों पर निर्भर रहने वाले काश्तकारों के सामने मौसम की अनिश्चितता एक बड़ी चुनौती बनी रहती है। सूखे और अनियमित मॉनसून की मार झेलने वाले इस इलाके में अब फल उत्पादन की आधुनिक पद्धति एक नया आर्थिक संबल बनकर उभर रही है। जिन जोतों में बलुई दोमट अथवा दोमट मिट्टी उपलब्ध है, वहां स्ट्रॉबेरी की खेती मुनाफे का एक सशक्त विकल्प साबित हो रही है। परंपरागत अनाजों की तुलना में खुले बाजार में बेहतर भाव और लगातार मांग मिलने के कारण किसान अपनी जमीन से अतिरिक्त आय जुटाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

## पौष्टिकता से भरपूर फल और बाजार में लगातार बनी मांग
क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र चियांकी के कृषि वैज्ञानिक प्रमोद कुमार के अनुसार स्ट्रॉबेरी का स्वाद खट्टा-मीठा होने के साथ-साथ यह सेहत के लिए भी बेहद गुणकारी फल है। इस फल में प्रचुर मात्रा में विटामिन सी, आवश्यक खनिज तत्व और कई अन्य विटामिन पाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त स्ट्रॉबेरी में एंटीऑक्सीडेंट यौगिक मौजूद होते हैं, जिसके कारण उपभोक्ता बाजार में इसकी ग्राहकी पूरे साल बनी रहती है। लोग इसे केवल ताजे फल के रूप में ही पसंद नहीं करते, बल्कि फल प्रसंस्करण उद्योग में जूस, शेक, जैम और अन्य कन्फेक्शनरी खाद्य उत्पादों को तैयार करने में भी इसका बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है।

## रोपाई का सही वक्त और खेत की उचित तैयारी
पलामू के स्थानीय मौसमी मिजाज को देखते हुए स्ट्रॉबेरी की खेती का सबसे मुफीद वक्त सितंबर से अक्टूबर के बीच माना गया है। काश्तकार अमूमन 15 सितंबर से 15 अक्टूबर की अवधि के दौरान अपने खेतों में पौधों की रोपाई की तैयारी पूरी कर सकते हैं। शीत ऋतु का आगमन इस पौधे की वानस्पतिक बढ़वार और फल लगने की प्रक्रिया को गति देता है। यह फसल लगभग पांच महीने के चक्र में पूरी होती है, जिसके चलते सही समय पर भूमि का चयन, जुताई और क्यारियां बनाना आवश्यक होता है।

## टिशू कल्चर तकनीक और जल निकासी का उचित प्रबंधन
स्ट्रॉबेरी के सफल उत्पादन का पूरा दारोमदार स्वस्थ और गुणवत्तायुक्त पौध सामग्री पर टिका होता है। कृषि वैज्ञानिक प्रमोद कुमार के अनुसार किसानों को टिशू कल्चर लैबोरेटरी या किसी प्रमाणित और विश्वसनीय संस्थान से तैयार पौधे ही लगाने चाहिए। खेत में समतल जमीन पर सीधे रोपाई करने के बजाय उठी हुई मेड़ों यानी रिज बेड का निर्माण किया जाता है। खेत की योजना बनाते समय यह ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है कि जल निकासी की चाक-चौबंद व्यवस्था हो। अगर मेड़ों के बीच पानी जमा रह जाता है, तो जड़ों में गलन पैदा होने से पूरे पौधे सूखकर नष्ट हो सकते हैं।

## लागत का ढांचा और एक एकड़ से लाखों की शुद्ध कमाई
स्ट्रॉबेरी की वाणिज्यिक खेती में शुरुआती निवेश कई मदों में बंटता है। इसमें मुख्य खर्च उन्नत पौधों की खरीद, उठी हुई क्यारियों के निर्माण, नमी और खरपतवार नियंत्रण के लिए मल्चिंग, सूक्ष्म सिंचाई व्यवस्था, खाद-उर्वरक और निरंतर रखरखाव पर आता है। कुल लागत बाजार की परिस्थितियों, फसल के उत्पादन स्तर और प्रबंधन की दक्षता पर निर्भर करती है। यदि किसान वैज्ञानिक पद्धति से फसल की देखभाल करें और उपज को समय पर अच्छा बाजार भाव मिल जाए, तो प्रति एकड़ तीन से चार लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा हासिल किया जा सकता है। मौजूदा समय में फल की सीधी आपूर्ति के लिए कई अच्छे विपणन मंच भी उपलब्ध हो रहे हैं।

## फसल बोने से पूर्व विपणन रणनीति बनाना अनिवार्य
स्ट्रॉबेरी बेहद नाजुक और जल्दी खराब होने वाला फल है, जिसे अधिक दिनों तक सामान्य तापमान पर सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। इसी वजह से खेती का काम शुरू करने से पहले ही किसानों को अपनी बिक्री व्यवस्था और खरीदारों का नेटवर्क तय कर लेना चाहिए। स्थानीय मंडियों के साथ-साथ आसपास के बड़े महानगरों के फल बाजारों, बड़े होटलों, रेस्टोरेंट्स और फूड प्रोसेसिंग इकाइयों से पहले ही संपर्क साधा जा सकता है, जिससे तुड़ाई के तुरंत बाद ताजा माल उचित दामों पर खपाया जा सके।

## इसका आप पर असर
कम वर्षा वाले क्षेत्रों में किसान परंपरागत धान और दलहन के नुकसान की भरपाई स्ट्रॉबेरी जैसी नकदी फसल लगाकर कर सकते हैं।

- **पलामू में:** अनियमित बारिश और सूखे से जूझने वाले स्थानीय किसानों को परंपरागत खेती के मुकाबले प्रति एकड़ तीन से चार लाख रुपये तक अतिरिक्त आमदनी का पक्का साधन मिलता है। बलुई दोमट जमीन वाले काश्तकार 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच रोपाई करके पांच महीनों में उपज ले सकते हैं।
- **अन्य राज्यों में:** सीमित पानी और दोमट मिट्टी वाले अन्य कृषि क्षेत्रों के किसान भी टिशू कल्चर आधारित स्ट्रॉबेरी लगाकर शीतकालीन नकदी फसल का मॉडल अपना सकते हैं। इससे उन्हें स्थानीय मंडियों और फूड प्रोसेसिंग कंपनियों से सीधा जुड़ाव बनाने में मदद मिलेगी।
- **फसल की लागत:** पौध, मेड़ बनाने, मल्चिंग और खाद पर शुरुआती निवेश की आवश्यकता होती है। सही प्रबंधन से फसल की तुड़ाई के बाद सारे खर्चे काटकर बेहतर शुद्ध लाभ प्राप्त होता है।
- **बाजार की तैयारी:** चूंकि यह फल जल्दी खराब हो जाता है, इसलिए उत्पादकों को तुड़ाई से पहले ही स्थानीय होटलों और बड़े शहरों की मंडियों से आपूर्ति के सौदे पक्के करने होंगे। बिना पूर्व योजना के माल की बर्बादी का जोखिम बढ़ सकता है।

## ऐसा क्यों हुआ
पलामू के शुष्क वातावरण में स्ट्रॉबेरी को बढ़ावा देने का मुख्य कारण पारंपरिक फसलों में सूखे की वजह से होने वाला आर्थिक नुकसान और आधुनिक फलों की बढ़ती मांग है।

- **जलवायु की अनिश्चितता:** पलामू में अनियमित मॉनसून और बार-बार सूखे की स्थिति बनने से पारंपरिक खरीफ और रबी फसलों में किसानों को भारी नुकसान उठाना पड़ता है। वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र ने कम समय और निश्चित अवधि में तैयार होने वाली नकदी फसलों के रूप में इसका समाधान प्रस्तुत किया है।
- **मिट्टी की अनुकूलता:** इस क्षेत्र के कई इलाकों में बलुई दोमट और दोमट मिट्टी पाई जाती है, जो उठी हुई क्यारियों पर स्ट्रॉबेरी की जड़ों के विकास और जल निकासी के लिए आदर्श मानी जाती है। सही संरचना वाली जमीन होने के कारण वैज्ञानिक इसे व्यावसायिक तौर पर उपयोगी बता रहे हैं।
- **सर्दियों का मौसम:** स्ट्रॉबेरी एक शीतकालीन फसल है और पलामू की सर्दियां इसके पौधों की वानस्पतिक वृद्धि और फल पकाने के लिए बेहद अनुकूल माहौल देती हैं। सितंबर और अक्टूबर में रोपाई करने से पौधे को कड़ाके की ठंड से पहले पूरी तरह जमने का समय मिल जाता है।
- **शहरीकरण और प्रसंस्कृत खाद्य की मांग:** बड़े शहरों, होटलों और बेकरी उद्योग में ताजे स्ट्रॉबेरी के साथ-साथ जैम, जूस और शेक के लिए फलों की मांग तेजी से बढ़ी है। इस मजबूत मांग के चलते किसानों को स्थानीय मंडियों के अलावा बाहर भी आकर्षक भाव मिलने की संभावना बन रही है।

## सवाल-जवाब

### 1. पलामू में स्ट्रॉबेरी की रोपाई का सबसे सही समय कौन सा है?
पलामू के मौसम के अनुसार 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच स्ट्रॉबेरी के पौधों की रोपाई करना सबसे उपयुक्त माना गया है।

### 2. स्ट्रॉबेरी की फसल कितने समय में तैयार हो जाती है?
स्ट्रॉबेरी की फसल का पूरा चक्र लगभग पांच महीने का होता है, जो सर्दियों के मौसम में तेजी से फलता-फूलता है।

### 3. इसकी खेती के लिए किस प्रकार की मिट्टी उपयुक्त मानी जाती है?
स्ट्रॉबेरी की सफल खेती के लिए बलुई दोमट से लेकर दोमट मिट्टी वाली जमीन सबसे अच्छी होती है।

### 4. एक एकड़ में स्ट्रॉबेरी की खेती से किसान कितना शुद्ध मुनाफा कमा सकते हैं?
उचित कृषि प्रबंधन और अच्छे बाजार भाव मिलने पर किसान एक एकड़ से तीन से चार लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमा सकते हैं।

### 5. पौधे लगाते समय खेत में जल निकासी क्यों जरूरी है?
खेत में पानी जमा होने से स्ट्रॉबेरी के पौधों की जड़ें सड़ सकती हैं और फसल नष्ट हो सकती है, इसलिए उठी हुई क्यारियों पर उचित जल निकासी अनिवार्य है।

### 6. खेती शुरू करने से पहले विपणन की तैयारी क्यों आवश्यक है?
स्ट्रॉबेरी जल्दी सड़ने और खराब होने वाला फल है, इसलिए फसल टूटने से पहले ही खरीदारों और फल मंडियों से संपर्क तय कर लेना जरूरी होता है।

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