पलामू के खेतों में स्ट्रॉबेरी की नई राह, एक एकड़ में चार लाख रुपये तक कमाई का मौका सूखे की मार झेलने वाले क्षेत्रों के किसान बलुई दोमट मिट्टी और सही जल निकासी के साथ स्ट्रॉबेरी उगाकर पांच महीने में तगड़ा मुनाफा कमा सकते हैं। कम बारिश और सूखे की मार झेलने वाले क्षेत्रों में पारंपरिक फसलों की जगह नकदी फलों की ओर कदम बढ़ाना किसानों के लिए आर्थिक रूप से फायदेमंद साबित हो सकता है। पलामू जिले के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र चियांकी के कृषि वैज्ञानिक प्रमोद कुमार के अनुसार, स्ट्रॉबेरी की बागवानी किसानों की आमदनी बढ़ाने का एक बेहतरीन जरिया बन सकती है। यह फल खट्टे-मीठे स्वाद के साथ शरीर के लिए जरूरी पोषक तत्वों से भरपूर होता है। इसमें भरपूर मात्रा में विटामिन सी, अन्य जरूरी विटामिन, खनिज तत्व और एंटीऑक्सीडेंट यौगिक मौजूद रहते हैं। इसी वजह से फल बाजारों में इसकी मांग साल भर बनी रहती है। लोग इसे केवल ताजे फल के तौर पर ही पसंद नहीं करते, बल्कि जूस, शेक, जैम और कई तरह के प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों को तैयार करने में भी इसका बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। पौध चयन और खेत की सही तैयारी स्ट्रॉबेरी की पैदावार तभी अच्छी मिलती है जब शुरुआती स्तर पर ही गुणवत्तापूर्ण पौधों का चुनाव किया जाए। किसानों को सलाह दी जाती है कि वे किसी मान्यता प्राप्त टिशू कल्चर लैबोरेटरी या बेहद भरोसेमंद नर्सरी स्रोत से ही तैयार पौधे खरीदें। खेती की शुरुआत करते समय मिट्टी की तैयारी पर खास ध्यान देना होता है। पौधों को समतल जमीन की जगह रिज बेड बनाकर रोपा जाता है। खेत में जल निकासी का मजबूत प्रबंध होना अनिवार्य है, क्योंकि अगर क्यारियों या जड़ों के पास जरा भी पानी जमा हुआ, तो पौधे गलकर खराब हो सकते हैं। बलुई दोमट मिट्टी इस फसल के लिए काफी अनुकूल मानी जाती है क्योंकि इसमें जड़ों का फैलाव सुगमता से होता है और अतिरिक्त पानी तेजी से निकल जाता है। रोपाई का सही समय और मौसमी चक्र पलामू के क्षेत्रीय मौसम के हिसाब से स्ट्रॉबेरी लगाने के लिए सितंबर और अक्टूबर का महीना सबसे मुफीद होता है। किसान 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच रोपाई का काम पूरा करने का लक्ष्य रख सकते हैं। सर्द मौसम में स्ट्रॉबेरी के पौधे बहुत तेजी से पनपते हैं और उनमें फल लगने की प्रक्रिया सुचारू रूप से चलती है। यह पूरी खेती लगभग पांच महीने की अवधि वाली होती है। इस सीमित समय चक्र को देखते हुए समय पर क्यारियां तैयार करना, खाद का सही अनुपात देना और समयबद्ध सिंचाई व नियमित देखभाल शुरू करना जरूरी हो जाता है। लागत, मुनाफा और बिक्री के रास्ते स्ट्रॉबेरी के पूरे उत्पादन चक्र में उच्च गुणवत्ता की पौध, रिज बेड का निर्माण, मल्चिंग शीट, सिंचाई व्यवस्था, उर्वरक और नियमित रखरखाव पर खर्च आता है। खेती में लगने वाली कुल लागत बाजार की परिस्थितियों, फसल के उत्पादन स्तर और प्रबंधन के तौर-तरीकों पर निर्भर करती है। बेहतर रखरखाव और उपज का सही दाम मिलने पर किसान एक एकड़ खेत से तीन से चार लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा हासिल कर सकते हैं। हालांकि यह फल नाजुक और जल्दी खराब होने वाला होता है, इसलिए रोपाई से पहले ही बाजार की पड़ताल करना जरूरी है। किसान स्थानीय मंडियों के अलावा नजदीकी बड़े शहरों के फल बाजार, होटल, रेस्टोरेंट और फ्रूट प्रोसेसिंग यूनिट्स से सीधा संपर्क साधकर अपनी फसल समय पर बेच सकते हैं। इसका आप पर असर कम पानी वाले इलाकों के किसान इस पांच महीने की नकदी फसल को अपनाकर अपनी पारंपरिक खेती की तुलना में कई गुना अधिक आमदनी कमा सकते हैं। • झारखंड और पलामू क्षेत्र में: स्थानीय किसान सूखे के मौसम में भी बलुई दोमट मिट्टी में रिज बेड तकनीक अपनाकर खेती का जोखिम घटा सकते हैं। इससे उन्हें पारंपरिक फसलों की तुलना में प्रति एकड़ तीन से चार लाख रुपये तक शुद्ध मुनाफा कमाने का सीधा मौका मिलता है। • देशभर के किसानों के लिए: कम समय में तैयार होने वाली उच्च मूल्य वाली बागवानी फसलों से कृषि विविधीकरण को बढ़ावा मिलता है। किसान स्थानीय खुदरा बाजारों के साथ-साथ जूस और जैम प्रोसेसिंग इकाइयों से जुड़कर स्थिर ग्राहक तैयार कर सकते हैं। • फल उपभोक्ताओं और खरीदारों के लिए: क्षेत्रीय स्तर पर स्ट्रॉबेरी की पैदावार बढ़ने से स्थानीय बाजारों में ताजा और पोषण से भरपूर फल आसानी से उपलब्ध होगा। परिवहन दूरी कम होने से लोगों को कम दामों पर बेहतर गुणवत्ता वाले फल मिल सकेंगे। • नर्सरी और इनपुट कारोबारियों के लिए: टिशू कल्चर पौधों और मल्चिंग शीट की स्थानीय मांग बढ़ने से कृषि इनपुट विक्रेताओं का कारोबार मजबूत होगा। नए किसान आधुनिक कृषि उपकरणों और जल प्रबंधन विधियों की ओर तेजी से आकर्षित होंगे। ऐसा क्यों हुआ यह पहल सूखे इलाकों में पारंपरिक फसलों से कम होती कमाई और बाजार में पोषक फलों की बढ़ती मांग के चलते सामने आई है। कृषि वैज्ञानिक किसानों को कम अवधि में अधिक आय देने वाले विकल्प उपलब्ध कराने पर जोर दे रहे हैं। • पोषक तत्वों और प्रसंस्कृत उत्पादों की मांग: स्ट्रॉबेरी में उच्च विटामिन सी, खनिज और एंटीऑक्सीडेंट मौजूद होने के कारण इसकी मांग सिर्फ ताजे फल तक सीमित नहीं है। जूस, शेक, जैम और कन्फेक्शनरी उद्योगों में इसकी निरंतर खपत बनी रहती है। • मौसम और मिट्टी की अनुकूलता: पलामू में 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच की रोपाई और आने वाली सर्दियां पौधों की बेहतर बढ़वार के लिए पूरी तरह मुफीद साबित होती हैं। हल्की बलुई दोमट मिट्टी पानी को रुकने नहीं देती, जिससे पौधों की जड़ें सुरक्षित रहती हैं। • नुकसान से बचाव की जरूरत: स्ट्रॉबेरी एक बेहद नाजुक और जल्दी खराब होने वाला फल है, जिसके लिए पहले से बाजार तय करना जरूरी होता है। वैज्ञानिकों ने रोपाई से पूर्व ही स्थानीय मंडियों, होटलों और प्रोसेसिंग इकाइयों से संपर्क बनाने की सलाह दी है ताकि कटाई के बाद फसल खराब न हो। सवाल-जवाब 1. पलामू में स्ट्रॉबेरी की रोपाई का सबसे सही समय कौन सा है? कृषि वैज्ञानिक के अनुसार 15 सितंबर से 15 अक्टूबर के बीच का समय रोपाई के लिए सबसे उपयुक्त माना गया है। 2. स्ट्रॉबेरी की एक एकड़ खेती से कितना शुद्ध मुनाफा हो सकता है? उचित कृषि प्रबंधन और अच्छे बाजार भाव मिलने पर किसान एक एकड़ से तीन से चार लाख रुपये तक शुद्ध मुनाफा कमा सकते हैं। 3. यह फसल तैयार होने में कुल कितना समय लेती है? स्ट्रॉबेरी लगभग पांच महीने की फसल मानी जाती है, जिसकी बढ़वार सर्दियों के मौसम में सबसे अच्छी होती है। 4. स्ट्रॉबेरी के पौधों को खेत में कैसे लगाया जाना चाहिए? पौधों को खेत में तैयार किए गए रिज बेड पर लगाना चाहिए और खेत में उचित जल निकासी का प्रबंध होना जरूरी है। 5. किसानों को पौध सामग्री कहां से खरीदनी चाहिए? किसानों को किसी मान्यता प्राप्त टिशू कल्चर लैबोरेटरी या अन्य विश्वसनीय स्रोत से ही तैयार पौध लेनी चाहिए। 6. स्ट्रॉबेरी की बिक्री के लिए कौन से बाजार बेहतर विकल्प हैं? किसान स्थानीय फल मंडियों के साथ-साथ बड़े शहरों के फल बाजार, होटल, रेस्टोरेंट और फूड प्रोसेसिंग इकाइयों में बिक्री कर सकते हैं। https://trendkia.com/jharkhand/palamu-ke-kheton-men-stroberi-ki-nai-raha-eka-ekara-men-chara-lakha-rupaye-taka-kamai-ka-mauka-43021 TrendKia — Har trend, sabse pehle.