पलामू में स्ट्रॉबेरी की खेती से किसान कमा रहे हैं मुनाफा, जानिए लागत और विधि झारखंड के पलामू जिले में किसान स्ट्रॉबेरी की खेती से बंपर कमाई कर रहे हैं। मल्चिंग तकनीक और सही प्रबंधन से प्रति एकड़ अच्छी पैदावार और मुनाफा हासिल किया जा सकता है। झारखंड के पलामू जिले में स्ट्रॉबेरी की खेती किसानों के लिए मुनाफे का एक नया जरिया बन रही है। पारंपरिक फसलों से अलग हटकर किसान अब इस फल की खेती की ओर आकर्षित हो रहे हैं और अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत कर रहे हैं। क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी इसके लिए अनुकूल साबित हो रही है, जिससे स्थानीय किसानों को एक बेहतर विकल्प मिल गया है। सही तौर-तरीके अपनाकर खेती करने से बंपर पैदावार मिलने की पूरी संभावना रहती है। मल्चिंग तकनीक का इस्तेमाल और इसके फायदे इस आधुनिक खेती में मल्चिंग तकनीक का उपयोग बहुत अहम माना जाता है। कृषि वैज्ञानिक डॉ प्रमोद कुमार के अनुसार, इसमें पौधों के आसपास की जमीन को प्लास्टिक मल्च से ढक दिया जाता है। इस प्रक्रिया से स्ट्रॉबेरी के फल मिट्टी के सीधे संपर्क में नहीं आ पाते हैं, जिससे उनके गंदे होने या खराब होने का खतरा काफी हद तक टल जाता है। इसके अलावा मल्चिंग की मदद से खेत में नमी बरकरार रहती है और खरपतवारों की वृद्धि पर भी प्रभावी नियंत्रण रहता है। साफ-सुथरे और अच्छी क्वालिटी के फल मिलने पर बाजार में इनकी मांग और दाम भी बेहतर मिलते हैं। एक एकड़ में पौधों की संख्या और पैदावार फसल की पैदावार इस बात पर निर्भर करती है कि खेत में पौधों का घनत्व कितना है और उनकी देखभाल कैसे की जा रही है। एक एकड़ जमीन में लगभग 12 हजार से 20 हजार तक पौधे रोपे जा सकते हैं। कृषि जानकारों के मुताबिक, यदि प्रति पौधा 200 से 400 ग्राम तक फल की प्राप्ति हो जाए, तो कुल उत्पादन काफी शानदार रहता है। इसके लिए समय पर पानी देना, पोषण का सही प्रबंधन करना और पौधों की नियमित निगरानी करना बहुत जरूरी होता है। लागत और मुनाफे का पूरा गणित स्ट्रॉबेरी की खेती शुरू करने में प्रति एकड़ लगभग 3 लाख से 3.5 लाख रुपये तक का खर्च आने का अनुमान लगाया जाता है। इसके मुकाबले, यदि फसल अच्छी हो और बाजार में सही दाम मिल जाएं, तो करीब 4 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा कमाया जा सकता है। हालांकि, यह आमदनी पूरी तरह से कुल पैदावार, बाजार भाव, मौसम के मिजाज और परिवहन पर आने वाले खर्च जैसे कारकों पर निर्भर करती है। खेती में उतरने से पहले किसानों को इन सभी पहलुओं का बारीकी से आकलन कर लेना चाहिए। पैकेजिंग और परिवहन की व्यवस्था स्ट्रॉबेरी एक बेहद नाजुक फल है, इसलिए इसकी तुड़ाई और पैकेजिंग के दौरान विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। कटाई के बाद फलों को हवादार पैकेटों में सुरक्षित पैक किया जाता है ताकि लंबी दूरी के परिवहन के दौरान भी इनकी ताजगी और गुणवत्ता बनी रहे। आधुनिक शीत-श्रृंखला और एसी कंटेनर जैसी सुविधाओं का लाभ उठाकर इन फलों को कोलकाता जैसे बड़े महानगरों के बाजारों तक आसानी से भेजा जा सकता है। इससे किसानों के लिए स्थानीय मंडियों के अलावा अन्य राज्यों के बड़े बाजार भी खुल जाते हैं। सरकारी अनुदान और मिट्टी की जरूरत किसानों को इस खेती की ओर प्रेरित करने के लिए जिला उद्यान विभाग द्वारा कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, जिनकी पूरी जानकारी किसान ले सकते हैं। कृषि विभाग की विभिन्न योजनाओं के तहत खेत में टपक सिंचाई प्रणाली लगवाने पर 90 प्रतिशत तक का भारी अनुदान दिए जाने का प्रावधान है। हालांकि, मिलने वाली सब्सिडी की वास्तविक दर किसान की पात्रता और संबंधित योजना के नियमों के अधीन होती है। बलुई दोमट मिट्टी और पानी की अच्छी निकासी वाले खेतों में इस तकनीक को अपनाकर किसान अपनी आय में उल्लेखनीय वृद्धि कर सकते हैं। इसका आप पर असर स्ट्रॉबेरी की खेती से किसानों को पारंपरिक फसलों की तुलना में अधिक आमदनी और बेहतर बाजार भाव मिलने की संभावना बढ़ती है। • झारखंड में: पलामू और आसपास के जिलों के किसानों को उद्यान विभाग की योजनाओं और टपक सिंचाई पर मिलने वाले अनुदान का लाभ उठाने का अवसर मिलता है। स्थानीय उत्पादक अपनी फसल को कोलकाता जैसे बड़े महानगरों तक पहुंचा सकते हैं। • लागत और मुनाफा: प्रति एकड़ लगभग 3 लाख से 3.5 लाख रुपये की शुरुआती लागत के मुकाबले 4 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा प्राप्त किया जा सकता है। यह लाभ पूरी तरह से मौसम, पैदावार और परिवहन व्यवस्था पर निर्भर करता है। ऐसा क्यों हुआ पलामू क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी इस फसल के अनुकूल होने के कारण कृषि को बढ़ावा मिल रहा है। • तकनीकी लाभ: प्लास्टिक मल्चिंग के उपयोग से फल मिट्टी के संपर्क में नहीं आते हैं, जिससे उनकी गुणवत्ता सुरक्षित रहती है और खरपतवार नियंत्रित होते हैं। • सरकारी सहायता: टपक सिंचाई प्रणाली स्थापित करने के लिए कृषि विभाग की ओर से 90 प्रतिशत तक का अनुदान उपलब्ध कराया जाता है। सवाल-जवाब 1. स्ट्रॉबेरी की खेती के लिए प्रति एकड़ कितने पौधे लगाए जाते हैं? एक एकड़ जमीन में लगभग 12 हजार से 20 हजार पौधे लगाए जा सकते हैं। 2. स्ट्रॉबेरी की खेती में प्रति एकड़ कितनी लागत आती है? इसकी खेती में प्रति एकड़ लगभग 3 लाख से 3.5 लाख रुपये तक की लागत का अनुमान है। 3. स्ट्रॉबेरी की खेती से कितना मुनाफा हो सकता है? बेहतर उत्पादन और बाजार मूल्य मिलने पर किसानों को करीब 4 लाख रुपये तक का शुद्ध मुनाफा हो सकता है। 4. मल्चिंग तकनीक का क्या उपयोग है? मल्चिंग से फल मिट्टी के संपर्क में नहीं आते हैं, नमी बनी रहती है और खरपतवार नियंत्रित होते हैं। 5. टपक सिंचाई पर कितना अनुदान मिल सकता है? कृषि विभाग की योजनाओं के तहत टपक सिंचाई प्रणाली पर 90 प्रतिशत तक का अनुदान मिल सकता है। https://trendkia.com/jharkhand/palamu-men-strawberry-ki-kheti-se-kisana-kama-rahe-hain-munapha-janie-lagata-aura-vidhi-51189 TrendKia — Har trend, sabse pehle.