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  "title": "पलामू में सुखाड़ से निपटने को कृषि वैज्ञानिकों ने तैयार किया तीन फसलों का मॉडल",
  "summary": "झारखंड के पलामू स्थित क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र चियांकी में जिनौरा, मक्का और अरहर को एक साथ उगाने का सफल परीक्षण चल रहा है, जिससे सूखे के जोखिम को कम किया जा सके.",
  "content": "झारखंड के सूखे से प्रभावित इलाकों में खेती को नुकसान से बचाने और किसानों की आमदनी को सुरक्षित करने के लिए आधुनिक कृषि पद्धतियों का सहारा लिया जा रहा है. राज्य का पलामू जिला मुख्य रूप से ड्राईलैंड क्षेत्र में आता है, जहाँ कम वर्षा और सुखाड़ की समस्या लंबे समय से एक गंभीर चुनौती बनी हुई है. अनियमित मौसम के कारण अक्सर किसानों की खड़ी फसल बर्बाद हो जाती है और उनकी लगाई गई पूरी लागत डूब जाती है. इस संकट के समाधान के लिए कृषि विशेषज्ञ अब ऐसे विकल्पों पर काम कर रहे हैं, जिनमें कम पानी और सीमित खर्च में एक ही जमीन से कई फसलों की पैदावार ली जा सके. इसी कड़ी में पलामू के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र, चियांकी में मल्टीपल क्रॉपिंग यानी बहुफसली खेती का नया ट्रायल शुरू किया गया है.\n\nएक ही खेत में जिनौरा, अरहर और मक्का का परीक्षण\nचियांकी स्थित क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र में चल रहे इस प्रयोग के तहत एक ही खेत में तीन अलग-अलग फसलें उगाई जा रही हैं. इनमें जिनौरा, अरहर और मक्का शामिल हैं, जिन्हें अलग-अलग बेड सिस्टम के जरिए बोया गया है. कृषि वैज्ञानिक इस परीक्षण में रिज एंड फरो, ब्रॉड बेड और पारंपरिक फ्लैट बेड जैसी तकनीकों की तुलना कर रहे हैं. इस प्रयोग का मुख्य मकसद ऐसी कृषि तकनीक को तैयार करना है, जो कम बारिश वाले इलाकों में वर्षा जल का समुचित प्रबंधन कर सके और किसानों को विपरीत परिस्थितियों में भी बेहतर उपज दिला सके.\n\nरिज एंड फरो और ब्रॉड बेड तकनीक के फायदे\nवैज्ञानिक अभिषेक पटेल के अनुसार, रिज एंड फरो विधि में खेत के भीतर करीब 60 सेंटीमीटर चौड़ी और जमीन की सतह से 15 से 20 सेंटीमीटर ऊंची मेड़ बनाई जाती है. इन मेड़ों के बीच में नालियां बनाई जाती हैं, जिससे तेज या अचानक अधिक बारिश होने पर अतिरिक्त पानी आसानी से बाहर निकल जाता है. इस जल निकासी व्यवस्था से अरहर जैसी संवेदनशील फसल को जलभराव के नुकसान से बचाया जा सकता है. दूसरी ओर, जब बारिश कम होती है, तब यह मेड़ और नाली प्रणाली खेत में नमी को लंबे समय तक रोके रखने में मदद करती है.\n\nइसके साथ ही ब्रॉड बेड विधि पर भी परीक्षण किया जा रहा है. इस प्रणाली में खेत को चौड़े और ऊंचे बेड के रूप में तैयार किया जाता है और प्रत्येक बेड के बीच एक निश्चित दूरी रखी जाती है. इस व्यवस्थित दूरी के कारण एक ही खेत में अलग-अलग प्रकृति की फसलों को बिना किसी रुकावट के लगाया जा सकता है. इससे किसानों को सुनियोजित ढंग से मल्टीपल क्रॉपिंग का लाभ मिलता है. वहीं फ्लैट बेड विधि पारंपरिक खेती के समान है, लेकिन भारी बारिश होने पर इसमें जलभराव होने का खतरा अधिक रहता है, जिससे फसल खराब हो सकती है.\n\nअलग-अलग फसल अवधि से घटता है आर्थिक जोखिम\nएक ही जमीन पर तीन फसलें साथ लगाने का सबसे बड़ा फायदा मौसम के जोखिम को बांटना है. यदि सूखे अथवा अत्यधिक वर्षा के चलते किसी एक फसल को नुकसान पहुंचता है, तो किसान को बाकी बची दो फसलों से उपज और आमदनी का सहारा मिल जाता है. परीक्षण में शामिल तीनों फसलों की परिपक्वता अवधि पूरी तरह अलग-अलग है. इसमें जिनौरा की फसल लगभग 80 से 90 दिन में तैयार हो जाती है, जबकि मक्का को पकने में करीब 120 दिन का समय लगता है. वहीं अरहर की फसल लगभग 240 से 250 दिन में पूरी होती है. समय अंतराल के इस संतुलन से किसान को पूरे सीजन में चरणबद्ध तरीके से उत्पादन मिलता रहता है.\n\nकम लागत और अधिक मुनाफे की संभावना\nआधुनिक कृषि यंत्रों और मशीनों का उपयोग करके इस प्रकार की खेती करने पर प्रति एकड़ लगभग 15 से 20 हजार रुपये तक का खर्च आ सकता है. वैज्ञानिकों द्वारा किए जा रहे इस ट्रायल का उद्देश्य लागत घटाना, प्राकृतिक बारिश के पानी का पूरा इस्तेमाल करना और फसल सुरक्षा के जरिए किसानों की कमाई बढ़ाना है. कृषि विशेषज्ञों का अनुमान है कि यदि किसान इस पद्धति को सही मानकों के साथ अपनाते हैं, तो सामान्य पारंपरिक खेती की तुलना में कुल पैदावार और मुनाफे में 15 से 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी दर्ज की जा सकती है.\n\nइसका आप पर असर\nयह बहुफसली मॉडल सूखे और कम बारिश वाले क्षेत्रों के किसानों को फसल बर्बादी के आर्थिक झटके से बचाने में मददगार साबित हो सकता है.\n\n• झारखंड में: पलामू जैसे ड्राईलैंड क्षेत्रों के किसान अनियमित मॉनसून के दौरान भी सुरक्षित उपज हासिल कर सकेंगे. यह तकनीक पानी की कमी के बावजूद खेत की पूरी लागत डूबने के खतरे को काफी हद तक घटाती है.\n• खेती की लागत पर: मशीनों के इस्तेमाल से इस पूरे सिस्टम को तैयार करने में लगभग 15 से 20 हजार रुपये का शुरुआती खर्च आता है. व्यवस्थित बुवाई और जल प्रबंधन की वजह से किसानों को खाद और अतिरिक्त सिंचाई पर बेवजह पैसा खर्च नहीं करना पड़ता.\n• मुनाफे में बढ़ोतरी: पारंपरिक एकल फसल पद्धति की तुलना में उत्पादन और कुल कमाई में 15 से 20 प्रतिशत तक का सुधार देखा जा सकता है. तीन अलग-अलग फसलों की पैदावार से बाजार में नियमित अंतराल पर उपज बेचने का मौका मिलता है.\n• फसल सुरक्षा के स्तर पर: अधिक बारिश में 15 से 20 सेंटीमीटर ऊंची मेड़ें जलभराव रोककर अरहर को सड़ने से बचाती हैं. कम बारिश की स्थिति में वही नालीदार बनावट जमीन में नमी बनाए रखने का काम करती है.\n\nऐसा क्यों हुआ\nपलामू जिला लंबे समय से कम बारिश और सूखे की मार झेलता रहा है, जिससे पारंपरिक खेती में किसानों की पूरी लागत डूबने का जोखिम बना रहता है. इसी गंभीर समस्या से निपटने के लिए कृषि वैज्ञानिकों ने पानी के बेहतर प्रबंधन और जोखिम घटाने वाला यह मॉडल तैयार किया है.\n\n• प्राकृतिक सूखा और ड्राईलैंड क्षेत्र: पलामू का भूगोल ड्राईलैंड क्षेत्र में आने के कारण यहाँ बारिश की भारी अनिश्चितता रहती है. सामान्य खेती में एकल फसल लगाने पर सूखा पड़ने पर किसानों की पूरी फसल और मेहनत एक साथ नष्ट हो जाती है.\n• जलभराव और जल प्रबंधन की कमी: पारंपरिक फ्लैट बेड खेतों में भारी बारिश होने पर पानी जमा हो जाता है, जिससे अरहर जैसी दलहनी फसलें नष्ट हो जाती हैं. रिज एंड फरो और ब्रॉड बेड तकनीक अतिरिक्त पानी की सुरक्षित निकासी सुनिश्चित करती है.\n• फसलों के समय का असंतुलन: पहले किसान एक ही अवधि वाली फसलों पर निर्भर रहते थे, जिससे सूखा पड़ने पर विकल्प नहीं बचता था. अब 80-90 दिन (जिनौरा), 120 दिन (मक्का) और 240-250 दिन (अरहर) की विविध अवधि वाली फसलों को मिलाकर आर्थिक जोखिम को न्यूनतम किया गया है.\n\nसवाल-जवाब\n\n1. पलामू के क्षेत्रीय अनुसंधान केंद्र में किन तीन फसलों का एक साथ ट्रायल किया जा रहा है?\nचियांकी स्थित केंद्र में जिनौरा, मक्का और अरहर को एक साथ उगाने का ट्रायल चल रहा है.\n\n2. रिज एंड फरो विधि में मेड़ की चौड़ाई और ऊंचाई कितनी रखी जाती है?\nइस विधि में खेत में करीब 60 सेंटीमीटर चौड़ी और 15 से 20 सेंटीमीटर ऊंची मेड़ बनाई जाती है.\n\n3. ट्रायल में शामिल तीनों फसलों को तैयार होने में कितना समय लगता है?\nजिनौरा को 80 से 90 दिन, मक्का को करीब 120 दिन और अरहर को पकने में 240 से 250 दिन का समय लगता है.\n\n4. मशीनों से इस तरह की खेती तैयार करने में अनुमानित लागत कितनी आती है?\nमशीनों के इस्तेमाल से इस पद्धति में खेत तैयार करने का खर्च लगभग 15 से 20 हजार रुपये आ सकता है.\n\n5. इस मॉडल से सामान्य खेती की तुलना में उत्पादन और मुनाफे में कितनी बढ़ोतरी का अनुमान है?\nवैज्ञानिकों के अनुसार इस मॉडल को सही ढंग से अपनाने पर उत्पादन और मुनाफे में 15 से 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी हो सकती है.",
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  "category": "झारखंड",
  "publishedAt": "2026-09-25",
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    "सूखा प्रबंधन",
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