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  "type": "article",
  "title": "पारिवारिक तनाव दूर करने और पितृ दोष से राहत के लिए सर्वपितृ अमावस्या पर दक्षिण दिशा में जलाएं दीपक",
  "summary": "आश्विन मास की सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को मनाई जाएगी, जिसके अगले दिन 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि का शुभारंभ होगा। इस पावन अवसर पर पितरों की शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण, पंचबलि भोग और दक्षिण दिशा में तिल के तेल का दीपक जलाने का विधान है।",
  "content": "आश्विन महीने के कृष्ण पक्ष का समापन सर्वपितृ अमावस्या के साथ होने जा रहा है, जो पितृ पक्ष की अंतिम और अत्यंत महत्वपूर्ण तिथि मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जिन पूर्वजों की मृत्यु की निश्चित तिथि याद न हो या किसी अपरिहार्य कारणवश उनका वार्षिक श्राद्ध छूट गया हो, उन सभी के निमित्त इस दिन श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान संपन्न किया जाता है। पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनकी कृपा प्राप्त करने के उद्देश्य से श्रद्धालु इस अवसर पर विभिन्न धार्मिक अनुष्ठान और सत्कर्म करते हैं। पारंपरिक विधान के साथ किए गए ये कार्य घर-परिवार में शांति और स्थिरता लाने में सहायक माने जाते हैं।\n\nतिथि और नवरात्रि की शुरुआत का संयोग\nदेवघर के ज्योतिषाचार्य पंडित नंद किशोर मुद्गल के अनुसार, इस वर्ष सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को पड़ रही है। इसके ठीक अगले दिन, यानी 11 अक्टूबर से देवी पक्ष अथवा शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हो जाएगी। इस कालखंड को पितरों की विदाई और उनसे आशीर्वाद प्राप्त करने का अंतिम अवसर माना जाता है। धार्मिक दृष्टि से यह समय पूर्वजों के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए बेहद खास माना गया है, क्योंकि इसके तुरंत बाद शक्ति उपासना का महापर्व आरंभ हो जाता है।\n\nघरेलू कलह और पितृ दोष का संबंध\nकई परिवारों में सदस्यों के अथक परिश्रम और भौतिक प्रगति के बावजूद निरंतर अशांति या बिना किसी स्पष्ट वजह के तनाव का वातावरण बना रहता है। ज्योतिषीय दृष्टिकोण में ऐसी विषम परिस्थितियों को कई बार पितृ दोष से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि हर पारिवारिक समस्या की जड़ पितृ दोष ही हो, यह अनिवार्य नहीं है, लेकिन सर्वपितृ अमावस्या पर किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों से मन को शांति मिलने और घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने की गहरी मान्यता है।\n\nश्राद्ध, तर्पण और जीव-जंतुओं के लिए आहार\nपंडित नंद किशोर मुद्गल ने इस तिथि पर अनुष्ठान संपन्न करने की विधि को रेखांकित किया है। उन्होंने बताया कि दिन के समय सबसे पहले पितरों के नाम से विधिवत श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान करना चाहिए। इसके पश्चात पंचबलि परंपरा के तहत गाय, कौवा और कुत्ते के लिए अलग से भोजन निकालना अत्यंत शुभ माना गया है। लोकमान्यता है कि इन जीवों को दिया गया भोजन परोक्ष रूप से पितरों की तृप्ति का साधन बनता है। इसके बाद ब्राह्मणों को सम्मानपूर्वक भोजन कराना चाहिए तथा अपनी आर्थिक सामर्थ्य के अनुसार अन्न, वस्त्र या अन्य जरूरी वस्तुओं का दान करना चाहिए। उन्होंने स्पष्ट किया कि धार्मिक कार्यों में आडंबर या दिखावे के बजाय सच्ची श्रद्धा का होना सबसे महत्वपूर्ण है।\n\nसंध्याकाल में दक्षिण दिशा में दीपक प्रज्वलित करने का उपाय\nसर्वपितृ अमावस्या की शाम को एक विशेष उपाय करने का विधान बताया गया है। शाम के समय घर के बाहर अथवा पूजा स्थल पर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तिल के तेल का दीपक प्रज्वलित करना चाहिए। पारंपरिक मान्यताओं में दक्षिण दिशा को पितरों की दिशा स्वीकार किया गया है। इस दिशा में दीपक जलाकर पूर्वजों की आत्मा की शांति की प्रार्थना करने से परिवार में सुख, समृद्धि और सौहार्द बना रहता है। इस पर्व का मूल उद्देश्य केवल रस्मी कर्मकांड निभाना नहीं, बल्कि अपने पूर्वजों का सम्मान करना और समाज के जरूरतमंद लोगों तक सहायता पहुंचाना भी है।\n\nइसका आप पर असर\nसर्वपितृ अमावस्या पर किए जाने वाले धार्मिक कार्यों और नियमों का सीधा प्रभाव श्रद्धालुओं की दैनिक पूजा और पारिवारिक वातावरण पर पड़ता है।\n\n• तर्पण का अंतिम अवसर: जिन लोगों को पूर्वजों की श्राद्ध तिथि ज्ञात नहीं है, वे 10 अक्टूबर को श्राद्ध और तर्पण संपन्न कर सकते हैं। इसके माध्यम से बिना तिथि वाले सभी पूर्वजों के निमित्त एक ही दिन पिंडदान किया जा सकता है।\n• त्योहारी दिनचर्या में बदलाव: 11 अक्टूबर से शारदीय नवरात्रि शुरू हो रही है, इसलिए श्राद्ध से जुड़े सभी अनुष्ठान 10 अक्टूबर को ही पूर्ण करने होंगे। इसके अगले दिन से देवी उपासना और व्रत की तैयारी शुरू हो जाएगी।\n• जीव सेवा और दान: इस दिन गाय, कौवे और कुत्ते को भोजन कराने तथा जरूरतमंदों को वस्त्र व अन्न दान करने की परंपरा है। लोग अपने सामर्थ्य अनुसार जरूरी सामग्री दान करके मानसिक शांति प्राप्त कर सकते हैं।\n• शाम का सरल उपाय: शाम के समय दक्षिण दिशा में तिल के तेल का दीपक जलाना बेहद सरल और सुलभ उपाय है। इसे घर के बाहर या पूजा स्थल पर बिना किसी जटिल कर्मकांड के संपन्न किया जा सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nआश्विन कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि को पितरों के विसर्जन और अंतिम श्राद्ध के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है, जिसके पीछे स्पष्ट धार्मिक और पंचांगीय कारण हैं।\n\n• श्राद्ध पक्ष का समापन: आश्विन मास की अमावस्या पितृ पक्ष की आखिरी तिथि होती है, इसलिए इसे सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। इस दिन पितरों को विदा करने और उनका आशीर्वाद ग्रहण करने का अंतिम अवसर माना जाता है।\n• अज्ञात तिथियों का समाधान: कई बार परिवारों को पूर्वजों के निधन की सटीक तिथि याद नहीं रहती या परिस्थितिवश श्राद्ध नहीं हो पाता। पंचांगीय मान्यता के अनुसार इस दिन किया गया तर्पण सभी पूर्वजों तक समान रूप से पहुंचता है।\n• दक्षिण दिशा का महत्व: धार्मिक मान्यताओं में दक्षिण दिशा को पितरों का लोक और उनकी दिशा स्वीकार किया गया है। इसी कारण शाम के समय दक्षिण दिशा में तिल के तेल का दीपक जलाकर उनका स्मरण करने का विधान बना।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सर्वपितृ अमावस्या किस तिथि को मनाई जाएगी?\nइस वर्ष सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर को मनाई जाएगी।\n\n2. शारदीय नवरात्रि की शुरुआत किस दिन से हो रही है?\nशारदीय नवरात्रि 11 अक्टूबर से शुरू होगी।\n\n3. सर्वपितृ अमावस्या पर किन पितरों का श्राद्ध किया जाता है?\nजिन पितरों की श्राद्ध तिथि ज्ञात न हो या जिनका श्राद्ध पहले न हो पाया हो, उनका श्राद्ध इस दिन किया जाता है।\n\n4. श्राद्ध के दौरान किन जीवों को भोजन कराना शुभ माना गया है?\nश्राद्ध के दौरान गाय, कौवा और कुत्ते को भोजन कराना शुभ माना जाता है।\n\n5. शाम के समय किस दिशा में और किसका दीपक जलाना चाहिए?\nशाम के समय दक्षिण दिशा की ओर मुख करके तिल के तेल का दीपक जलाना चाहिए।",
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  "category": "झारखंड",
  "publishedAt": "2026-10-09",
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    "सर्वपितृ अमावस्या",
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