पर्यावरण को समर्पित जीवन, झारखंड के कौशल किशोर जयसवाल ने रोपे लाखों पौधे झारखंड के पर्यावरणविद डॉ. कौशल किशोर जयसवाल पिछले करीब 60 वर्षों से पर्यावरण संरक्षण के काम में जुटे हैं। उन्होंने देश और दुनिया के कई हिस्सों में लाखों पौधे बांटे और रोपे हैं। पलामू के रहने वाले पर्यावरणविद् डॉ. कौशल किशोर जयसवाल ने प्रकृति की सेवा में अपना पूरा जीवन लगा दिया है। पर्यावरण संरक्षण के राष्ट्रीय अध्यक्ष और वनराखी मूवमेंट के प्रणेता के रूप में वह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बना चुके हैं। उनके इस लंबे और समर्पित सफर को कई मंचों पर सराहा गया है और उन्हें राज्यपाल द्वारा भी सम्मानित किया जा चुका है। पिछले लगभग 60 वर्षों से वह प्रदूषण के खिलाफ जंग लड़ते हुए मुफ्त पौधे बांटने और रोपने का बीड़ा उठाए हुए हैं। लाखों पौधे बांटने और उगाने का अभियान डॉ. कौशल किशोर जयसवाल ने बातचीत के दौरान साझा किया कि यह सम्मान उनके दशकों के कड़े संघर्ष और पर्यावरण के प्रति अगाध प्रेम का नतीजा है। इससे पहले भी उन्हें कई बड़े पुरस्कारों से सम्मानित किया जा चुका है। उनके निरंतर प्रयासों का दायरा केवल देश तक सीमित नहीं है, बल्कि उन्होंने कई दूसरे देशों में भी जाकर मुफ्त पौधे रोपने और वितरित करने का काम किया है। ‘पेड़ लगाओ-पेड़ बचाओ’ अभियान के तहत अब तक वह कुल मिलाकर 65 लाख से ज्यादा पौधे मुफ्त में बांट चुके हैं और जमीन पर उनका रोपण भी कर चुके हैं। उनका यह अभियान देश के 26 राज्यों के 181 जिलों के साथ-साथ नेपाल, भूटान, म्यांमार, सिंगापुर, मलेशिया, अजरबैजान, थाईलैंड, इंडोनेशिया, जापान और वियतनाम तक फैल चुका है। आने वाले समय में उनका इरादा ज्यादा से ज्यादा लोगों को इस मुहिम से जोड़कर एक हरा-भरा और स्वस्थ पर्यावरण तैयार करना है। उनके मुफ्त पौधा वितरण अभियान को 58 वर्ष पूरे हो चुके हैं, जबकि उनके द्वारा शुरू किया गया वनराखी मूवमेंट लगभग पांच दशकों का लंबा सफर तय कर चुका है। इस अनोखे अभियान के जरिए वह पेड़ों को अपने परिवार का सदस्य मानकर उनकी हिफाजत करने का संदेश समाज को देते हैं। धरती को हरा-भरा रखने का अटूट संकल्प उनका मानना है कि इंसानों की गलतियों, अंधाधुंध वनों की कटाई और लगातार बढ़ते प्रदूषण की वजह से आज हमारी धरती पर तमाम पेड़-पौधों और जीवों का अस्तित्व खतरे में पड़ गया है। पर्यावरण की रक्षा करने का उनका यह सफर वर्ष 1966 में शुरू हुआ था और उन्होंने साल 1967 में अपनी 7.72 एकड़ की निजी जमीन पर पौधे लगाकर ‘जंगल बचाव-जंगल लगाव’ मुहिम को धार दी थी, जिसके बाद उनका कारवां लगातार आगे बढ़ता गया। इस लंबी यात्रा के दौरान उन्होंने सुंदरलाल बहुगुणा समेत देश के कई जाने-माने पर्यावरणविदों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम किया है। लगभग छह दशकों के इस अतुलनीय योगदान के लिए उन्हें अब तक 65 प्रतिष्ठित पुरस्कार मिल चुके हैं। उनका एकमात्र संकल्प आने वाली पीढ़ियों के लिए इस धरती को और अधिक हरा-भरा और रहने योग्य बनाना है। इसका आप पर असर पर्यावरण संरक्षण और वृक्षारोपण की यह मुहिम देश के नागरिकों को प्रकृति के प्रति जागरूक करने और अपने आसपास हरियाली बढ़ाने का सीधा संदेश देती है। • भारत में: देश भर के नागरिकों को अपने स्थानीय स्तर पर पौधे लगाने और उनकी देखभाल करने की प्रेरणा मिलती है। • पलामू में: स्थानीय निवासियों को क्षेत्र में बढ़ते प्रदूषण से मुकाबला करने और जंगलों के संरक्षण के लिए सक्रिय कदम उठाने का प्रोत्साहन मिलता है। ऐसा क्यों हुआ पर्यावरण को बचाने और इस मुहिम को आगे बढ़ाने की यह पहल मानवीय गलतियों और बढ़ते प्रदूषण के कारण शुरू हुई थी। • शुरुआत की वजह: जंगलों की बेतरतीब कटाई और प्रदूषण के कारण पर्यावरण को पहुंच रहे नुकसान ने इस अभियान की नींव रखी। • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: यह सफर वर्ष 1966 में शुरू हुआ और 1967 में अपनी निजी जमीन पर पौधारोपण से इसे ठोस रूप मिला। • सहयोग और विस्तार: सुंदरलाल बहुगुuna जैसे बड़े पर्यावरणविदों के साथ काम करने और दशकों के निरंतर प्रयासों से यह अभियान अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचा। सवाल-जवाब 1. डॉ. कौशल किशोर जयसवाल किस नाम से जाने जाते हैं? उन्हें झारखंड में 'ट्री मैन' के रूप में जाना जाता है। 2. डॉ. कौशल ने अब तक कितने पौधे वितरित और रोपे हैं? उन्होंने भारत समेत कई देशों में 65 लाख से अधिक पौधों का निःशुल्क वितरण और रोपण किया है। 3. उनका यह पर्यावरण संरक्षण अभियान कितने वर्षों से चल रहा है? उनका यह अभियान 58 वर्षों से निरंतर चल रहा है। 4. उन्होंने किस वर्ष अपनी निजी जमीन पर पौधारोपण शुरू किया था? उन्होंने वर्ष 1967 में अपनी 7.72 एकड़ निजी भूमि पर पौधारोपण शुरू किया था। 5. वनराखी मूवमेंट की शुरुआत किसने की थी? वनराखी मूवमेंट की शुरुआत डॉ. कौशल किशोर जयसवाल ने की थी। प्रेरणा और सबक डॉ. कौशल किशोर जयसवाल के जीवन और उनके छह दशकों के संघर्ष से पर्यावरण प्रेम और अटूट संकल्प के कई महत्वपूर्ण सबक मिलते हैं। • निरंतरता की ताकत: किसी भी बड़े सामाजिक लक्ष्य को हासिल करने के लिए बिना रुके दशकों तक काम करने का दृढ़ संकल्प जरूरी है। • व्यक्तिगत पहल: बदलाव का इंतजार करने के बजाय अपनी खुद की जमीन और संसाधनों से शुरुआत की जा सकती है। • समुदाय को जोड़ना: पेड़ों को परिवार का हिस्सा मानकर लोगों को भावनात्मक रूप से जोड़ने से आंदोलन मजबूत होता है। • दूरदर्शी सोच: आने वाली पीढ़ियों के लिए एक हरी-भरी और सुरक्षित धरती छोड़ने की सोच के साथ काम करना चाहिए। https://trendkia.com/jharkhand/paryavarana-ko-samarpita-jivana-jharkhand-ke-kaushala-kishora-jayasavala-ne-rope-lakhon-paudhe-30667 TrendKia — Har trend, sabse pehle.