फूलगोभी और पत्तागोभी को तबाह करने वाले चार प्रमुख रोग, जानिए इनसे बचाव के असरदार उपाय बोकारो के कृषि विशेषज्ञ कुलदीप कुमार ने पत्तागोभी और फूलगोभी की फसल को आद्र पतन, ब्लैक रॉट, क्लब रूट और बोरॉन की कमी से बचाने के लिए जरूरी उपाय बताए हैं। सब्जी की खेती में पत्तागोभी और फूलगोभी का बड़ा महत्व है। किसान इनकी देखभाल में अपनी पूरी ताकत झोंक देते हैं, लेकिन कई बार सही पोषण न मिलने या उचित देखरेख के अभाव में फसल गंभीर बीमारियों का शिकार हो जाती है। ऐसे में किसानों को भारी आर्थिक नुकसान का सामना करना पड़ता है। इस समस्या से किसानों को बचाने के लिए बोकारो के कृषि विशेषज्ञ कुलदीप कुमार ने इन दोनों फसलों को प्रभावित करने वाली चार बड़ी बीमारियों और उनके समाधान के बारे में विस्तार से जानकारी दी है। कम समय में कमाई का जरिया और शुरुआती चुनौतियां कम अवधि में तैयार होने के कारण फूलगोभी की खेती किसानों के बीच खासी लोकप्रिय है और इससे अच्छी कमाई भी होती है। हालांकि बंपर पैदावार हासिल करने के लिए सबसे जरूरी कदम मजबूत और स्वस्थ पौधों का चयन करना है। खेती की शुरुआत यानी नर्सरी चरण से ही कई बीमारियां पौधों को घेर सकती हैं, जिससे महंगे बीज और शुरुआती पौधे दोनों बेकार हो जाते हैं। इसलिए खेती के हर चरण पर विशेष सावधानी बरतने की आवश्यकता होती है। डंपिंग ऑफ यानी आद्र पतन से नर्सरी की सुरक्षा फूलगोभी की नर्सरी में सबसे अधिक नुकसान पहुँचाने वाली समस्याओं में आद्र पतन यानी डंपिंग ऑफ की बीमारी प्रमुख है। इस रोग के लगने पर जमीन की सतह के ठीक नजदीक पौधे का तना कमजोर होकर गलने लगता है, जिसके चलते पौधा अचानक मुरझाकर मिट्टी पर ढह जाता है। यदि समय रहते इस पर ध्यान न दिया जाए, तो देखते ही देखते पूरी नर्सरी इसकी चपेट में आ सकती है। इस गंभीर खतरे से अपनी नर्सरी को महफूज रखने के लिए बुवाई से पहले बीजों का फफूंदनाशक दवाओं से उपचार करना बेहद जरूरी होता है। इसके साथ ही नर्सरी की क्यारियों में पानी के जमाव को रोकने के लिए उचित जल निकासी का प्रबंध करना भी अनिवार्य है, ताकि पौधों में फंगस या रोग फैलने की संभावनाओं को पूरी तरह से टाला जा सके। ब्लैक रॉट की पहचान और पत्तियों पर पीले धब्बे पत्तागोभी और फूलगोभी दोनों में ही ब्लैक रॉट एक बेहद खतरनाक रोग माना जाता है। इस बीमारी की शुरुआत में पौधों की पत्तियों के किनारों पर अंग्रेजी के वी अक्षर के आकार के पीले रंग के धब्बे उभरने लगते हैं। वक्त बीतने के साथ ये प्रभावित हिस्से गहरे रंग के होने लगते हैं और पौधे की सामान्य बढ़त पूरी तरह बाधित हो जाती है। इस बीमारी के लक्षण दिखाई देने पर कृषि विशेषज्ञ की सलाह के अनुसार कॉपर ऑक्सीक्लोराइड की ढाई से तीन ग्राम मात्रा और एक ग्राम स्ट्रेप्टोसाइक्लिन को प्रति दस लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए। जरूरत पड़ने पर दस से बारह दिनों के अंतराल पर इस प्रक्रिया को दोहराया जा सकता है। हालाँकि किसी भी रसायन का प्रयोग करने से पहले स्थानीय कृषि अधिकारी या विशेषज्ञ की राय लेना और उसके लेबल निर्देशों का पालन करना बेहद आवश्यक है। जड़ों में गांठ बनाने वाला क्लब रूट रोग गोभीवर्गीय फसलों को मिट्टी के जरिए नुकसान पहुँचाने वाली एक अन्य बड़ी बीमारी क्लब रूट है। इस रोग के फैलने के पीछे प्लाज्मोडियोफोरा ब्रैसिकी नामक रोगजनक जिम्मेदार होता है। इस संक्रमण के असर से पौधे की जड़ों में अजीबोगरीब और असामान्य गांठें उभरने लगती हैं, जिससे जड़ें अपना स्वाभाविक आकार और रूप खो बैठती हैं। ऐसे पौधों की ग्रोथ रुक जाती है और उनकी पत्तियाँ पीली पड़ने लगती हैं। अम्लीय मिट्टी वाले खेतों में यह समस्या और भी विकराल रूप ले सकती है, इसलिए खेत की मिट्टी की समय पर जाँच करवाना बहुत जरूरी हो जाता है। इस बीमारी के प्रभावी प्रबंधन के लिए मिट्टी के पीएच मान को लगभग सात दशमलव दो या उससे अधिक स्तर पर बनाए रखने का प्रयास किया जाता है। इसके लिए कृषि विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में खेत में चूने का इस्तेमाल किया जा सकता है। इसके अलावा, जिस खेत में यह संक्रमण फैल चुका हो, वहाँ लगातार गोभीवर्गीय फसलें उगाने से बचना चाहिए और फसल चक्र की पद्धति अपनानी चाहिए। बोरॉन की कमी से फूलगोभी में ब्राउनिंग की समस्या फूलगोभी की फसल में अक्सर बोरॉन पोषक तत्व की कमी के कारण ब्राउनिंग की दिक्कत सामने आती है। इस विकार की वजह से फूल का सही ढंग से विकास नहीं हो पाता है, फूल आकार में छोटे रह जाते हैं, उनका रंग भूरा हो जाता है और अंदर से वे खोखले भी हो सकते हैं। इससे फूल की गुणवत्ता बहुत गिर जाती है और किसानों को बाजार में अपनी उपज का उचित और लाभकारी मूल्य नहीं मिल पाता है। इस समस्या से फसल को बचाने के लिए मिट्टी की जाँच करवाकर बोरॉन की कमी का सटीक पता लगाना जरूरी है। कृषि विशेषज्ञ के अनुसार खेत की तैयारी के समय आखिरी जुताई के वक्त कृषि सलाह के आधार पर बोरेक्स यानी सुहागा का प्रयोग किया जाना चाहिए। दवा की सही मात्रा हमेशा खेत की मौजूदा स्थिति और फसल की आवश्यकता को ध्यान में रखकर ही तय की जानी चाहिए। इसका आप पर असर यह कृषि सलाह किसानों को फसल की समय पर सुरक्षा करने में मदद करती है। • भारत में: गोभी वर्गीय फसलों की खेती करने वाले देश के सभी किसानों को नर्सरी चरण से ही रोग प्रबंधन और बीज उपचार अपनाने की सलाह दी जाती है, जिससे उनकी लागत सुरक्षित रह सके। • बोकारो में: स्थानीय किसानों को अपनी मिट्टी की जाँच करवाने और विशेषज्ञों के निर्देशानुसार फफूंदनाशक तथा बोरैक्स का उपयोग करने से बेहतर पैदावार और उचित बाजार भाव मिलने में मदद मिलेगी। ऐसा क्यों हुआ फसल में रोगों के फैलने के मुख्य कारण फफूंद संक्रमण, मिट्टी का अनुचित पीएच मान और पोषक तत्वों की कमी हैं। • फंगस और जल जमाव: नर्सरी में अत्यधिक नमी और बिना उपचारित बीजों के कारण आद्र पतन जैसी बीमारियां पनपती हैं। • अम्लीय मिट्टी: खेत में अनुचित पीएच स्तर और प्लाज्मोडियोफोरा ब्रैसिकी जैसे रोगजनकों की सक्रियता से क्लब रूट जैसी जड़ की समस्याएं उत्पन्न होती हैं। • पोषण की कमी: मिट्टी में बोरॉन की अपर्याप्त मात्रा फूलगोभी में ब्राउनिंग और अंदरूनी खोखलेपन का कारण बनती है। सवाल-जवाब 1. फूलगोभी की नर्सरी में सबसे आम समस्या कौन सी है? नर्सरी में डंपिंग ऑफ या आद्र पतन सबसे आम समस्या है जिसमें पौधे का तना गलकर गिर जाता है। 2. ब्लैक रॉट रोग के लक्षण क्या हैं? इस रोग में पत्तियों के किनारों पर पीले रंग के वी आकार के धब्बे बनने लगते हैं। 3. क्लब रूट रोग किस कारण से होता है? यह गोभीवर्गीय फसलों का मिट्टी जनित रोग है जो प्लाज्मोडियोफोरा ब्रैसिकी नामक रोगजनक से होता है। 4. फूलगोभी में ब्राउनिंग की समस्या क्यों होती है? यह समस्या मिट्टी में बोरॉन की कमी के कारण उत्पन्न होती है जिससे फूल भूरे और खोखले हो जाते हैं। https://trendkia.com/jharkhand/phulagobhi-aura-pattagobhi-ko-tabaha-karane-vale-chara-pramukha-roga-janie-inase-bachava-ke-asaradara-upaya-32725 TrendKia — Har trend, sabse pehle.