# प्रशासनिक बेरुखी के बाद हजारीबाग के ग्रामीणों ने उठाया फावड़ा, जंगल काटकर खुद तैयार कर रहे 5 किमी सड़क

> हजारीबाग के हेसाकोचा गांव में सड़क की मांग अनसुनी होने पर करीब 250 ग्रामीणों ने खुद औजार उठाकर पांच किलोमीटर लंबे जर्जर रास्ते की मरम्मत शुरू कर दी है.

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-10-31 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/prashasanika-berukhi-ke-bada-hazaribagh-ke-graminon-ne-uthaya-phavara-jngala-katakara-khuda-taiyara-kara-rahe-5-kimi-saraka-53687 · **Language:** Hindi
**Tags:** हजारीबाग, झारखंड, हेसाकोचा गांव, श्रमदान, सड़क निर्माण, ग्रामीण विकास, टाटीझरिया

झारखंड के हजारीबाग जिले में स्थित टाटीझरिया प्रखंड की बेडम पंचायत का सुदूरवर्ती गांव हेसाकोचा इन दिनों सामूहिक आत्मनिर्भरता की अनोखी तस्वीर पेश कर रहा है. बुनियादी सुविधाओं और प्रशासनिक तंत्र से लगातार निराशा मिलने के बाद यहां के निवासियों ने व्यवस्था पर निर्भर रहने के बजाय खुद विकास का बीड़ा उठा लिया है. पिछले पांच दिनों से इस आदिवासी बहुल गांव के महिला, पुरुष और युवा कुदाल, फावड़ा, गैंता और सब्बल लेकर घने जंगल के बीच से गुजरने वाले पांच किलोमीटर लंबे जर्जर रास्ते को दुरुस्त करने में जी-जान से जुटे हैं. लगभग 250 ग्रामीणों की यह सामूहिक पहल आने वाली पीढ़ियों को सड़क की कमी के चलते दशकों से झेली जा रही दुश्वारियों से निजात दिलाने के दृढ़ संकल्प का नतीजा है.

## जंगल के बीच सुबह से शाम तक चल रहा श्रमदान
इस दुर्गम इलाके में रोज सुबह से ही काम की गहमागहमी शुरू हो जाती है, जहां गांव का हर तबका अपनी हिस्सेदारी निभा रहा है. कोई पथरीली जमीन पर मिट्टी काट रहा है, कोई भारी पत्थरों को हटाकर किनारों पर कर रहा है, तो कोई उबड़-खाबड़ जमीन को पाटकर समतल बनाने में पसीना बहा रहा है. इस अभियान की सबसे मजबूत कड़ी गांव की महिलाएं हैं, जो पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर पत्थरों को तोड़ने और मिट्टी ढोने का कठिन काम कर रही हैं. श्रमदान में शामिल मुनिया मरांडी का कहना है कि अब शासन के भरोसे इंतजार करने का वक्त बीत चुका है, इसलिए गांव के भविष्य के लिए खुद ही रास्ता बनाना जरूरी हो गया था.

## बरसात में दलदल बनता है बेडम पंचायत को जोड़ने वाला संपर्क मार्ग
हेसाकोचा के लोगों के लिए यह मार्ग किसी जीवनरेखा से कम नहीं है, क्योंकि यही कच्चा रास्ता बेडम पंचायत को मुख्य सड़क नेटवर्क से जोड़ता है. घने जंगल के बीच स्थित होने की वजह से सरकारी स्तर पर इसकी मरम्मत की कभी कोई ठोस पहल नहीं हुई. ग्रामीणों ने जनप्रतिनिधियों और संबंधित प्रशासनिक अधिकारियों के दफ्तरों के चक्कर लगाकर कई बार पक्की सड़क की गुहार लगाई, लेकिन हर बार केवल आश्वासन ही हाथ लगे. नतीजतन, हर साल बारिश के मौसम में यह पूरा रास्ता दलदल और गहरे गड्ढों में तब्दील हो जाता है, जिससे ग्रामीणों का बाहरी दुनिया से संपर्क कट जाता है. बारिश खत्म होते ही ग्रामीणों को चलने लायक डगर तैयार करने के लिए हर साल खुद ही फावड़ा उठाना पड़ता है, लेकिन इस बार उन्होंने इसे व्यापक स्तर पर दुरुस्त करने का पक्का इरादा किया है.

## खाट पर अस्पताल पहुंचते हैं मरीज, दलदल से गुजरते हैं स्कूली बच्चे
पक्की सड़क का न होना ग्रामीणों के लिए सिर्फ आवागमन की असुविधा नहीं, बल्कि जीवन और मौत का गंभीर संकट बना हुआ है. गांव में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं या एंबुलेंस पहुंचना नामुमकिन होने के कारण बीमार मरीजों और प्रसव पीड़ा से जूझ रही गर्भवती महिलाओं को परिजन खाट पर लिटाकर इसी पथरीले जंगल के रास्ते पांच किलोमीटर पैदल ढोने को मजबूर हैं. कई बार अस्पताल पहुंचने में हुई देरी मरीजों की जान पर भारी पड़ जाती है. वहीं गांव के छोटे बच्चों को भी स्कूल आने-जाने के लिए रोजाना कीचड़, पत्थरों और फिसलने वाले रास्तों से होकर जूझना पड़ता है. इसी वजह से गांव के बुजुर्ग और युवा इसे केवल मिट्टी-पत्थर का काम नहीं, बल्कि अपनों की जिंदगी बचाने की एक सामूहिक जंग मान रहे हैं.

## सामूहिक भागीदारी से खड़ी हुई व्यवस्था के सामने बड़ी मिसाल
हेसाकोचा गांव के लोगों की यह संगठित पहल जहां एक ओर वर्षों की व्यवस्थागत लापरवाही और प्रशासनिक उपेक्षा की पोल खोलती है, वहीं दूसरी ओर यह साबित करती है कि जनशक्ति एकजुट हो जाए तो बड़े से बड़े काम को मुमकिन बनाया जा सकता है. इस प्रयास को देख रहे सामाजिक कार्यकर्ता राजू यादव का कहना है कि हेसाकोचा के ग्रामीणों ने पूरी दुनिया को यह पैगाम दिया है कि बदलाव के इंतजार में हाथ पर हाथ रखकर बैठने के बजाय पहल खुद अपने हाथों से करनी पड़ती है. ग्रामीणों का कहना है कि उनके इस श्रमदान को स्थायी रूप तभी मिलेगा जब शासन इस रास्ते पर अविलंब पक्की सड़क का निर्माण कराए, ताकि लोगों को हर साल की मशक्कत और खाट पर जिंदगी ढोने के दर्द से हमेशा के लिए आजादी मिल सके.

## इसका आप पर असर
हजारीबाग के इस सुदूरवर्ती गांव की सामूहिक पहल यह साबित करती है कि बुनियादी अधिकारों के लिए जनएकजुटता कितनी जरूरी है, लेकिन यह शासन के लिए भी एक गंभीर चेतावनी है.

- **झारखंड में:** यह घटना राज्य के दूरदराज आदिवासी और ग्रामीण इलाकों में बुनियादी ढांचे की गंभीर कमी और सरकारी योजनाओं के धरातल पर न पहुंचने की हकीकत को उजागर करती है. इससे उन अन्य बस्तियों को भी प्रेरणा मिलती है जो वर्षों से बुनियादी संपर्क मार्ग के अभाव में अलग-थलग पड़ी हैं.
- **हजारीबाग में:** टाटीझरिया प्रखंड के हेसाकोचा गांव में पांच किलोमीटर रास्ता साफ होने से बीमार लोगों, स्कूली बच्चों और प्रसूताओं को फौरी तौर पर आवागमन में राहत मिलेगी. हालांकि, जब तक जिला प्रशासन पक्की सड़क की मंजूरी नहीं देता, तब तक यह समाधान केवल अस्थायी ही रहेगा.
- **आम ग्रामीणों के लिए:** जब प्रशासनिक स्तर पर मदद रुक जाती है, तो सामूहिक श्रमदान स्थानीय स्तर पर तात्कालिक संकट को टालने का एक व्यावहारिक माध्यम बन जाता है. इससे गांव के लोगों में सामाजिक एकजुटता और अपने अधिकारों के प्रति सामूहिक चेतना भी मजबूत होती है.
- **प्रशासनिक जवाबदेही पर:** ग्रामीणों की यह तस्वीर प्रशासनिक मशीनरी पर दबाव बढ़ाएगी कि वे ग्रामीण संपर्क योजनाओं के तहत बजट और स्वीकृति का आवंटन प्राथमिकता से करें. यदि प्रशासन सक्रिय होता है, तो निकट भविष्य में गांव को स्थायी पक्की सड़क मिलने की संभावना बढ़ जाएगी.

## ऐसा क्यों हुआ
हेसाकोचा गांव में ग्रामीणों को खुद औजार उठाकर सड़क बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा क्योंकि वर्षों से उनकी बुनियादी आवागमन संबंधी मांगें सरकारी फाइलों में उपेक्षित पड़ी थीं.

- **लगातार प्रशासनिक उपेक्षा:** ग्रामीणों ने कई बार स्थानीय जनप्रतिनिधियों और ब्लॉक स्तर के अधिकारियों के पास पक्की सड़क के लिए आवेदन दिए, लेकिन उन पर कोई कार्रवाई नहीं हुई. शासन की इसी उदासीनता ने ग्रामीणों का सब्र तोड़ दिया और उन्होंने खुद सड़क सुधारने का निर्णय लिया.
- **कच्ची सड़क का मौसमी नुकसान:** जंगल के बीच स्थित यह पांच किलोमीटर का कच्चा संपर्क मार्ग हर साल भारी बारिश के दौरान पानी के बहाव से कटकर गहरे गड्ढों और दलदल में तब्दील हो जाता है. औपचारिक रखरखाव न होने के कारण बारिश खत्म होते ही रास्ता चलने लायक नहीं बचता.
- **आपातकालीन स्वास्थ्य संकट:** सड़क न होने से एंबुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती थी, जिसके कारण ग्रामीणों को गर्भवती महिलाओं और गंभीर मरीजों को खाट पर उठाकर ले जाना पड़ता था. इस अमानवीय विवशता और जान के जोखिम ने पूरे गांव को एकजुट होकर तत्काल श्रमदान करने के लिए प्रेरित किया.

## सवाल-जवाब

### 1. हेसाकोचा गांव में लोग खुद सड़क की मरम्मत क्यों कर रहे हैं?
प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से बार-बार गुहार लगाने के बावजूद सड़क न बनने पर ग्रामीणों ने खुद फावड़ा उठाकर पांच किलोमीटर लंबे रास्ते को दुरुस्त करने का फैसला किया.

### 2. यह गांव झारखंड के किस जिले और प्रखंड में स्थित है?
यह गांव झारखंड के हजारीबाग जिले में टाटीझरिया प्रखंड की बेडम पंचायत के अंतर्गत आता है.

### 3. इस श्रमदान में कितने ग्रामीण शामिल हैं और यह कितने दिनों से चल रहा है?
इस श्रमदान में गांव के करीब 250 महिला, पुरुष और युवा शामिल हैं और यह अभियान पिछले पांच दिनों से चल रहा है.

### 4. सड़क न होने से ग्रामीणों को सबसे बड़ी परेशानी क्या झेलनी पड़ती है?
सड़क के अभाव में एंबुलेंस न पहुंचने पर गंभीर मरीजों और गर्भवती महिलाओं को पांच किलोमीटर तक खाट पर ढोना पड़ता है, तथा बच्चों को कीचड़ भरे रास्ते से स्कूल जाना पड़ता है.

### 5. बारिश के दिनों में इस रास्ते की क्या स्थिति हो जाती है?
जंगल के बीच से गुजरने वाला यह कच्चा रास्ता हर साल बारिश के बाद पूरी तरह जर्जर और कीचड़युक्त हो जाता है, जिससे आवागमन ठप पड़ जाता है.

### 6. श्रमदान कर रहे ग्रामीणों की मुख्य मांग क्या है?
ग्रामीणों की मांग है कि प्रशासन उनके इस श्रमदान को संज्ञान में लेते हुए जल्द से जल्द एक स्थायी पक्की सड़क का निर्माण कराए.

## प्रेरणा और सबक
हेसाकोचा के ग्रामीणों का यह सामूहिक कदम यह सिखाता है कि जब संसाधन सीमित हों और व्यवस्था मौन हो, तब जनशक्ति और आत्मनिर्भरता से बड़े बदलाव की शुरुआत की जा सकती है.

- **परनिर्भरता त्याग कर पहल करना:** समस्याओं के समाधान के लिए केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर निर्भर रहने के बजाय खुद पहल करने से तात्कालिक संकट को टाला जा सकता है.
- **सामूहिक एकता की असीम शक्ति:** जब 250 महिला, पुरुष और युवा एक साझा लक्ष्य के लिए एकजुट हुए, तो पांच किलोमीटर लंबे दुर्गम जंगल के रास्ते को चलने लायक बनाना संभव हो सका.
- **समान भागीदारी और समर्पण:** महिलाओं और युवाओं ने पुरुषों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर भारी श्रमदान किया, जो यह दर्शाता है कि सामुदायिक प्रगति में हर वर्ग का योगदान अनिवार्य है.
- **भावी पीढ़ियों के प्रति जिम्मेदारी:** ग्रामीणों ने यह श्रम सिर्फ अपनी वर्तमान सुविधा के लिए नहीं, बल्कि अपने बच्चों के सुरक्षित स्कूल जाने और आने वाली पीढ़ियों के बेहतर भविष्य के लिए किया.

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._