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  "title": "रांची का 35 साल पुराना सैनिक मार्केट: जहां है 1971 के युद्ध का टैंक और सैनिकों की भलाई का अनोखा जरिया",
  "summary": "झारखंड की राजधानी रांची में स्थित 35 साल पुराना सैनिक मार्केट अपनी अनूठी विशेषताओं के लिए जाना जाता है, जहां भूतपूर्व सैनिकों के कल्याण के लिए किराए से मिलने वाली राशि का उपयोग किया जाता है और भारत-पाकिस्तान युद्ध में इस्तेमाल हुआ टैंक भी मौजूद है।",
  "content": "झारखंड की राजधानी रांची में स्थित सैनिक मार्केट अपनी एक अलग पहचान और लोकप्रियता के लिए जाना जाता है। इस परिसर की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहां आने वाले आगंतुकों को भारत-पाकिस्तान युद्ध में इस्तेमाल किया गया एक टैंक देखने को मिलता है, जो यहां आने वाले हर व्यक्ति के लिए मुख्य आकर्षण का केंद्र रहता है। इस बाजार का नाम सैनिक मार्केट रखे जाने के पीछे एक खास उद्देश्य है, क्योंकि इसकी शुरुआत भूतपूर्व सैनिकों की सुविधा और उनके कल्याण के लिए फंड जुटाने के खातिर की गई थी।\n\n \n\nकल्याण कोष के जरिए पूर्व सैनिकों को संबल\n\nइस परिसर में पिछले 23 साल से अपनी दुकान चला रहे अमृतेश के अनुसार, इस मार्केट के भीतर जितनी भी दुकानें संचालित होती हैं, उन सभी से आने वाला किराया सीधा सैनिक कल्याण बोर्ड के खाते में जाता है। इस फंड का उपयोग भूतपूर्व सैनिकों की सहायता के लिए किया जाता है। सैनिक कल्याण बोर्ड में सभी भूतपूर्व सैनिक शामिल हैं, जो मिलकर इस पूरे बाजार के संचालन की जिम्मेदारी संभालते हैं।\n\n \n\nजूते, कपड़ों और दवाइयों का प्रमुख ठिकाना\n\nइस मार्केट में प्रवेश करते ही खरीदारों को जूतों का एक जबरदस्त कलेक्शन देखने को मिलता है। यहां बड़े-बड़े ब्रांड्स की हूबहू दिखने वाली रेप्लिका जूते मिल जाते हैं, जिन्हें पहली नजर में देखकर धोखा खाना स्वाभाविक है और इनकी कीमत मात्र 200 से 1000 रुपये के दायरे में होती है। जूतों के अलावा इस परिसर में कपड़ों की दुकानें, बाइक रिपेयरिंग सेंटर, कार एसेसरीज की दुकानें, रेस्टोरेंट, चाय की टपरी और रांची का सबसे बड़ा दवाखाना आजाद फर्मा भी मौजूद है।\n\n \n\nशहीद सैनिकों के परिवारों के लिए आर्थिक सुरक्षा\n\nइस मार्केट के भीतर कुल मिलाकर करीब 120 से 130 दुकानें संचालित हो रही हैं। इन सभी दुकानों से मिलने वाले किराए के पैसों से कई तरह के कल्याणकारी कार्य अंजाम दिए जाते हैं। मिसाल के तौर पर, यदि युद्ध के दौरान कोई सैनिक वीरगति को प्राप्त हो जाता है या सेवा के दौरान विकलांग होने के कारण नौकरी छोड़ने पर मजबूर होना पड़ता है, तो ऐसे मामलों में शहीद की विधवाओं को हर महीने 10,000 रुपये तक की आर्थिक मदद पहुंचाई जाती है। इसके अलावा युद्ध में शहादत देने वाले सैनिकों के परिजनों को फौरन 2 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाता है।\n\n \n\nतंगी से जूझ रहे पूर्व सैनिकों को संबल\n\nइसके अतिरिक्त जिन भूतपूर्व सैनिकों की आर्थिक स्थिति बेहद खराब होती है, उनके घरों की मरम्मत करवाने, रसोई का खर्च उठाने और अन्य घरेलू जरूरतों को पूरा करने के लिए भी इस कोष से सहायता राशि प्रदान की जाती है। जिन सैनिकों को किसी कारणवश पेंशन का लाभ नहीं मिल पा रहा है, उन्हें भी हर महीने आर्थिक मदद दी जाती है। इस तरह से यह रांची का इकलौता ऐसा बाजार है जो पूरी तरह से देश के सैनिकों के लिए समर्पित है। यह मार्केट साल 1991 में बनकर पूरी तरह तैयार हुआ था और तभी से यह रांची के सबसे लोकप्रिय बाजारों में शुमार है।\n\nइसका आप पर असर\nरांची के सैनिक मार्केट से जुड़ी यह जानकारी स्थानीय नागरिकों और पूरे देश के उन लोगों के लिए खास महत्व रखती है जो सेना के परिवारों के प्रति सम्मान रखते हैं।\n\n• भारत में: देश भर के नागरिकों को यह प्रेरणा मिलती है कि किस प्रकार स्थानीय व्यापारिक गतिविधियों को पूर्व सैनिकों और शहीदों के परिवारों के कल्याण से जोड़ा जा सकता है। इससे यह संदेश जाता है कि जनसहयोग के माध्यम से भूतपूर्व सैनिकों के जीवन स्तर को बेहतर बनाया जा सकता है।\n\n• रांची में: स्थानीय खरीदारों और दुकानदारों के लिए यह बाजार खरीदारी के साथ-साथ एक ऐतिहासिक स्थल का अनुभव कराता है। यहां आने वाले लोग कम कीमत में जूते और दवाइयां खरीदने के साथ-साथ सीधे तौर पर सैनिक कल्याण कोष में अप्रत्यक्ष योगदान देते हैं।\n\nऐसा क्यों हुआ\nसैनिक मार्केट की स्थापना और इसके संचालन के पीछे एक स्पष्ट सामाजिक और कल्याणकारी उद्देश्य था, जो पूर्व सैनिकों के संघर्षों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था।\n\n• सैनिक कल्याण की पहल: इस बाजार की शुरुआत साल 1991 में भूतपूर्व सैनिकों की आर्थिक स्थिति सुधारने और उनके परिवारों को आपातकालीन सहायता प्रदान करने के उद्देश्य से की गई थी।\n\n• युद्ध के वीरों का सम्मान: भारत-पाकिस्तान युद्ध में इस्तेमाल किए गए टैंक को यहां प्रदर्शित करने का मुख्य कारण आने वाली पीढ़ियों को देश के सैनिकों के बलिदान और सैन्य इतिहास से रूबरू कराना है।\n\n• किराए से वित्तीय सहायता: बाजार की सभी 120 से 130 दुकानों से मिलने वाले किराए को सैनिक कल्याण बोर्ड के सुपुर्द किया जाता है ताकि विधवाओं और पेंशनहीन सैनिकों का गुजारा चल सके।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. रांची का सैनिक मार्केट कब बनकर तैयार हुआ था?\nयह मार्केट वर्ष 1991 में बनकर पूरी तरह तैयार हुआ था।\n\n2. सैनिक मार्केट में कौन सा मुख्य युद्ध का अवशेष रखा है?\nयहां भारत-पाकिस्तान युद्ध में इस्तेमाल किया गया एक टैंक रखा हुआ है।\n\n3. इस मार्केट की दुकानों से मिलने वाले किराए का क्या किया जाता है?\nदुकानों से आने वाला सारा किराया सैनिक कल्याण बोर्ड में जाता है, जिससे भूतपूर्व सैनिकों और उनके परिवारों की मदद की जाती है।\n\n4. सैनिक मार्केट में कुल कितनी दुकानें हैं?\nइस परिसर में करीब 120 से 130 दुकानें हैं।\n\n5. युद्ध में शहीद सैनिकों के परिवारों को कितनी मदद मिलती है?\nशहीद सैनिक के परिवार को फौरन 2 लाख रुपये का मुआवजा मिलता है और विधवाओं को हर महीने 10,000 रुपये तक की मदद दी जाती है।",
  "url": "https://trendkia.com/jharkhand/ranchi-ka-35-saal-purana-sainik-market-51693",
  "category": "झारखंड",
  "publishedAt": "2026-10-26",
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    "झारखंड समाचार",
    "आजाद फर्मा"
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