रांची के आकीब ने पारंपरिक बिलोना घी से खड़ा किया लाखों का उद्यम, 50 से अधिक ग्रामीण महिलाओं को मिला काम आईएमएस से एमबीए करने वाले आकीब ने रांची में पारंपरिक ए2 बिलोना घी और जंगल के शहद का सफल व्यवसाय शुरू किया है। आज उनका यह उद्यम न केवल बड़े शहरों तक पहुंच रहा है, बल्कि 50 से अधिक ग्रामीण महिलाओं को रोजगार भी दे रहा है। झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाले आकीब ने उच्च शिक्षा पूरी करने के बाद किसी सामान्य नौकरी के बजाय अपने अनूठे उद्यम की राह चुनी। आईएमएस से एमबीए की डिग्री हासिल करने वाले आकीब को बचपन से ही नाश्ते में शुद्ध घी से बने पराठे खाने का शौक था। बड़े होकर जब उन्होंने बाजार में मिलने वाले घी की गुणवत्ता को परखा, तो पाया कि अधिकांश उत्पाद मिलावटी और नकली हैं। इसी चिंता ने उन्हें एक नई दिशा दी और उन्होंने तय किया कि ग्रामीण महिलाओं की मदद से पारंपरिक तरीके से तैयार शुद्ध ए2 बिलोना घी बनाया जाए और सीधे ग्राहकों तक पहुंचाया जाए। पारंपरिक विधि और जंगल से शहद जुटाने की पहल आकीब का यह उद्यम खास तौर पर ए2 बिलोना घी तैयार करता है, जिसे दूध से सीधे नहीं बल्कि पहले दही जमाकर और फिर मथकर निकले मक्खन से पारंपरिक पद्धति द्वारा पकाया जाता है। इसके साथ ही, वे झारखंड के वनों से प्राकृतिक रूप से व्हाइट फॉरेस्ट शहद जुटाकर बेचने का कार्य भी करते हैं। उनके उत्पाद की कीमत आम बाजार के मुकाबले काफी ज्यादा है, जहां एक किलोग्राम ए2 बिलोना घी का दाम ₹2200 तय किया गया है। शुरुआत में लोगों को यह कीमत अधिक लग सकती है, लेकिन शुद्धता और पोषण के मामले में इसे पूरी तरह जायज ठहराया जाता है। सवेरे टहलने वालों से शुरू हुई जागरूकता और सीधी ब्रांडिंग शुरुआती दौर में ग्राहकों को इस प्रीमियम और महंगे उत्पाद का महत्व समझाना एक बड़ी चुनौती थी। आकीब का मानना था कि किसी भी नए काम में ब्रांडिंग दूसरे व्यक्ति के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती, इसलिए उन्होंने खुद आगे आकर कमान संभाली। वे सुबह के वक्त टहलने निकलने वाले लोगों के बीच स्टॉल लगाते थे और उन्हें समझाते थे कि इस घी की कीमत अधिक क्यों है। वे लोगों को बताते थे कि पारंपरिक बिलोना पद्धति से दही का मक्खन तैयार करने में कितनी मेहनत लगती है और यह किस तरह शरीर के लिए लाभदायक व उत्तम फैट माना जाता है। वीडियो से समझाया उत्पादन का तरीका, बड़े शहरों तक पहुंचे ऑर्डर ग्राहकों का भरोसा जीतने के लिए उन्होंने बिलोना तकनीक से घी बनाने की पूरी प्रक्रिया का वीडियो लोगों को दिखाना शुरू किया। इस पारदर्शी तरीके ने लोगों का संकोच दूर कर दिया और उत्पाद की मांग तेजी से बढ़ने लगी। आज स्थिति यह है कि दिल्ली, मुंबई और पुणे जैसे बड़े महानगरों से लगातार आर्डर मिल रहे हैं। इसके अलावा रांची शहर के लगभग 10 प्रतिष्ठित रेस्टोरेंट, जिनमें गोकुल स्वीट्स, राज रेस्टोरेंट और गणगौर स्वीट्स शामिल हैं, नियमित तौर पर उनके ग्राहक बन चुके हैं। पूरे देश में डिलीवरी की सुविधा के साथ शुद्धता ही उनके काम की सबसे बड़ी ताकत बन चुकी है। मासिक बिक्री और ग्रामीण महिलाओं के लिए स्वावलंबन का जरिया आकीब के अनुसार, सबसे बड़ी मेहनत केवल पहले ग्राहक को जोड़ने में होती है। एक बार जब कोई उपभोक्ता असली और शुद्ध स्वाद पहचान लेता है, तो वह दोबारा खुद फोन करके ऑर्डर देता है और साथ में अन्य नए खरीदारों को भी जोड़ता है। इस कारोबार के माध्यम से अब हर महीने आराम से दो से ढाई लाख रुपये की बिक्री दर्ज की जा रही है। सबसे खास बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में 50 से अधिक घरेलू महिलाएं सक्रिय रूप से जुड़ी हुई हैं, जिनसे सीधे यह उत्पाद तैयार कराया जाता है। उन्हें उचित पारिश्रमिक मिलने से स्थानीय स्तर पर आजीविका का ठोस माध्यम मिल रहा है। इसका आप पर असर पारंपरिक और शुद्ध खाद्य उत्पादों का यह मॉडल स्थानीय आजीविका और गुणवत्तापूर्ण खानपान दोनों को सीधे प्रभावित करता है। • भारत में: महानगरों के उपभोक्ता अब ऑनलाइन माध्यम से सीधे असली ए2 बिलोना घी और वन शहद मंगा सकते हैं। इसके चलते शुद्ध देसी खाद्य सामग्री की तलाश करने वाले लोगों को प्रमाणित पारंपरिक उत्पाद मिल पा रहा है। • रांची और झारखंड में: स्थानीय स्तर पर 50 से अधिक ग्रामीण महिलाओं को घर के पास ही नियमित आय और रोजगार मिल रहा है। साथ ही शहर के प्रतिष्ठित रेस्टोरेंट भी प्रामाणिक देसी स्वाद ग्राहकों तक पहुंचा पा रहे हैं। • कीमत और बजट: ₹2200 प्रति किलो का दाम सामान्य घी से काफी अधिक है, जिसे उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद के रूप में देखा जा रहा है। स्वास्थ्य के प्रति सजग परिवारों को शुद्ध उत्पाद के लिए अतिरिक्त खर्च की योजना बनानी होगी। • पारदर्शिता और भरोसा: वीडियो और सीधी जानकारी के जरिए उपभोक्ता यह जान सकते हैं कि उनका खाना कैसे तैयार हुआ है। यह पहल ग्राहकों को पारंपरिक खानपान के प्रति जागरूक बनाने में मदद करती है। ऐसा क्यों हुआ यह उद्यम बाजार में मौजूद नकली घी की समस्या और प्रामाणिक पोषण की कमी के कारण अस्तित्व में आया। • मिलावट की चिंता: आकीब ने पाया कि बाजार में मिलने वाला ज्यादातर घी अत्यधिक मिलावटी और अशुद्ध है। इस समस्या को दूर करने के लिए उन्होंने खुद शुद्ध घी बनवाने का निर्णय लिया। • पारंपरिक ज्ञान का उपयोग: औद्योगिक क्रीम के बजाय दही मथकर मक्खन निकालने की प्राचीन बिलोना तकनीक को अपनाया गया। इससे पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक वसा वाला असली घी तैयार हो सका। • ग्रामीण भागीदारी: ग्रामीण महिलाओं के पास पारंपरिक रूप से मथने की कला मौजूद थी, जिसे एक संगठित व्यवसाय से जोड़ा गया। इससे महिलाओं को काम मिला और उत्पाद की प्रामाणिकता बनी रही। • सीधा संपर्क: उच्च कीमत को समझाने के लिए सुबह के टहलने वालों के बीच वीडियो दिखाकर तकनीक स्पष्ट की गई, जिससे ग्राहकों का शुरुआती संदेह समाप्त हुआ। सवाल-जवाब 1. आकीब का यह घी व्यवसाय किस शहर से संचालित होता है? यह व्यवसाय झारखंड की राजधानी रांची से संचालित होता है। 2. ए2 बिलोना घी तैयार करने की मुख्य विधि क्या है? यह घी सीधे दूध से नहीं, बल्कि दही जमाकर उसके मक्खन को पारंपरिक बिलोना पद्धति से मथकर तैयार किया जाता है। 3. इस ए2 बिलोना घी की कीमत कितनी रखी गई है? एक किलोग्राम ए2 बिलोना घी की कीमत ₹2200 है। 4. घी के अलावा आकीब कौन सा अन्य उत्पाद बेचते हैं? वे झारखंड के जंगलों से निकाला गया व्हाइट फॉरेस्ट शहद भी उपलब्ध कराते हैं। 5. इस व्यवसाय में कितनी स्थानीय महिलाएं जुड़ी हुई हैं? इस कार्य में 50 से अधिक ग्रामीण और घरेलू महिलाएं सीधे जुड़ी हुई हैं जो इसे तैयार करती हैं। 6. इस उद्यम की मासिक बिक्री लगभग कितनी होती है? वर्तमान में इस व्यवसाय से प्रति माह लगभग ₹2 लाख से ₹2.5 लाख तक की बिक्री हो जाती है। 7. रांची के कौन से प्रमुख रेस्टोरेंट इनके उत्पाद का उपयोग करते हैं? रांची के गोकुल स्वीट्स, राज रेस्टोरेंट और गणगौर स्वीट्स समेत लगभग 10 बड़े रेस्टोरेंट इनके ग्राहक हैं। प्रेरणा और सबक आकीब की व्यावसायिक यात्रा सिखाती है कि कैसे पारंपरिक हुनर और आधुनिक प्रबंधन मिलकर एक टिकाऊ व्यवसाय बना सकते हैं। • खुद आगे बढ़कर शुरुआत करें: ब्रांडिंग किसी और पर छोड़ने के बजाय संस्थापक को स्वयं ग्राहकों के सामने अपनी बात रखनी चाहिए। • पारदर्शिता से विश्वास जीतें: उत्पादन प्रक्रिया के वीडियो दिखाकर ग्राहकों को असली गुणवत्ता के प्रति आश्वस्त किया जा सकता है। • समुदाय को साथ जोड़ें: स्थानीय महिलाओं को भागीदार बनाकर कारोबार को सामाजिक उत्थान और रोजगार का माध्यम बनाया जा सकता है। • गुणवत्ता पर समझौता न करें: दाम अधिक होने पर भी यदि उत्पाद शत-प्रतिशत शुद्ध है, तो ग्राहक बार-बार लौटकर आते हैं। https://trendkia.com/jharkhand/ranchi-ke-aaqib-ne-parnparika-bilona-ghee-se-khara-kiya-lakhon-ka-udyama-50-se-adhika-gramina-mahilaon-ko-mila-kama-43620 TrendKia — Har trend, sabse pehle.