# रांची में आदिवासी एकता महाजुटान की भारी भीड़ के बीच हेमंत सोरेन की दूरी ने बढ़ाई सियासी हलचल, बंधु तिर्की का शक्ति प्रदर्शन मजबूत

> रांची के मोराबादी मैदान में आयोजित आदिवासी एकता महारैली में हज़ारों की भीड़ जुटी, लेकिन जेएमएम प्रमुख हेमंत सोरेन की गैरमौजूदगी ने नए राजनीतिक सवालों को जन्म दे दिया है।

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-09-02 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/ranchi-men-adivasi-ekata-mahajutana-ki-bhari-bhira-ke-bicha-hemant-soren-ki-duri-ne-barhai-siyasi-halachala-bandhu-tirkey-ka-shakt-26309 · **Language:** Hindi
**Tags:** झारखंड राजनीति, हेमंत सोरेन, बंधु तिर्की, चंपाई सोरेन, आदिवासी एकता महाजुटान, परिसीमन विवाद, रांची समाचार, कांग्रेस जेएमएम गठबंधन

झारखंड की राजधानी रांची का मोराबादी मैदान बीते रविवार को राज्यभर से पहुंचे आदिवासियों के विशाल हुजूम का गवाह बना। इस ऐतिहासिक आदिवासी एकता महाजुटान का आह्वान कांग्रेस नेता और राज्य के पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने किया था। रैली के मंच पर सत्ताधारी गठबंधन की एकजुटता दर्शाने के लिए कांग्रेस नेता राहुल गांधी और जेएमएम नेता सह झारखंड सीएम हेमंत सोरेन की बड़ी तस्वीरें लगाई गई थीं। मैदान में जुटी भारी भीड़ की नजरें लगातार दोनों शीर्ष नेताओं को खोजती रहीं, लेकिन दोनों ही मुख्य मंच पर उपस्थित नहीं हुए। राहुल गांधी ने एक लिखित संदेश के जरिए अपनी आभासी मौजूदगी दर्ज कराई, वहीं हेमंत सोरेन ने स्वयं आने के बजाय मांडर के विधायक विकास कुमार मुंडा को जेएमएम प्रतिनिधि बनाकर भेजा। इस महत्वपूर्ण आयोजन से मुख्यमंत्री की दूरी ने राज्य के सियासी गलियारों में कई तरह के कयासों को जन्म दे दिया है।

## आदिवासी महाजुटान का शक्ति प्रदर्शन और मंच से नेताओं का गायब रहना
रविवार को आयोजित इस महाजुटान में उम्मीद से अधिक जनसैलाब उमड़ा, जिसने आयोजकों के साथ-साथ राजनीतिक विश्लेषकों को भी हैरान कर दिया। रैली के केंद्र में आदिवासी समाज की अस्मिता, अधिकार और जल-जंगल-जमीन से जुड़े गंभीर विषय थे। मंच की सजावट में गठबंधन के दोनों प्रमुख चेहरों, राहुल गांधी और हेमंत सोरेन, को समान स्थान दिया गया था ताकि इसे एक संयुक्त राजनीतिक व सामाजिक संदेश के रूप में प्रस्तुत किया जा सके। हालांकि, दोनों ही दिग्गजों की व्यक्तिगत अनुपस्थिति ने रैली के संदेश को थोड़ा उलझा दिया। राहुल गांधी का संदेश पढ़ा गया, जिससे कांग्रेस की उपस्थिति का अहसास हुआ, लेकिन स्थानीय स्तर पर जेएमएम प्रमुख हेमंत सोरेन का स्वयं न आना और केवल एक प्रतिनिधि भेजना महज एक रस्म अदायगी बनकर रह गया। इसने कार्यकर्ताओं और रैली में आए आम लोगों के बीच चर्चा का विषय बना दिया कि आखिर इतने बड़े मंच का उपयोग मुख्यमंत्री ने स्वयं क्यों नहीं किया।

## कैथोलिक चर्च का पत्र और परिसीमन से जुड़े मुख्य मुद्दे
इस महाजुटान की सफलता के पीछे कैथोलिक चर्च द्वारा जारी एक पत्र की भी अहम भूमिका मानी जा रही है। आयोजन से पूर्व चर्च की ओर से ईसाई समुदाय के आदिवासी लोगों से बड़ी संख्या में इस रैली में शामिल होने की अपील करते हुए एक पत्र लिखा गया था। उस पत्र में स्पष्ट चिंता व्यक्त की गई थी कि केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित परिसीमन प्रक्रिया के कारण लोकसभा और विधानसभा में आदिवासियों के लिए आरक्षित सीटों की संख्या घटने का खतरा है, जिससे उनका राजनीतिक प्रतिनिधित्व कमजोर पड़ सकता है। इस महाजुटान में परिसीमन के अलावा कई अन्य जलते हुए मुद्दे उठाए गए। इनमें आदिवासी राजनीतिक प्रतिनिधित्व की सुरक्षा, CNT-SPT एक्ट को सख्ती से लागू रखना, MMDR कानून में हुए संशोधनों का विरोध, संविधान की पांचवीं अनुसूची के तहत प्रदत्त अधिकारों की रक्षा और जल-जंगल-जमीन पर आदिवासियों के पारंपरिक अधिकारों को अक्षुण्ण रखने जैसी मांगें प्रमुखता से शामिल थीं।

## हेमंत सोरेन की गैरमौजूदगी पर उठते गंभीर राजनीतिक सवाल
महाजुटान भले ही भीड़ के लिहाज से बेहद सफल रहा, लेकिन इसने राज्य की राजनीति में कई तीखे सवाल खड़े कर दिए हैं। सबसे पहला और प्रमुख सवाल यह उठ रहा है कि क्या यह वास्तव में पूरे आदिवासी समाज का तटस्थ महाजुटान था या फिर चर्च की अपील के कारण मुख्य रूप से ईसाई धर्मावलंबियों का जमावड़ा बनकर रह गया। दूसरा बड़ा सवाल हेमंत सोरेन के रुख को लेकर है। सामान्य तौर पर नेता ऐसे विशाल जनसमूह का लाभ उठाने का कोई मौका नहीं गंवाते हैं, जिसके लिए अक्सर भारी संसाधन जुटाने पड़ते हैं। यहां जब बंधु तिर्की ने बिना किसी सरकारी तंत्र के हज़ारों का हुजूम खड़ा कर दिया था, तब हेमंत सोरेन के पास अपनी सरकार की उपलब्धियां बताने, भावी योजनाओं की घोषणा करने और राजनीतिक विरोधियों को कड़ा संदेश देने का एक मुफीद अवसर था। इसके बावजूद रांची में रहते हुए भी मुख्यमंत्री का इस मंच से परहेज करना कई सियासी कयासों को बल दे रहा है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि हेमंत सोरेन के दूरी बनाने के पीछे कई संभावित कारण हो सकते हैं। पहला कारण यह माना जा रहा है कि कैथोलिक चर्च की प्रत्यक्ष भागीदारी और पत्र के सार्वजनिक होने से सरना आदिवासी समुदाय में नाराजगी की संभावना थी, जिसे भुनाने के लिए बीजेपी पहले से तत्पर दिख रही थी। दूसरा कारण यह हो सकता है कि परिसीमन के मुद्दे पर हेमंत सोरेन का आंतरिक रुख केंद्र सरकार के प्रस्तावों के साथ सामंजस्य बिठाने का हो। तीसरा कयास यह भी लगाया जा रहा है कि सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर कोई नई सियासी खिचड़ी पक रही है। हाल के दिनों में कांग्रेस और जेएमएम के बीच खींचतान की खबरें सामने आती रही हैं और हेमंत सोरेन के दिल्ली दौरों को लेकर यह चर्चा गर्म रही है कि वे नए राजनीतिक समीकरण तलाश रहे हैं। इसके अलावा, एक वजह यह भी हो सकती है कि मोराबादी की अपार भीड़ देखकर खुफिया इनपुट के आधार पर उन्हें लगा हो कि इस मंच पर जाने से कांग्रेस नेता बंधु तिर्की का कद उनके मुकाबले अधिक बड़ा दिखाई दे सकता है।

## भाजपा नेता चंपाई सोरेन का सीधा हमला और कांग्रेस का इतिहास
इस महाजुटान पर प्रतिक्रिया देते हुए झारखंड के पूर्व सीएम और भाजपा नेता चंपाई सोरेन ने तीखा हमला बोला है। उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा कि ईसाई धर्मगुरुओं के वायरल पत्र इस बात की तस्दीक करते हैं कि यह रैली मूल आदिवासियों की नहीं बल्कि मुख्य रूप से धर्मांतरित ईसाइयों का सम्मेलन थी। परिसीमन के मुद्दे पर कांग्रेस को घेरते हुए चंपाई सोरेन ने कहा कि इस विषय पर बात करने का कांग्रेस को कोई नैतिक अधिकार नहीं है। उन्होंने आंकड़े पेश करते हुए याद दिलाया कि 2008 में कांग्रेस के शासनकाल के दौरान पड़ोसी राज्य ओडिशा के मयूरभंज जिले में अनुसूचित जनजाति (ST) की आरक्षित सीटें 9 से घटाकर 7 कर दी गई थीं। इसी तरह छत्तीसगढ़ में भी ST आरक्षित सीटों की संख्या 34 से घटकर 29 रह गई थी।

चंपाई सोरेन ने कांग्रेस के ऐतिहासिक फैसलों पर हमला जारी रखते हुए कहा कि 1967 में जब बाबा कार्तिक उरांव ने डीलिस्टिंग बिल लाया था, तब कांग्रेस ने उसे ठंडे बस्ते में डालकर आदिवासी समाज के अस्तित्व को संकट में डालने का काम किया था। इसके अलावा 1961 में आदिवासी धर्म कोड को हटाने का काम भी कांग्रेस ने ही किया था। उन्होंने आरोप लगाया कि अतीत में दर्जनों बार आदिवासियों पर गोलियां चलवाने वाली कांग्रेस आज किस मुंह से खुद को आदिवासियों का हितैषी बताती है। उन्होंने दावा किया कि कांग्रेस वास्तव में उन धर्मांतरित ईसाइयों का समर्थन कर रही है जो मूल आदिवासियों के संवैधानिक अधिकारों का अतिक्रमण कर रहे हैं। चंपाई सोरेन के अनुसार आदिवासियों के लिए आरक्षित 90 प्रतिशत से अधिक सरकारी नौकरियों पर इन्हीं लोगों का कब्जा है और सिमडेगा, पाकुड़ तथा साहेबगंज जैसे कई जिलों में जाहेर स्थान एवं सरना स्थलों पर ताले लगने के लिए भी यही नीतियां जिम्मेदार हैं।

## गठबंधन की आंतरिक सियासत और बंधु तिर्की का उभरता कद
महाजुटान का मुख्य एजेंडा परिसीमन के विरोध का था। हेमंत सोरेन भी सैद्धांतिक रूप से परिसीमन के उन मापदंडों का विरोध करते रहे हैं जिनसे आदिवासी सीटें घटने का अंदेशा है। अगर जेएमएम प्रमुख के तौर पर हेमंत सोरेन मोराबादी के मंच पर उपस्थित होकर इस चिंता को साझा करते और एकजुटता का संदेश देते, तो इसका राजनीतिक प्रभाव कहीं अधिक व्यापक होता। हालांकि, उनकी अनुपस्थिति का सीधा फायदा कांग्रेस नेता और राज्य के पूर्व मंत्री बंधु तिर्की को मिला। मोराबादी मैदान में हज़ारों की भीड़ जुटाकर बंधु तिर्की इस आयोजन के मुख्य केंद्र बिंदु बन गए और सियासी गलियारों में उनके बढ़ते प्रभाव की चर्चा तेज हो गई है।

इस स्थिति पर टिप्पणी करते हुए भाजपा नेता और राज्य के पूर्व मंत्री भानु प्रताप शाही ने कहा कि बंधु तिर्की जी ने एक तरह से हेमंत जी को सीधी चुनौती दी है कि INDI अलायंस के भीतर वे उनसे बड़े नेता बनकर उभरे हैं। इस सफल आयोजन से बंधु तिर्की कांग्रेस आलाकमान को यह संदेश देने में कामयाब रहे हैं कि राज्य के आदिवासी समाज के बीच उनकी राजनीतिक पकड़ बेहद मजबूत है। अब राजनीतिक हलकों में यह कहा जाने लगा है कि आम आदिवासियों के बीच बंधु तिर्की का प्रभाव मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की तुलना में अधिक दिखाई दे रहा है। हालांकि, आय से अधिक संपत्ति के मामले में अदालत से सजायाफ्ता होने के कारण बंधु तिर्की खुद चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य हैं, लेकिन इसके बावजूद झारखंड की आदिवासी राजनीति में उनका यह शक्ति प्रदर्शन गठबंधन के भीतर शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

## इसका आप पर असर
रांची में आयोजित इस आदिवासी महाजुटान और उससे जुड़ी राजनीतिक बयानबाजी का सीधे तौर पर झारखंड के नागरिक और आदिवासी समुदाय प्रभावित होंगे।

- **भारत में:** परिसीमन प्रक्रिया को लेकर उठ रहे सवालों से देश के विभिन्न राज्यों में अनुसूचित जनजातियों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और आरक्षित सीटों के पुननिर्धारण पर राष्ट्रीय बहस तेज होगी। इससे भविष्य में होने वाले परिसीमन के मानकों और जनजातीय अधिकारों की सुरक्षा को लेकर केंद्र सरकार पर दबाव बढ़ सकता है।
- **झारखंड में:** परिसीमन और CNT-SPT एक्ट जैसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीतिक घमासान तेज होने से राज्य में जनजातीय आरक्षण और भूमि अधिकारों पर असर पड़ेगा। इसके अतिरिक्त सत्तारूढ़ गठबंधन के भीतर बढ़ते तनाव से राज्य की प्रशासनिक प्राथमिकताओं और विकास योजनाओं की गति प्रभावित हो सकती है।

## सवाल-जवाब

### 1. रांची में आयोजित आदिवासी एकता महाजुटान का मुख्य उद्देश्य क्या था?
इस महाजुटान का मुख्य उद्देश्य प्रस्तावित परिसीमन से आदिवासी आरक्षित सीटें घटने की चिंता व्यक्त करना, CNT-SPT एक्ट की सुरक्षा, MMDR संशोधन का विरोध और जल-जंगल-जमीन पर आदिवासी अधिकारों की रक्षा करना था।

### 2. इस महारैली का आयोजन किसने किया था?
इस महारैली का आह्वान और आयोजन कांग्रेस नेता और राज्य के पूर्व मंत्री बंधु तिर्की द्वारा किया गया था।

### 3. क्या मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस रैली में शामिल हुए थे?
नहीं, मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन रांची में मौजूद रहने के बावजूद व्यक्तिगत रूप से रैली में शामिल नहीं हुए और उन्होंने मांडर के विधायक विकास कुमार मुंडा को जेएमएम प्रतिनिधि बनाकर भेजा।

### 4. भाजपा नेता चंपाई सोरेन ने इस महाजुटान पर क्या आरोप लगाए?
चंपाई सोरेन ने आरोप लगाया कि चर्च के पत्रों से सिद्ध होता है कि यह मूल आदिवासियों की नहीं बल्कि धर्मांतरित ईसाइयों की रैली थी, और कांग्रेस का इतिहास आदिवासी विरोधी फैसलों से भरा रहा है।

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