रासायनिक उर्वरकों से खराब हो रही खेतों की मिट्टी, घर पर गोबर से ऐसे तैयार करें केंचुआ खाद रासायनिक खादों के अत्यधिक इस्तेमाल से मिट्टी की उपजाऊ क्षमता घट रही है। ऐसे में किसान घर पर ही गाय और भैंस के गोबर से आसानी से केंचुआ खाद तैयार कर सकते हैं, जो करीब 75 दिनों में बनकर पूरी तरह तैयार हो जाती है। खेती किसानी में रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध प्रयोग से लगातार मिट्टी की सेहत बिगड़ रही है और जमीन की उर्वरा शक्ति कम हो रही है। इस समस्या से निपटने के लिए प्राकृतिक खेती और जैविक खाद का उपयोग बेहद जरूरी हो गया है। कृषि वैज्ञानिक आदर्श कुमार के अनुसार, केंचुआ खाद बनाने के लिए किसी महंगे साजो-सामान या बड़े संसाधनों की आवश्यकता नहीं होती है। जिन अन्नदाताओं के पास अपने पशुधन के रूप में गाय या भैंस मौजूद हैं, वे बहुत कम लागत में अपने घर के परिसर में ही बेहतरीन वर्मीकंपोस्ट तैयार कर सकते हैं। इसके लिए सबसे पहले खेत, किसी बगीचे या पेड़ के नीचे एक उपयुक्त छायादार स्थान का चयन किया जाना चाहिए। यदि ऐसा कोई प्राकृतिक स्थान उपलब्ध न हो, तो किसान भाई पुआल या पराली का छप्पर बनाकर भी यह प्रक्रिया शुरू कर सकते हैं। इस जैविक खाद को बनाने के लिए मुख्य रूप से दो प्रमुख तकनीकें अपनाई जाती हैं, जिन्हें ढेर विधि और गड्ढा विधि के नाम से जाना जाता है। ढेर विधि से खाद बनाने की पूरी प्रक्रिया केंचुआ खाद तैयार करने की पहली तकनीक ढेर विधि कहलाती है, जिसमें खुले स्थान पर जमीन का उपयोग किया जाता है। इस विधि में सबसे पहले चुनी गई जमीन पर पुआल की एक हल्की परत बिछाई जाती है। इसके पश्चात इसके ऊपर गोबर की एक परत फैलाई जाती है और प्रति वर्गफुट के हिसाब से लगभग 35 से 40 केंचुए छोड़े जाते हैं। इसके बाद गोबर और अन्य जैविक कचरे की एक और परत इस पर डाली जाती है, जिससे पूरा ढेर तैयार हो जाता है। इस पूरे ढेर को नमी सुरक्षित रखने के लिए जूट के पुराने बोरों से अच्छी तरह ढक दिया जाता है। इस दौरान यह बेहद जरूरी है कि ढेर पर नियमित रूप से पानी का छिड़काव किया जाए ताकि अंदर नमी बरकरार रहे। लगभग 30 से 35 दिन बीत जाने के बाद इस ढेर की एक बार पलटाई करनी पड़ती है। इस पूरी प्रक्रिया के बाद करीब 65 से 75 दिनों के भीतर किसानों के लिए उच्च गुणवत्ता वाली केंचुआ खाद बनकर पूरी तरह तैयार हो जाती है। गड्ढा विधि और अन्य जरूरी सावधानियां दूसरी तकनीक के रूप में किसान गड्ढा विधि का चयन कर सकते हैं, जिसके लिए लगभग दो से ढाई फीट गहरा सीमेंटेड गड्ढा बनाया जाता है। इस बात का विशेष ध्यान रखना आवश्यक है कि गड्ढे के भीतर किसी भी प्रकार का अतिरिक्त पानी जमा न हो, इसलिए वहां पानी की उचित निकासी की व्यवस्था होनी चाहिए। इस गड्ढे में केवल गाय या भैंस का गोबर ही डाला जाना चाहिए, और साथ ही पौधों की सूखी पत्तियां तथा सब्जियों के बचे हुए डंठल जैसे जैविक अवशेष भी इसमें मिलाए जा सकते हैं। कृषि वैज्ञानिक के अनुसार, केंचुआ खाद बनाने के लिए मुख्य रूप से आइसीनिया फेटिडा प्रजाति के केंचुओं का ही उपयोग किया जाता है, क्योंकि यही वे जीव हैं जो जैविक पदार्थों को तेजी से उपजाऊ खाद में बदलने का काम करते हैं। खाद की प्रक्रिया में भूलकर भी बकरी, सूअर या घोड़े जैसे अन्य जानवरों के गोबर का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। नमी, तापमान और सुरक्षा के खास उपाय वर्मीकंपोस्ट तैयार करते समय कुछ छोटी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण बातों को ध्यान में रखना सफलता की कुंजी है। खाद के गड्ढे या ढेर के अंदर लगभग 70 से 75 प्रतिशत तक नमी का स्तर हमेशा बना रहना चाहिए, जो केंचुओं के जीवित रहने और काम करने के लिए बहुत उपयोगी है। इसके अलावा, यदि तापमान 37 डिग्री सेल्सियस से अधिक बढ़ जाता है, तो इससे केंचुओं को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है और वे मर सकते हैं, इसलिए कार्यस्थल पर पर्याप्त छाया की व्यवस्था होना अनिवार्य है। इसके साथ ही केंचुओं को चींटियों और पक्षियों जैसे प्राकृतिक शत्रुओं से भी सुरक्षित रखना जरूरी होता है। जब खाद पूरी तरह बनकर तैयार हो जाती है, तो उसकी पहचान यह है कि वह दिखने में चायपत्ती की तरह छोटे-छोटे दानों जैसी नजर आने लगती है। जब यह स्थिति आ जाए, तो समझ लेना चाहिए कि खाद तैयार है और उसके बाद उसमें पानी डालना पूरी तरह बंद कर देना चाहिए। मिट्टी सुधार के साथ अतिरिक्त आमदनी का जरिया कृषि वैज्ञानिक आदर्श ने सभी किसान भाइयों को यह महत्वपूर्ण सलाह दी है कि केंचुआ खाद का प्रयोग करने से न केवल खेतों की मिट्टी की गुणवत्ता और उसकी उपजाऊ क्षमता में सुधार होता है, बल्कि किसान इसे बाजार में बेचकर एक नया रोजगार भी शुरू कर सकते हैं। आज के समय में कृषि बाजारों में शुद्ध केंचुआ खाद की बहुत अधिक मांग बनी हुई है, जिससे ग्रामीण इलाकों के लोग अपनी आय में अच्छा इजाफा कर सकते हैं। जैविक खेती की बढ़ती मांग के चलते यह व्यवसाय किसानों के लिए मुनाफे का सौदा साबित हो सकता है। इसका आप पर असर केंचुआ खाद अपनाने से खेती की लागत कम होगी और रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता घटेगी। • भारत में: देश भर के किसानों को महंगे रासायनिक उर्वरकों से राहत मिलेगी और जैविक उत्पादों की पैदावार बढ़ेगी। • स्थानीय स्तर पर: ग्रामीण इलाकों में किसान इसे व्यावसायिक रूप से बेचकर अपनी अतिरिक्त आय बढ़ा सकेंगे। • मिट्टी की सेहत: करीब 65 से 75 दिनों में तैयार होने वाली यह खाद जमीन की उपजाऊ शक्ति को लंबे समय तक सुरक्षित रखेगी। • लागत में कमी: घर पर उपलब्ध गोबर और पशुधन के कचरे का इस्तेमाल होने से खाद की निर्माण लागत बेहद कम आएगी। • फसल की गुणवत्ता: इस जैविक खाद के उपयोग से उगाई जाने वाली फसलों की गुणवत्ता में सुधार होगा और पैदावार बेहतर होगी। ऐसा क्यों हुआ रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक प्रयोग से मिट्टी की प्राकृतिक उर्वरता लगातार नष्ट हो रही है, जिससे जैविक विकल्पों की आवश्यकता बढ़ गई है। केंचुए और गोबर का संयोजन प्राकृतिक रूप से पोषक तत्व प्रदान करता है। • मिट्टी का क्षरण: वर्षों से रसायनों के अंधाधुंध उपयोग के कारण जमीन बंजर होने की कगार पर पहुंच रही है। • जैविक चक्र: आइसीनिया फेटिडा प्रजाति के केंचुए कचरे और गोबर को तेजी से उपजाऊ तत्वों में विघटित करते हैं। • पर्यावरण अनुकूलता: पारंपरिक तरीकों से खाद बनाने पर पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचता और कृषि कचरा उपयोगी बनता है। सवाल-जवाब 1. केंचुआ खाद तैयार होने में कितना समय लगता है? ढेर विधि से केंचुआ खाद लगभग 65 से 75 दिनों में पूरी तरह तैयार हो जाती है। 2. खाद बनाने के लिए किस प्रजाति के केंचुओं का उपयोग होता है? इस प्रक्रिया के लिए मुख्य रूप से आइसीनिया फेटिडा प्रजाति के केंचुओं का इस्तेमाल किया जाता है। 3. खाद बनाते समय ढेर में कितनी नमी बनाए रखनी चाहिए? गड्ढे या ढेर के अंदर लगभग 70 से 75 प्रतिशत नमी बनाए रखना बेहद उपयोगी होता है। 4. क्या केंचुआ खाद में घोड़े या बकरी का गोबर डाल सकते हैं? नहीं, खाद तैयार करने के लिए हमेशा केवल गाय या भैंस का गोबर ही डालना चाहिए। 5. तैयार खाद की पहचान कैसे की जाती है? खाद तैयार होने पर वह चायपत्ती जैसी दानेदार दिखाई देने लगती है। https://trendkia.com/jharkhand/rasayanika-urvarakon-se-kharaba-ho-rahi-kheto-ki-mitti-ghara-para-gobara-se-aise-taiyara-karen-kenchua-khada-57606 TrendKia — Har trend, sabse pehle.