सर्दियों में पाले और कोहरे से फसलों को बचाने के लिए जरूरी कृषि सलाह सर्दियों की शुरुआत के साथ कोहरे और पाले के कारण सब्जियों में फंगस, सड़न और पत्तियों के गलने का खतरा बढ़ जाता है, जिसे नियंत्रित करने के लिए विशेषज्ञों ने समय पर फफूंदनाशक छिड़काव और हल्की सिंचाई के उपाय सुझाए हैं। सर्दियों के आगमन के साथ ही सुबह और शाम के समय तापमान में स्पष्ट गिरावट दर्ज की जा रही है। मौसम का यह बदलाव न केवल आम दिनचर्या को प्रभावित करता है, बल्कि खेतों में खड़ी सब्जियों और दूसरी फसलों पर भी इसका गंभीर असर पड़ता है। शीत ऋतु में लगातार छाने वाला कुहासा और तेज पाला किसानों की मेहनत पर पानी फेर सकता है। अनुकूल परिस्थितियां न मिलने के कारण लहलहाते पौधे अचानक कमजोर होने लगते हैं, उनकी पत्तियां पीली पड़ने लगती हैं और तनों में सड़न की समस्या पैदा हो जाती है। विशेष रूप से आलू तथा अन्य कोमल सब्जी वर्गीय फसलों पर पाले की सीधी मार पड़ती है, जिससे समय पर बचाव न करने पर उत्पादकों को भारी आर्थिक क्षति का सामना करना पड़ सकता है। मौसम में परिवर्तन और फंगल संक्रमण का खतरा कृषि विशेषज्ञ अंबिका के अनुसार, मौसम का मिजाज बदलते ही खेतों में लगी फसलों की संवेदनशीलता काफी बढ़ जाती है। सर्दियों के दौरान जब वातावरण में घना कोहरा लंबे समय तक छाया रहता है और हवा में नमी का स्तर अत्यधिक बढ़ जाता है, तब फंगस यानी फफूंद जनित रोगों के फैलने की संभावना चरम पर पहुंच जाती है। अधिक आद्रता और कम धूप के कारण पौधों की पत्तियां धीरे-धीरे गलने लगती हैं। इसके अलावा पौधों के तने तथा भूमि से सटे निचले हिस्सों में सड़न शुरू हो जाती है। आलू जैसी नकदी फसलों में जब पाला मार जाता है, तो पौधों की बढ़वार पूरी तरह अवरुद्ध हो जाती है। इससे कंदों का विकास रुक जाता है, जिसका सीधा और नकारात्मक प्रभाव कुल पैदावार पर पड़ता है। फसलों की सुरक्षा के लिए फफूंदनाशक दवाओं का प्रबंध इन मौसमी संकटों से सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए बुवाई की शुरुआत से ही सतर्कता बरतने की आवश्यकता होती है। प्राथमिक स्तर पर किसानों को हमेशा उपचारित बीजों का ही चयन करना चाहिए, क्योंकि सही उपचार से आरंभिक चरण में ही कई घातक बीमारियों को रोका जा सकता है। जिन किसानों ने बिना बीजोपचार के फसलें बो दी हैं, उन्हें घना कोहरा छाने से पहले ही सुरक्षात्मक कदम उठाने होंगे। ऐसी फसलों के बचाव के लिए मेटालेक्सिल, मैनकोजेब और कार्बेन्डाजिम जैसी उपयुक्त फफूंदनाशक दवाओं का हर 10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करने का सुझाव दिया गया है। किसानों को ध्यान रखना चाहिए कि इन रसायनों का प्रयोग बीमारी के विशेष लक्षणों और फसल की प्रकृति के अनुसार किसी कृषि विशेषज्ञ के मार्गदर्शन में ही किया जाए। जल प्रबंधन और हल्की सिंचाई की भूमिका फसल सुरक्षा में सिंचाई और जल निकासी का सही संतुलन अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। खेतों में किसी भी सूरत में जलभराव नहीं होना चाहिए, क्योंकि जड़ों और तनों के पास जमा अनावश्यक पानी नमी को और अधिक बढ़ा देता है, जिससे फफूंद संक्रमण तेजी से फैलता है। जब भी रात में तेज पाला पड़ने या अत्यधिक ठंड की आशंका बने, उस समय खेतों में हल्की सिंचाई करना फसलों की सुरक्षा के लिए बेहद लाभकारी सिद्ध होता है। हल्की नमी जमीन के तापमान को एकदम नीचे गिरने से रोकती है और पौधों को शीत लहर के झटके से बचाती है। इसके साथ ही, किसानों को बिना किसी ठोस जानकारी के बार-बार या अनियंत्रित रूप से दवाओं का छिड़काव करने से बचना चाहिए। रसायन की सटीक मात्रा और छिड़काव का सही समय विशेषज्ञ की सलाह से तय करना ही लाभदायक रहता है। इसका आप पर असर सर्दियों में पाले और घने कोहरे से सब्जियों की गुणवत्ता और पैदावार दोनों प्रभावित हो सकती हैं, जिसे समय रहते उचित प्रबंध से बचाया जा सकता है। • भारत में: शीत ऋतु के दौरान तापमान में गिरावट से आलू और मौसमी हरी सब्जियों के उत्पादन पर सीधा असर पड़ता है। किसान यदि शुरुआती चरण में ही सुरक्षात्मक उपाय अपनाते हैं तो बाजार में आपूर्ति और मूल्य दोनों स्थिर रह सकते हैं। • देवघर में: स्थानीय सब्जी उत्पादकों के लिए खेतों में जलजमाव रोकना और पाले की आशंका पर हल्की सिंचाई करना अत्यंत आवश्यक है। यह कदम स्थानीय मंडियों में आपूर्ति को सुरक्षित रखने और किसानों के मुनाफे को बचाने में मदद करेगा। • छिड़काव का नियम: बिना बीजोपचार वाली फसलों पर हर 10 दिन में सुझाई गई फफूंदनाशक दवाओं का उपयोग करना चाहिए। सही मात्रा और अंतराल तय करने के लिए कृषि विशेषज्ञों की राय अवश्य लें। • जल प्रबंधन: खेतों में अतिरिक्त पानी को जमा न होने दें ताकि जड़ों में फंगस न फैले। मौसम ठंडा होने पर अत्यधिक सिंचाई के बजाय केवल हल्की सिंचाई की व्यवस्था रखें। ऐसा क्यों हुआ सर्दियों के महीनों में कोहरे, अत्यधिक नमी और अचानक गिरते तापमान का संयोजन पौधों के प्राकृतिक विकास चक्र को बाधित कर देता है, जिससे फफूंद और पाले का प्रभाव बढ़ जाता है। • वातावरणीय नमी और फंगस: लगातार घना कोहरा छाए रहने और धूप न निकलने से पौधों के इर्द-गिर्द नमी बहुत बढ़ जाती है। यह नम वातावरण फफूंद जनित रोगों के रोगाणुओं को पनपने और तेजी से फैलने के लिए अनुकूल परिस्थितियां प्रदान करता है। • तापमान में भारी गिरावट: जब रात का तापमान अत्यधिक कम हो जाता है, तब पाला पड़ता है जो पौधों की कोशिकाओं को जमाकर नुकसान पहुंचाता है। इसके चलते आलू और हरी सब्जियों की पत्तियां काली या पीली पड़कर गलने लगती हैं। • उपचारित बीजों की कमी: बुवाई के समय बीजोपचार न करने से पौधों की प्रारंभिक रोग प्रतिरोधक क्षमता कमजोर रह जाती है। ऐसी फसलें प्रतिकूल मौसम और रोगाणुओं के हमले को आसानी से नहीं झेल पाती हैं। • अत्यधिक जलभराव: खेतों में पानी की समुचित निकासी न होने पर जड़ों के पास अतिरिक्त सीलन बनी रहती है। यह अतिरिक्त आर्द्रता पौधों के तनों को सड़ाने और रोगों को बढ़ाने का सीधा कारण बनती है। सवाल-जवाब 1. सर्दियों में घने कोहरे के कारण फसलों पर क्या प्रभाव पड़ता है? कोहरे और वातावरण में नमी बढ़ने से फसलों में फफूंद जनित बीमारियां फैलती हैं, जिससे पत्तियां गलने और तने सड़ने लगते हैं। 2. पाले से किस फसल को सबसे अधिक नुकसान होने की आशंका रहती है? पाले के कारण आलू सहित कई संवेदनशील सब्जियों की बढ़वार रुक जाती है और उत्पादन पर सीधा प्रतिकूल असर पड़ता है। 3. फसलों को फफूंद से बचाने के लिए किन दवाओं के छिड़काव की सलाह दी गई है? फसलों की सुरक्षा के लिए मेटालेक्सिल, मैनकोजेब और कार्बेन्डाजिम जैसी फफूंदनाशक दवाओं का हर 10 दिन में छिड़काव करने का सुझाव दिया गया है। 4. पाले की आशंका होने पर खेतों में क्या उपाय करना चाहिए? पाले की स्थिति बनने पर खेतों में हल्की सिंचाई करनी चाहिए, जिससे जमीन का तापमान नियंत्रित रहता है और फसलें सुरक्षित रहती हैं। 5. बुवाई के समय कौन सी प्राथमिक सावधानी बरतनी चाहिए? फसलों को शुरुआती रोगों से सुरक्षित रखने के लिए किसानों को हमेशा उपचारित बीज का ही इस्तेमाल करना चाहिए। https://trendkia.com/jharkhand/sardiyon-men-pale-aura-kohare-se-phasalon-ko-bachane-ke-lie-jaruri-krishi-salaha-53800 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