तसर सिल्क पर हाथ की चिकनकारी से रेशमा ने खड़ा किया अपना मुकाम, बेंगलुरु से चेन्नई तक मांग रांची की 47 वर्षीय रेशमा ने तसर सिल्क पर हाथ की महीन चिकनकारी का अनूठा मेल कर अपना काम शुरू किया, जिसकी मांग अब दक्षिण भारत तक पहुंच गई है। झारखंड की राजधानी रांची की रहने वाली रेशमा ने पारंपरिक परिधानों में एक नया प्रयोग कर अपनी अलग पहचान बनाई है। उन्होंने तसर सिल्क के महीन फैब्रिक पर हाथ की नक्काशीदार चिकनकारी का अनूठा मेल तैयार किया है। 47 साल की उम्र में अपनी खुद की मेहनत से आत्मनिर्भर बनने वाली रेशमा आज न सिर्फ अपने पैरों पर खड़ी हैं, बल्कि बड़े-बड़े शहरों में लगने वाली प्रदर्शनियों में जाकर अपने बनाए परिधानों की मार्केटिंग भी कर रही हैं। उनका मानना है कि पहले वे अपने पति के सहारे स्वतंत्र थीं, मगर अपनी काबिलियत के बल पर आत्मनिर्भर बनने का अनुभव बेहद खास और संतोषजनक होता है। पूरी तरह हाथ से तैयार होता है हर परिधान इस अनूठे कलेक्शन की सबसे बड़ी खासियत इसका पूरी तरह हस्तनिर्मित होना है। आमतौर पर बाजार में मशीनों से तैयार कपड़े मिलते हैं, मगर यहां तसर सिल्क के सलवार सूट की सिलाई से लेकर उस पर की जाने वाली चिकनकारी की हर कढ़ाई सिर्फ और सिर्फ हाथों से की जाती है। मशीन का बिल्कुल भी इस्तेमाल नहीं होने के कारण हर परिधान बेहद खास बन जाता है। इस जटिल और बारीक काम की वजह से एक सूट को तैयार करने में लगभग 25 दिन का वक्त लग जाता है। कारीगरों की मेहनत और परिधानों की कीमत एक सिंगल सलवार सूट को मुकम्मल करने के लिए 4 से 5 हुनरमंद कारीगर मिलकर लगातार काम करते हैं। यही वजह है कि इस खास प्रीमियम सूट की कीमत 25,000 रुपये तक पहुंच जाती है। इसके अलावा उनके संग्रह में 5,000 रुपये से लेकर 20,000 रुपये तक के सामान्य चिकनकारी वाले सूट भी मौजूद हैं। रंगों की विविधता की बात करें तो ग्राहकों के लिए 25 से 30 अलग-अलग रंगों के विकल्प उपलब्ध कराए जाते हैं, ताकि हर पसंद को पूरा किया जा सके। गुणवत्ता पर भरोसा और दक्षिण भारत तक विस्तार रेशमा खुद ही हर कपड़े की डिजाइनिंग और कलरिंग का जिम्मा संभालती हैं। ग्राहक जिस रंग की मांग करते हैं, वे उसी के अनुसार परिधान तैयार कर देती हैं। उनका स्पष्ट नजरिया रहा है कि लोगों को हमेशा असली और प्रामाणिक चीज ही पहनाई जाए। रेशमा का कहना है कि व्यापार में भले ही दो ही पीस बिकें, लेकिन वे पूरी तरह शानदार और बेहतरीन गुणवत्ता वाले होने चाहिए। इसी सोच का नतीजा है कि तसर और चिकनकारी की यह परंपरा आज बेंगलुरु और चेन्नई जैसे बड़े शहरों के खरीदारों को भी खूब पसंद आ रही है और वहां से लगातार इसके ऑर्डर मिल रहे हैं। इसका आप पर असर पारंपरिक हथकरघा और हस्तशिल्प के शौकीनों के लिए यह पहल प्रामाणिक और विशिष्ट परिधानों के नए विकल्प उपलब्ध कराती है। • खरीदारों के लिए: हस्तनिर्मित तसर और चिकनकारी के मूल संगम वाले सूट 5,000 से 25,000 रुपये के बजट में मिलते हैं। ग्राहक अपनी पसंद के अनुसार 25 से 30 रंगों में से मनचाहा रंग चुनकर कस्टमाइज भी करा सकते हैं। • शहरी ग्राहकों के लिए: बड़े शहरों की प्रदर्शनियों और ऑनलाइन ऑर्डरों के जरिए यह कलेक्शन अब आसानी से उपलब्ध है। चेन्नई और बेंगलुरु जैसे महानगरों के खरीदार भी घर बैठे इन परिधानों को ऑर्डर कर सकते हैं। • कारीगरों के लिए: हर सूट में 4 से 5 कारीगरों को करीब 25 दिनों तक निरंतर काम मिलता है। इससे पारंपरिक हस्तशिल्पियों को उचित मेहनताना और रोजगार का जरिया मिलता है। • महिला उद्यमियों के लिए: यह पहल दर्शाती है कि किसी भी उम्र में अपने हुनर से स्वरोजगार शुरू किया जा सकता है। घरेलू जिम्मेदारियों के बाद भी खुद के बूते स्वतंत्र पहचान बनाई जा सकती है। ऐसा क्यों हुआ पारंपरिक चिकनकारी को तसर सिल्क जैसे समृद्ध कपड़े पर उतारने का विचार बाजार में अनोखे और पूरी तरह प्रामाणिक उत्पादों की कमी के कारण उपजा। रेशमा ने मशीनी कपड़ों की भीड़ से अलग हटकर शुद्ध हस्तशिल्प पर आधारित काम शुरू करने का फैसला किया। • मूल सोच और प्रामाणिकता: रेशमा का उद्देश्य ग्राहकों को बाजार के साधारण परिधानों की जगह शुद्ध और हाथ से बनी मूल चीजें उपलब्ध कराना था। उन्होंने संख्या की जगह उत्पाद की उत्कृष्टता और अनोखेपन को प्राथमिकता दी। • हस्तशिल्प परंपरा का संरक्षण: सामान्यतः चिकनकारी सूती या जॉर्जेट पर देखी जाती है, लेकिन इसे तसर सिल्क पर हाथ से उतारकर एक नया प्रयोग किया गया। इस प्रक्रिया में सिलाई से लेकर कढ़ाई तक सब कुछ बिना किसी मशीन के हाथ से ही किया गया। • मांग और विस्तार: बड़े शहरों की प्रदर्शनियों में सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलने से इस काम को नया हौसला मिला। दक्षिण भारत के बड़े केंद्रों जैसे चेन्नई और बेंगलुरु से लगातार आ रही मांग ने इस उद्यम को मजबूत बनाया। सवाल-जवाब 1. रेशमा कौन हैं और वे किस प्रकार के परिधान तैयार करती हैं? रेशमा रांची की रहने वाली एक उद्यमी हैं, जो तसर सिल्क पर हाथ से चिकनकारी की कढ़ाई वाले सलवार सूट तैयार करती हैं। 2. इस खास सलवार सूट की कीमत कितनी है? इस प्रीमियम हाथ से बने सूट की कीमत 25,000 रुपये तक जाती है, जबकि उनके पास 5,000 से 20,000 रुपये के अन्य चिकनकारी सूट भी उपलब्ध हैं। 3. एक सूट को तैयार करने में कितना समय लगता है? पूरी तरह हाथ से सिलाई और महीन चिकनकारी का काम होने की वजह से एक सूट बनने में करीब 25 दिन का वक्त लगता है। 4. एक परिधान को बनाने में कितने कारीगर काम करते हैं? प्रत्येक सलवार सूट को तैयार करने के लिए 4 से 5 हुनरमंद कारीगर मिलकर काम करते हैं। 5. ग्राहकों के लिए कितने रंगों के विकल्प मौजूद हैं? उनके संग्रह में कम से कम 25 से 30 रंगों के विकल्प उपलब्ध हैं और ग्राहकों की मांग के अनुसार भी रंग तैयार किए जाते हैं। 6. इन परिधानों की मांग किन बड़े शहरों से आ रही है? प्रदर्शनियों में पहचान मिलने के बाद दक्षिण भारत के बड़े शहरों जैसे बेंगलुरु और चेन्नई से इसके नियमित ऑर्डर आ रहे हैं। प्रेरणा और सबक रेशमा की यह सफलता साबित करती है कि दृढ़ निश्चय और हुनर के दम पर उम्र के किसी भी पड़ाव में आत्मनिर्भरता हासिल की जा सकती है। • आत्मनिर्भरता का महत्व: किसी दूसरे पर निर्भर रहने की तुलना में अपनी मेहनत से पहचान बनाना आत्मसम्मान और आजादी दोनों देता है। 47 की उम्र में भी नई शुरुआत कर अपने पैरों पर मजबूती से खड़ा हुआ जा सकता है। • मात्रा से ऊपर गुणवत्ता: व्यापार में हजारों सस्ते पीस बेचने के बजाय दो बेहद उम्दा और असली उत्पाद तैयार करना ज्यादा स्थायी पहचान दिलाता है। उत्कृष्टता पर ध्यान देने से ग्राहक अपने आप जुड़ते हैं। • अपनी कला का विस्तार: सिर्फ अपने शहर तक सीमित रहने के बजाय बड़े बाजारों और प्रदर्शनियों में खुद जाकर उत्पादों को प्रस्तुत करना चाहिए। स्थानीय हुनर को सही मंच मिले तो उसकी पहचान दूर-दराज तक फैलती है। • टीम वर्क और रोजगार: एक बेहतरीन उत्पाद हमेशा मिल-जुलकर तैयार होता है। अपने हुनर के जरिए अन्य कारीगरों को जोड़कर उन्हें भी सम्मानजनक काम और आजीविका दी जा सकती है। https://trendkia.com/jharkhand/tasara-silka-para-hatha-ki-chikanakari-se-reshma-ne-khara-kiya-apana-mukama-bengaluru-se-chennai-taka-manga-35894 TrendKia — Har trend, sabse pehle.