# टाटानगर से संबलपुर जा रही इस्पात एक्सप्रेस पौने नौ घंटे देरी से पहुंची, उपभोक्ता फोरम ने रेलवे पर लगाया 35 हजार रुपये का जुर्माना

> टाटानगर से संबलपुर के बीच इस्पात एक्सप्रेस के 528 मिनट लेट होने पर जिला उपभोक्ता आयोग ने रेलवे की दलीलों को खारिज करते हुए यात्री को 35,000 रुपये का हर्जाना देने का आदेश दिया है.

**Type:** article · **Category:** झारखंड · **Published:** 2026-09-21 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/jharkhand/tatanagar-se-sambalpur-ja-rahi-ispat-express-paune-nau-ghnte-deri-se-pahunchi-upabhokta-phorama-ne-railways-para-lagaya-35-hajara--35815 · **Language:** Hindi
**Tags:** भारतीय रेलवे, उपभोक्ता आयोग, मुआवजा, इस्पात एक्सप्रेस, टाटानगर, संबलपुर, ट्रेन लेट

ट्रेनों की बेतहाशा देरी से जूझते रेल यात्रियों के लिए उपभोक्ता अदालत का एक कड़ा फैसला सामने आया है. झारखंड में निर्धारित समय से लगभग नौ घंटे पीछे चल रही ट्रेन के कारण एक मुसाफिर को भारी मानसिक, शारीरिक और आर्थिक परेशानी का सामना करना पड़ा. मामले की सुनवाई करते हुए जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने इसे सेवा में गंभीर कमी माना और भारतीय रेलवे को पीड़ित यात्री के पक्ष में कुल 35 हजार रुपये का भुगतान करने का फरमान जारी किया है. उपभोक्ता संरक्षण मंच ने स्पष्ट किया कि यात्रियों का समय बेहद मूल्यवान है और बिना किसी वैध कारण के अत्यधिक विलंब होने पर रेलवे अपनी जवाबदेही से पल्ला नहीं झाड़ सकता.

## पांच घंटे के सफर में बीत गए पूरे चौदह घंटे
इस पूरे कानूनी विवाद की शुरुआत 23 सितंबर 2024 की यात्रा से जुड़ी है. यात्री संजय कुमार ने टाटानगर से ओडिशा के संबलपुर तक जाने के लिए इस्पात एक्सप्रेस में स्लीपर क्लास की दो बर्थ आरक्षित कराई थीं. समय सारिणी के मुताबिक इस गाड़ी को टाटानगर स्टेशन से सुबह 10 बजकर 18 मिनट पर रवाना होना था और उसी दिन दोपहर बाद 3 बजकर 50 मिनट पर संबलपुर पहुंच जाना चाहिए था. दोनों स्टेशनों के बीच का यह सफर सामान्य तौर पर साढ़े पांच घंटे के आसपास पूरा हो जाता है.

हकीकत में रेल का परिचालन पूरी तरह बेपटरी हो गया. जब इस्पात एक्सप्रेस आखिरकार संबलपुर स्टेशन पर जाकर रुकी, तब तक घड़ी अपनी निर्धारित समय सीमा से 528 मिनट यानी 8 घंटे 48 मिनट आगे निकल चुकी थी. जो दूरी दोपहर के समय तय हो जानी चाहिए थी, उसके लिए मुसाफिरों को करीब 14 घंटे तक ट्रेन में फंसे रहना पड़ा. इस लंबी और अप्रत्याशित देरी के चलते यात्री का पूरा कार्यक्रम अस्त-व्यस्त हो गया, जिससे उन्हें गंभीर मानसिक तनाव, शारीरिक थकान और वित्तीय क्षति उठानी पड़ी. राहत पाने के लिए उन्होंने उपभोक्ता फोरम का दरवाजा खटखटाया और रेलवे प्रशासन से 4.5 लाख रुपये के मुआवजे का दावा ठोका.

## रेलवे की तकनीकी दलीलें और क्षेत्राधिकार की चुनौती
संजय कुमार की शिकायत जब जिला उपभोक्ता आयोग के सामने आई, तो रेलवे प्रशासन ने भरसक कानूनी विरोध दर्ज कराया. रेलवे के प्रतिनिधियों ने तर्क दिया कि ट्रेन से जुड़े ऐसे दावों की सुनवाई केवल रेलवे दावा न्यायाधिकरण कानून के तहत ही हो सकती है. इसी आधार पर रेलवे ने दावा किया कि उपभोक्ता संरक्षण आयोग को इस प्रकरण पर सुनवाई करने का कोई वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं है.

रेलवे की ओर से कई अन्य तकनीकी आपत्तियां भी पेश की गईं. उसने कहा कि मामले में आईआरसीटीसी और खड़गपुर रेल मंडल को आवश्यक पक्षकार नहीं बनाया गया है, जिससे यह याचिका अधूरी है. इसके अलावा रेलवे ने औपचारिक नोटिस प्रक्रिया का अनुपालन न होने और यात्री द्वारा आर्थिक नुकसान का ठोस दस्तावेजी प्रमाण न दे पाने की बात उठाई. रेलवे का साफ कहना था कि उसकी ओर से यात्री सेवा में किसी भी तरह की कोई लापरवाही या कमी नहीं बरती गई है.

## अदालती नजीर और आयोग का कड़ा रुख
जिला उपभोक्ता आयोग के अध्यक्ष सुनील कुमार सिंह के साथ सदस्य प्रदीप कुमार मिश्रा और संजू शाही की पीठ ने मामले की गहन पड़ताल की. पीठ ने सबसे पहले रेलवे के क्षेत्राधिकार संबंधी एतराज की समीक्षा की. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा रेल परिचालन में देरी और मुआवजे के संबंध में दिए गए ऐतिहासिक फैसलों का हवाला देते हुए पीठ ने रेलवे के उस दावे को खारिज कर दिया कि उपभोक्ता मंच सुनवाई नहीं कर सकता. आयोग ने व्यवस्था दी कि यात्री एक वैध उपभोक्ता है और सेवा में खामी के आधार पर यह शिकायत पूरी तरह विचारणीय है.

इसके बाद आयोग ने रेलवे से सीधा सवाल किया कि इस्पात एक्सप्रेस के करीब नौ घंटे लेट होने का वास्तविक कारण क्या था और क्या यह असामान्य विलंब किसी ऐसी अप्रत्याशित परिस्थिति का परिणाम था जो रेलवे के नियंत्रण से पूरी तरह बाहर थी. आयोग ने पाया कि रेलवे प्रशासन ऐसा कोई भी साक्ष्य अथवा रिकॉर्ड प्रस्तुत करने में नाकाम रहा, जिससे यह साबित हो सके कि ट्रेन का घंटों रुकना किसी प्राकृतिक आपदा या अपरिहार्य बाहरी संकट की वजह से हुआ था.

आदेश में शीर्ष अदालत की इस गंभीर टिप्पणी को भी रेखांकित किया गया कि आम नागरिकों और यात्रियों के समय का पूरा सम्मान होना चाहिए. रेलवे केवल यह कहकर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता कि गाड़ी लेट हो गई थी. प्रशासन का यह दायित्व है कि वह विलंब का सटीक कारण स्पष्ट करे और यह प्रमाणित करे कि परिस्थितियां उसके वश में नहीं थीं. संजय कुमार ने अपने आरक्षित टिकटों और अन्य अभिलेखों के जरिए पूरी घटना की पुष्टि कर दी थी, जिसके आधार पर आयोग ने रेलवे को सेवा में कोताही बरतने का दोषी पाया.

## मुआवजे की रकम और भुगतान की सख्त मियाद
यात्री द्वारा 4.5 लाख रुपये के हर्जाने की मांग पर विचार करते हुए आयोग ने इसे आंशिक रूप से स्वीकार किया. 2 सितंबर 2026 को दिए गए अंतिम फैसले में उपभोक्ता आयोग ने रेलवे को निर्देश दिया कि वह पीड़ित यात्री संजय कुमार को मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना के एवज में 30 हजार रुपये का मुआवजा अदा करे. साथ ही कानूनी लड़ाई में हुए खर्च की भरपाई के लिए 5 हजार रुपये मुकदमे के व्यय के रूप में अलग से प्रदान करे. इस प्रकार रेलवे को कुल 35 हजार रुपये का भुगतान करना होगा.

फोरम ने रेलवे को आदेश सुनाए जाने की तारीख से 45 दिनों की सख्त समय सीमा के भीतर यह पूरी राशि सौंपने का निर्देश दिया है. यदि तय मियाद के अंदर भुगतान नहीं किया जाता है, तो इस संपूर्ण धनराशि पर 12 प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज लागू होगा, जिसकी गणना तय अवधि बीतने के बाद से वास्तविक भुगतान होने के दिन तक लगातार की जाएगी.

## इसका आप पर असर
यह फैसला उन लाखों दैनिक और लंबी दूरी के रेल यात्रियों के अधिकारों को मजबूत करता है जो बिना किसी सूचना के घंटों लेट चलने वाली ट्रेनों की वजह से परेशान होते हैं.

- **भारत में:** यदि किसी भी ट्रेन के अत्यधिक विलंब का ठोस और अपरिहार्य कारण रेलवे साबित नहीं कर पाता, तो कोई भी यात्री उपभोक्ता फोरम में सेवा में कमी का दावा कर सकता है. इससे यात्रियों को रेलवे की मनमानी लेटलतीफी के खिलाफ कानूनी हर्जाना हासिल करने का स्पष्ट रास्ता मिलता है.
- **झारखंड और ओडिशा में:** टाटानगर और संबलपुर जैसे प्रमुख औद्योगिक मार्गों पर यात्रा करने वाले लोगों के लिए यह फैसला समयबद्धता सुनिश्चित कराने में नजीर बनेगा. इस रूट के नियमित यात्री अब लंबी देरी होने पर टिकट और यात्रा विवरण संभालकर कानूनी राहत की मांग कर सकते हैं.
- **रेलवे प्रशासन पर:** इस आदेश से रेल प्रबंधन पर बिना वैध कारणों के ट्रेनों को घंटों रोकने या रीशेड्यूल करने पर जवाबदेही तय होगी. परिचालन संबंधी लापरवाही जारी रहने पर रेलवे को बार-बार भारी कानूनी हर्जाना चुकाना पड़ सकता है.
- **यात्रियों के लिए सुझाव:** जब भी ट्रेन असामान्य रूप से कई घंटे लेट हो, अपने टिकट, बोर्डिंग समय और आगमन के आधिकारिक रिकॉर्ड को सुरक्षित रखें. यह दस्तावेज भविष्य में उपभोक्ता अदालत में मुआवजे के दावे का मुख्य आधार बनते हैं.

## ऐसा क्यों हुआ
उपभोक्ता फोरम ने रेलवे पर यह जुर्माना इसलिए लगाया क्योंकि ट्रेन के असामान्य विलंब के पीछे रेलवे कोई भी अपरिहार्य या नियंत्रण से बाहर का कारण साबित नहीं कर सका.

- **अत्यधिक परिचालन विलंब:** पांच घंटे की सामान्य यात्रा में इस्पात एक्सप्रेस 528 मिनट यानी 8 घंटे 48 मिनट की अत्यधिक देरी से पहुंची. इस भारी देरी की वजह से यात्री का पूरा सफर 14 घंटे लंबा खिंच गया.
- **बचाव में साक्ष्य का अभाव:** रेलवे प्रशासन अदालत के समक्ष ऐसा कोई तकनीकी लॉग या साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर पाया जिससे यह साबित हो कि देरी किसी प्राकृतिक आपदा या अपरिहार्य कारणों से हुई थी. बिना ठोस वजह के परिचालन में इतनी बड़ी देरी को सेवा में गंभीर कमी माना गया.
- **सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देश:** शीर्ष अदालत ने स्पष्ट आदेश दिया है कि यात्रियों के समय का मूल्य है और रेलवे सिर्फ लेटलतीफी का हवाला देकर पल्ला नहीं झाड़ सकता. इसी न्यायिक सिद्धांत के आधार पर आयोग ने रेलवे की सभी तकनीकी आपत्तियों को खारिज कर दिया.

## सवाल-जवाब

### 1. उपभोक्ता आयोग ने रेलवे को कुल कितना भुगतान करने का निर्देश दिया है?
आयोग ने पीड़ित यात्री को 30 हजार रुपये का मुआवजा और 5 हजार रुपये मुकदमे के खर्च के रूप में कुल 35 हजार रुपये चुकाने का आदेश दिया है.

### 2. इस्पात एक्सप्रेस अपने तय समय से कितने घंटे लेट पहुंची थी?
यह ट्रेन निर्धारित समय से 528 मिनट यानी 8 घंटे और 48 मिनट की देरी से संबलपुर पहुंची थी.

### 3. यह यात्रा किस तारीख को और किन स्टेशनों के बीच की गई थी?
यह यात्रा 23 सितंबर 2024 को टाटानगर से संबलपुर स्टेशन के बीच स्लीपर क्लास में की गई थी.

### 4. पीड़ित यात्री ने रेलवे से कितने रुपये के मुआवजे की मांग की थी?
यात्री संजय कुमार ने शारीरिक, मानसिक और आर्थिक नुकसान के एवज में रेलवे से 4.5 लाख रुपये के हर्जाने की मांग की थी.

### 5. रेलवे को इस राशि का भुगतान कितने दिनों के भीतर करना होगा?
आदेश जारी होने की तारीख से 45 दिनों के भीतर भुगतान करना होगा, अन्यथा 12 प्रतिशत सालाना ब्याज देय होगा.

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