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  "type": "article",
  "title": "इंस्टाग्राम पर दोस्त को 'सुंदर' कहना अपराध नहीं, कर्नाटक हाईकोर्ट ने कॉलेज छात्र के खिलाफ दर्ज एफआईआर रद्द की",
  "summary": "कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक 20 साल के कॉलेज छात्र के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामला खारिज कर दिया है, जिस पर अपनी 21 साल की महिला सहपाठी को इंस्टाग्राम पर 'सुंदर' कहने का आरोप था। अदालत ने कहा कि निजी बातचीत में आज की पीढ़ी की भाषा का उपयोग करना कोई अपराध नहीं है और पुलिस की कार्रवाई को कानून का दुरुपयोग बताया।",
  "content": "बेंगलुरु के एक 20 वर्षीय कॉलेज छात्र को मंगलवार को बड़ी कानूनी राहत मिली है। इस युवक पर अपनी एक 21 वर्षीय महिला सहपाठी को सोशल मीडिया पर संदेश भेजकर उसकी तारीफ करने के कारण गंभीर आपराधिक मामला दर्ज किया गया था। कर्नाटक हाईकोर्ट ने मामले में दखल देते हुए छात्र के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी (एफआईआर) को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। आधुनिक समय की बातचीत के तरीकों पर एक अहम फैसला सुनाते हुए, न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि किसी निजी डिजिटल बातचीत में दोस्त की तारीफ करना कोई आपराधिक कृत्य नहीं है। अदालत ने दृढ़ता से कहा कि आज के दौर की सामान्य शब्दावली का इस्तेमाल करके की गई तारीफ को महिला का पीछा करने या उसकी गरिमा को ठेस पहुंचाने जैसे गंभीर अपराधों के बराबर नहीं माना जा सकता।\n\nनिजी बातचीत पर पुलिस केस\n\nइस पूरे कानूनी विवाद की शुरुआत लोकप्रिय फोटो शेयरिंग प्लेटफॉर्म इंस्टाग्राम पर हुए एक सीधे संदेश के जरिए हुई थी। याचिकाकर्ता युवक और 21 वर्षीय शिकायतकर्ता युवती कोई अजनबी नहीं थे, बल्कि वे एक ही शिक्षण संस्थान में पढ़ने वाले दोस्त थे। अपनी इस एकांत डिजिटल बातचीत के दौरान, युवक ने अपनी क्लासमेट को प्यारी और सुंदर कहते हुए एक संदेश भेजा था। हालांकि यह बातचीत पूरी तरह से व्यक्तिगत थी और केवल उन दोनों के बीच तक ही सीमित थी, लेकिन हालात तब बिगड़ गए जब युवती के पिता ने इस चैट को देख लिया। चूंकि युवती के पिता एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी हैं, इसलिए इस निजी बातचीत ने तुरंत एक औपचारिक पुलिस केस का रूप ले लिया।\n\nपिता के संज्ञान में बात आते ही तेजी से पुलिस शिकायत दर्ज करा दी गई। जांच एजेंसियों ने कॉलेज छात्र के खिलाफ देश के नए आपराधिक कानून, भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की कई सख्त धाराओं के तहत मामला दर्ज कर लिया। इसके अतिरिक्त, पुलिस ने उस पर सूचना प्रौद्योगिकी (आईटी) अधिनियम की धारा 66ए के तहत भी केस दर्ज किया। इस त्वरित पुलिस कार्रवाई का मतलब था कि दो कॉलेज छात्रों के बीच हुआ एक सामान्य सा संवाद अचानक एक ऐसी गंभीर कानूनी लड़ाई में बदल गया, जिसने युवक की स्वतंत्रता को ही खतरे में डाल दिया था।\n\nआज के दौर की भाषा को समझना\n\nजब यह मामला न्यायपालिका के सामने पहुंचा, तो एकल न्यायाधीश की पीठ की अध्यक्षता कर रहे जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने स्थिति का बेहद व्यावहारिक नजरिए से आकलन किया। उन्होंने छात्र द्वारा इस्तेमाल किए गए विशिष्ट शब्दों और उस संदर्भ का विश्लेषण किया जिसमें वे शब्द कहे गए थे। न्यायाधीश ने इस शब्दावली को जेन जी लिंगो यानी आज की युवा पीढ़ी द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली आम भाषा के रूप में पहचाना। पीठ ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि यह संवाद पूरी तरह से दो लोगों के बीच की निजी चैट थी, न कि कोई सार्वजनिक घोषणा या कोई अवांछित सार्वजनिक टिप्पणी।\n\nअपना फैसला सुनाते हुए, अदालत ने एक दोस्ताना तारीफ और दुर्भावनापूर्ण व्यवहार के बीच स्पष्ट अंतर रेखांकित किया। कार्यवाही के दौरान अदालत ने कहा, \"यह चैट सार्वजनिक नहीं है।\" न्यायाधीश ने विस्तार से बताया कि इसमें इस्तेमाल की गई भाषा आधुनिक छात्रों की सामान्य बातचीत शैली को दर्शाती है। इसलिए, किसी निजी स्थान पर सामान्य तौर पर किसी को सुंदर कहना कानूनी रूप से पीछा करने (स्टॉकिंग), छिपकर देखने (वॉयरिज्म), या किसी महिला के सम्मान को ठेस पहुंचाने के इरादे से किए गए कृत्य की परिभाषा में फिट नहीं बैठता। पीठ ने निष्कर्ष निकाला कि इस तरह के हानिरहित संवादों पर आपराधिक कानून लागू करना न्याय की घोर गलत व्याख्या है।\n\nकानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग पर रोक\n\nसिर्फ विशिष्ट संदेशों का विश्लेषण करने के अलावा, हाईकोर्ट ने ऐसे मामले दर्ज किए जाने के व्यापक परिणामों पर भी गहरी चिंता व्यक्त की। जस्टिस नागप्रसन्ना ने उन विनाशकारी प्रभावों के बारे में कड़ी चेतावनी दी जो अनुचित आपराधिक मुकदमों के कारण युवाओं पर पड़ सकते हैं। जब छात्रों को मामूली व्यक्तिगत बातों पर आपराधिक न्याय प्रणाली में घसीटा जाता है, तो उनकी पढ़ाई, करियर की संभावनाएं और उनका पूरा भविष्य भारी जोखिम में पड़ जाता है।\n\nपीठ ने घोषणा की कि इस विशेष पुलिस जांच को आगे जारी रहने देना कानूनी प्रक्रिया का गंभीर दुरुपयोग होगा। युवक के किसी भी तरह के आगे के उत्पीड़न को रोकने के लिए, अदालत ने दर्ज एफआईआर को सिरे से खारिज कर दिया। इसके अलावा, पुलिस जांच के कारण हुई परेशानी को स्वीकार करते हुए, न्यायाधीश ने जांच अधिकारी को तत्काल आदेश जारी किए। पुलिस को निर्देश दिया गया कि वे जांच के दौरान छात्र से जब्त किए गए सभी व्यक्तिगत सामान तुरंत वापस करें, जिसमें विशेष रूप से उसके इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को बिना किसी देरी के लौटाना सुनिश्चित किया जाए।\n\nइसका आप पर असर\n• भारत में: यह फैसला युवाओं की निजी डिजिटल बातचीत को अनावश्यक पुलिस कार्रवाई और गंभीर आपराधिक आरोपों से कानूनी सुरक्षा प्रदान करता है।\n• कर्नाटक में: बेंगलुरु के कॉलेज छात्रों के लिए यह एक बड़ी राहत है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि सोशल मीडिया की सामान्य चैट पर उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं किया जाएगा।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. छात्र के खिलाफ एफआईआर क्यों दर्ज की गई थी?\nछात्र ने अपनी महिला सहपाठी को इंस्टाग्राम पर 'सुंदर' कहते हुए एक निजी संदेश भेजा था, जिसे लड़की के आईपीएस पिता ने देख लिया और पुलिस में शिकायत दर्ज करा दी।\n\n2. यह अहम फैसला किस अदालत ने सुनाया?\nयह फैसला कर्नाटक हाईकोर्ट की एकल पीठ के न्यायाधीश जस्टिस एम. नागप्रसन्ना ने सुनाया है।\n\n3. छात्र पर कौन से कानून लगाए गए थे?\nपुलिस ने कॉलेज छात्र के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) की विभिन्न धाराओं और आईटी अधिनियम की धारा 66ए के तहत मामला दर्ज किया था।\n\n4. चैट की भाषा पर जज ने क्या टिप्पणी की?\nन्यायाधीश ने कहा कि बातचीत में इस्तेमाल किए गए शब्द आम 'जेन जी लिंगो' हैं और निजी चैट में ऐसी भाषा का उपयोग पीछा करने या अपराध की श्रेणी में नहीं आता।\n\n5. छात्र के जब्त किए गए सामान का क्या होगा?\nअदालत ने जांच अधिकारी को निर्देश दिया है कि वे जांच के दौरान जब्त किए गए सभी इलेक्ट्रॉनिक उपकरण तुरंत छात्र को वापस कर दें।",
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  "category": "कर्नाटक",
  "publishedAt": "2026-07-22",
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