पति की महिला मित्र पर नहीं चलेगा क्रूरता का मुकदमा, कर्नाटक हाईकोर्ट ने रद्द की कानूनी कार्यवाही कर्नाटक हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि शादीशुदा व्यक्ति की प्रेमिका पति का रिश्तेदार नहीं होती, इसलिए उस पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 के तहत क्रूरता का केस नहीं चलाया जा सकता। वैवाहिक विवादों और आपराधिक कानूनों की व्याख्या को लेकर कर्नाटक हाईकोर्ट ने एक बेहद अहम कानूनी फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट तौर पर रेखांकित किया है कि किसी विवाहित पुरुष की प्रेमिका अथवा महिला मित्र को कानून के दायरे में उसका रिश्तेदार नहीं माना जा सकता। इस कानूनी आधार पर अदालत ने एक पत्नी द्वारा अपने पति की महिला मित्र के खिलाफ दर्ज कराए गए क्रूरता और प्रताड़ना के आपराधिक मुकदमे को पूरी तरह खारिज कर दिया है। विवाद की पृष्ठभूमि और निचली अदालत का संज्ञान इस पूरे मामले की शुरुआत एक पारिवारिक विवाद से हुई, जहाँ एक विवाहित महिला ने अपने पति और उसकी महिला मित्र के खिलाफ गंभीर कानूनी धाराओं में केस दर्ज कराया था। पत्नी ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 85 के तहत वैवाहिक क्रूरता का आरोप लगाया था। इसके अलावा मारपीट, आपराधिक धमकी देने तथा दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के तहत भी आरोप लगाए गए थे। जब यह मामला निचली अदालत में पहुँचा, तो ट्रायल कोर्ट ने इन तमाम आरोपों पर संज्ञान लेते हुए पति के साथ साथ उसकी प्रेमिका के खिलाफ भी कानूनी कार्यवाही आगे बढ़ाने की अनुमति दे दी थी। हाईकोर्ट में चुनौती और कानूनी दलीलें ट्रायल कोर्ट द्वारा कार्यवाही शुरू किए जाने के आदेश के खिलाफ संबंधित महिला मित्र ने कर्नाटक हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने याचिका दाखिल कर अपने ऊपर लगे सभी आपराधिक आरोपों को चुनौती दी और मामले को रद्द करने की माँग की। याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि वह उस परिवार का हिस्सा नहीं हैं और कानूनन रिश्तेदार की श्रेणी में नहीं आती हैं, लिहाजा उन पर इस प्रकार के वैवाहिक अपराध की धाराएँ थोपी नहीं जा सकतीं। जस्टिस एम. नागप्रसन्ना का आदेश और सुप्रीम कोर्ट की नजीर इस याचिका पर सुनवाई कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की एकल पीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान अदालत ने सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व स्थापित न्यायिक फैसलों का उल्लेख किया। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेशों में पहले ही स्पष्ट व्यवस्था दी थी कि किसी शादीशुदा पुरुष की महिला मित्र को उसका रिश्तेदार नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने कहा कि भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 का दायरा केवल पति या उसके वास्तविक रिश्तेदारों तक सीमित है, जो पत्नी के साथ किसी प्रकार की क्रूरता का आचरण करते हैं। दहेज उत्पीड़न के सबूतों का अभाव हाईकोर्ट ने केस डायरी और उपलब्ध दस्तावेजों की बारीकी से पड़ताल करते हुए यह भी रेखांकित किया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस सबूत अथवा प्रत्यक्ष आरोप मौजूद नहीं है, जिससे यह सिद्ध हो सके कि प्रेमिका का दहेज की माँग या किसी प्रकार के उत्पीड़न से सीधा नाता था। अदालत ने पुराने कानून यानी भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के संदर्भ को भी स्पष्ट किया। अदालत के अनुसार, उस कानून में भी दुर्व्यवहार या प्रताड़ना का संबंध पति अथवा उसके नातेदारों द्वारा की गई दहेज की माँग से जुड़ा होना अनिवार्य था, जो इस प्रकरण में बिल्कुल साबित नहीं होता। इन सभी कानूनी पहलुओं और तथ्यों के आधार पर हाईकोर्ट ने महिला के खिलाफ लंबित तमाम आपराधिक कार्यवाहियों को निरस्त कर दिया। इसका आप पर असर यह फैसला वैवाहिक मामलों में दर्ज होने वाली एफआईआर और तीसरे पक्ष पर लागू होने वाले कानूनी दायरों को स्पष्ट करता है। • कानूनी अधिकार: वैवाहिक विवादों में किसी तीसरे पक्ष या मित्र पर परिवारिक क्रूरता की धाराएँ मनमाने ढंग से नहीं लगाई जा सकती हैं। यदि कोई पक्ष बिना रिश्तेदारी के ऐसे मामलों में घसीटा जाता है, तो वह हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाकर राहत प्राप्त कर सकता है। • जांच और पुलिस प्रक्रिया: पुलिस और निचली अदालतों को किसी भी शिकायत पर संज्ञान लेने से पहले आरोपी के कानूनी संबंध की पुष्टि करनी होगी। इससे मामलों में अप्रासंगिक व्यक्तियों के खिलाफ अनावश्यक मुकदमेबाजी और अदालती प्रक्रिया में कमी आएगी। • दहेज उत्पीड़न के मामले: दहेज कानून के तहत आरोप तय करने के लिए सीधा संबंध और ठोस सबूत होना अनिवार्य रहेगा। साक्ष्यों के अभाव में केवल व्यक्तिगत रंजिश के आधार पर आपराधिक कार्यवाही को अदालतें सीधे खारिज कर देंगी। • शिकायतकर्ताओं के लिए सबक: वैवाहिक विवाद में कानूनी शिकायत दर्ज कराते समय सही धाराओं और प्रासंगिक कानूनी प्रावधानों का ही उपयोग करना चाहिए। गलत व्यक्ति या अनुपयुक्त कानूनी धाराओं का चयन करने से पूरे मामले की कानूनी मजबूती कमजोर हो सकती है। ऐसा क्यों हुआ यह कानूनी आदेश वैवाहिक क्रूरता से संबंधित कानूनों के सटीक दायरे और पूर्व निर्धारित न्यायिक सिद्धांतों की व्याख्या के आधार पर दिया गया है। • कानून में रिश्तेदार की स्पष्ट परिभाषा: भारतीय न्याय संहिता की धारा 85 विशेष रूप से केवल पति या उसके परिजनों पर लागू होती है। शादीशुदा व्यक्ति की प्रेमिका पारिवारिक या कानूनी दृष्टि से रिश्तेदार की परिभाषा में नहीं आती है। • सर्वोच्च न्यायालय के दिशा निर्देश: सुप्रीम कोर्ट ने अपने पिछले कई फैसलों में यह स्पष्ट स्थापित किया है कि वैवाहिक अपराधों की धाराओं में बाहरी व्यक्तियों को शामिल नहीं किया जा सकता। इसी न्यायिक नजीर का पालन करते हुए हाईकोर्ट ने इस मामले में दखल दिया। • सबूतों की गैरमौजूदगी: केस के दस्तावेजों और पुलिस रिकॉर्ड में आरोपी महिला द्वारा दहेज माँगने या प्रत्यक्ष उत्पीड़न करने का कोई ठोस आधार नहीं पाया गया। बिना किसी साक्ष्य के आपराधिक मुकदमा चलाना कानूनी प्रक्रिया का दुरुपयोग माना गया। सवाल-जवाब 1. कर्नाटक हाईकोर्ट ने इस मामले में क्या मुख्य फैसला सुनाया? अदालत ने कहा कि किसी विवाहित व्यक्ति की महिला मित्र को उसका रिश्तेदार नहीं माना जा सकता, इसलिए उस पर वैवाहिक क्रूरता का केस नहीं चल सकता। 2. पत्नी ने अपने पति और उसकी मित्र पर किन धाराओं में आरोप लगाए थे? पत्नी ने भारतीय न्याय संहिता की धारा 85, मारपीट, आपराधिक धमकी और दहेज प्रतिषेध अधिनियम, 1961 के तहत आरोप दर्ज कराए थे। 3. यह आदेश हाईकोर्ट के किस जज ने दिया? यह फैसला कर्नाटक हाईकोर्ट के जस्टिस एम. नागप्रसन्ना की पीठ ने सुनाया। 4. क्या अदालत को दहेज उत्पीड़न का कोई सबूत मिला? नहीं, अदालत ने पाया कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई सबूत या आरोप नहीं था जो प्रेमिका को दहेज माँग या उत्पीड़न से सीधे जोड़ता हो। https://trendkia.com/karnataka/karnataka-high-court-ne-pati-ki-garlaphrenda-para-krurata-ka-kesa-kiya-radda-38025 TrendKia — Har trend, sabse pehle.