# 70 की उम्र में भी अकेले संभालती हैं खेत और पशु, कभी अस्पताल नहीं गईं — कस्तूरी ने बताया सेहत का देसी फॉर्मूला

> छतरपुर के मिढ़का गांव की 70 पार कस्तूरी राजपूत आज भी अकेले खेती और पशुपालन करती हैं, बीमार नहीं पड़तीं और इसका श्रेय वे लगातार मेहनत और देसी खान-पान को देती हैं।

**Category:** जीवनशैली · **Published:** 2026-06-13 · **Source:** TrendKia
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## गांव की वह महिला जिसकी उम्र थमती नहीं
मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में लवकुश नगर के पास बसे मिढ़का गांव की कस्तूरी राजपूत उम्र के उस पड़ाव पर हैं, जहां ज्यादातर लोग आराम तलाशते हैं। 70 साल पार कर चुकीं कस्तूरी आज भी सुबह से शाम तक खेत और पशुओं के बीच जुटी रहती हैं, वह भी बिना किसी सहारे के, अकेले। पशुपालन हो या खेती-बाड़ी, हर काम वह खुद निपटा लेती हैं।

## बचपन से ही मेहनत उनकी पहचान रही
लोकल 18 से बातचीत में कस्तूरी ने बताया कि उनकी पूरी जिंदगी इसी छोटे से गांव में बीती है। यहीं उनका बचपन गुजरा और यहीं शादी हुई। उनके समय में पढ़ाई-लिखाई का चलन नहीं था, इसलिए बचपन से ही काम-काज में हाथ बंटाना शुरू कर दिया था। खेती से लेकर पशुओं की देखभाल तक, गांव का हर तरह का काम वह करती आई हैं।

## सुबह 5 बजे से शुरू होता है दिन
इस उम्र में भी उनकी दिनचर्या किसी युवा से कम नहीं। कस्तूरी बताती हैं कि वह रोज सुबह 5 बजे उठ जाती हैं और गांव की नदी में नहाने पहुंच जाती हैं। इसके बाद बहू के साथ मिलकर बोरिंग से पानी भरती हैं। घर पर भोजन कर लेने के बाद, या फिर कलयाबा यानी हल्का-फुल्का नाश्ता साथ लेकर वह बकरियां चराने खेत और जंगल की ओर निकल जाती हैं। पूरा दिन जंगल और तेज धूप में बकरियां चराने के बाद ही वह शाम को घर लौटती हैं।

## खेती का हर काम खुद करती हैं
कस्तूरी खेती से जुड़ा लगभग हर काम संभाल लेती हैं। पहले वह जुताई और बुवाई भी अपने हाथों से करती थीं, हालांकि अब यह काम ट्रैक्टर से होने लगा है। लेकिन फसल काटने में आज भी उन्हें किसी की जरूरत नहीं पड़ती — अपने खेत की फसल तो वह काटती ही हैं, दूसरों की फसल भी काट देती हैं। इतना ही नहीं, 70 की उम्र में वह बकरी चराने के साथ-साथ बटाई पर दूसरों की खेती भी संभालती हैं। उनका साफ मानना है कि अगर उन्होंने मेहनत छोड़ दी और घर बैठ गईं, तो बीमार पड़ जाएंगी। यही वजह है कि वह रुकती नहीं।

## देसी खान-पान ही असली ताकत
अपनी सेहत का राज वह अपने पुराने, देसी खान-पान को मानती हैं। कस्तूरी कहती हैं कि वैसे तो वह बाकी सबकी तरह सामान्य भोजन ही करती हैं, लेकिन कुछ परंपरागत चीजें आज भी उनकी थाली में बनी हुई हैं। गर्मी के मौसम में वह महुआ बीनकर रख लेती हैं और फिर उसी महुआ की डुबरी बनाकर खाती हैं, साथ ही महुआ का मुरका भी बनाती हैं। गर्मियों भर सुबह के नाश्ते में वह बेर का बिरचुन खाती हैं, जो उनके मुताबिक पाचन तंत्र को मजबूत बनाने के साथ-साथ शरीर को ठंडक भी देता है।

रोजमर्रा के भोजन में रोटी-सब्जी और भाजी-दाल के साथ दूध और घी आज भी शामिल रहता है। कस्तूरी मानती हैं कि अब घर में पहले जितना दूध नहीं रहता, फिर भी एक बार में आधा से एक किलो दूध तो वह खा ही लेती हैं और साथ में घी भी लेती हैं।

## आज तक नहीं हुई सर्दी-जुकाम
70 पार करने के बावजूद कस्तूरी का दावा है कि वह आज तक कभी गंभीर रूप से बीमार नहीं पड़ीं। उनका कहना है कि उन्हें अब तक सर्दी-जुकाम तक नहीं हुआ। काम करते-करते कभी ज्यादा थकान की वजह से बुखार जरूर आ जाता है, लेकिन उसका इलाज भी वह गांव के वैद्य से दवा लेकर ही कर लेती हैं। शहर के अस्पताल जाने की नौबत आज तक नहीं आई। हां, उम्र के असर से उनके कुछ दांत जरूर टूट गए हैं।

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