अमेरिका में रोजमर्रा की दयालुता पर नया सामाजिक सर्वे, आंकड़े पेश कर रहे हैं हैरान करने वाली तस्वीर सार्वजनिक तनाव और सोशल मीडिया पर कड़वाहट के बीच गैलप के एक नए राष्ट्रव्यापी सर्वे से पता चला है कि ज्यादातर अमेरिकी नागरिक अपने दैनिक जीवन में नियमित रूप से दयालुता का अनुभव करते हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर दिन-रात दिखने वाली बयानबाजी और राजनीतिक तनाव के कारण अक्सर यह लगने लगता है कि समाज में आपसी सहानुभूति और भलमनसाहत खत्म हो रही है। समाचारों में दिखाई देने वाली हिंसा और कटुता लोगों को अपने पड़ोसियों तथा आसपास के नागरिकों पर भरोसा करने से रोकती है। हालांकि, व्यापक स्तर पर एकत्रित किए गए नए सामाजिक आंकड़े एक बिल्कुल अलग सच्चाई बयां करते हैं। जमीनी हकीकत यह है कि लोग अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में उम्मीद से कहीं ज्यादा दयालुता और सहयोग का अनुभव कर रहे हैं। हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका में 2,000 से अधिक वयस्कों पर किए गए एक गैलप पोल में नागरिकों से उनके व्यक्तिगत अनुभवों के बारे में पूछा गया। इसमें केवल धारणाओं के बजाय इस बात पर ध्यान केंद्रित किया गया कि लोगों ने हाल के दिनों में कितनी बार दूसरों को दयालुता से काम करते देखा, खुद मदद प्राप्त की, या किसी अनजान व्यक्ति की मदद करने में सहज महसूस किया। इस अध्ययन के नतीजे दर्शाते हैं कि आम लोगों के बीच मानवीय सद्भावना आज भी पूरी तरह से जीवित और प्रभावी है। वैल्यूज-इन-एक्शन फाउंडेशन के अध्यक्ष और मुख्य कार्यकारी अधिकारी स्टुअर्ट मुशिन्स्की, जिन्होंने इस पोल को डिजाइन करने में मदद की है, का मानना है कि समाज में दयालुता चारों ओर मौजूद है, लेकिन लोगों की धारणा इसके विपरीत बन चुकी है। उनके अनुसार मीडिया में अक्सर एक कठोर और अप्रिय तस्वीर दिखाई जाती है, जबकि जमीनी स्तर पर नागरिक रोजाना एक-दूसरे के प्रति सम्मान और सहानुभूति का प्रदर्शन करते हैं। सहानुभूति और सहयोग से जुड़े उत्साहजनक आंकड़े इस अध्ययन में शामिल अधिकांश प्रतिभागियों ने स्वीकार किया कि वे अपने दैनिक जीवन में लगातार भलमनसाहत का व्यवहार देखते हैं। सर्वेक्षण के अनुसार 60 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे दूसरों को अक्सर या बहुत अक्सर सम्मानजनक और दयालु तरीके से काम करते देखते हैं। इसके अलावा 65 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने यह जानकारी दी कि पिछले सात दिनों के भीतर उन्हें अपने समुदाय में किसी न किसी व्यक्ति से मदद या दयालुता का व्यवहार मिला है। नागरिकों की आपसी सोच को लेकर भी सकारात्मक आंकड़े सामने आए हैं। पोल में 73 प्रतिशत लोगों ने माना कि वे अन्य अमेरिकियों को सामान्य रूप से बहुत दयालु या काफी हद तक दयालु मानते हैं। यह आंकड़ा उन तमाम चिंताओं को खारिज करता है जो समाज में बढ़ते बिखराव की ओर इशारा करती हैं। सबसे दिल को छू लेने वाला पहलू अनजान लोगों की मदद करने से जुड़ा है। सर्वे में शामिल 90 प्रतिशत वयस्कों ने कहा कि वे किसी अजनबी की ओर मदद का हाथ बढ़ाने में पूरी तरह या काफी हद तक सहज महसूस करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि जब लोग समाज में भलमनसाहत देखते हैं, तो वे स्वयं भी दूसरों की मदद करने के लिए प्रेरित होते हैं। यह एक स्वाभाविक मानवीय प्रतिक्रिया है जो एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक फैलती है। उम्र के हिसाब से सोच और व्यवहार में अंतर सकारात्मक नतीजों के बावजूद आंकड़ों में उम्र के आधार पर एक बड़ा अंतर देखा गया है। कम उम्र के युवा वयस्कों में दयालुता को देखने और उसका अनुभव करने की दर अपेक्षाकृत कम पाई गई, जिससे देश में सामाजिक व्यवहार को लेकर उनका नजरिया अधिक निराशाजनक है। अजनबियों की मदद करने के मामले में भी युवा अपने से बड़ों की तुलना में कम सहज दिखे। 18 से 29 वर्ष की आयु के केवल 35 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि वे किसी अनजान व्यक्ति की मदद की पहल करने में बहुत सहज महसूस करते हैं। इसके विपरीत, 30 से 49 वर्ष की आयु के 49 प्रतिशत लोगों और 65 वर्ष या उससे अधिक उम्र के 64 प्रतिशत बुजुर्गों ने अजनबियों की मदद करने में उच्च स्तर की सहजता व्यक्त की। मुशिन्स्की के अनुसार 18 से 29 वर्ष की आयु वर्ग के लोगों में दयालुता को महसूस करने और प्रदर्शित करने की दर में गिरावट आना काफी आश्चर्यजनक है। इसका एक बड़ा कारण युवाओं द्वारा सामना किया जा रहा मानसिक और सामाजिक तनाव हो सकता है। इस पीढ़ी ने 2008 की आर्थिक मंदी, तीव्र राजनीतिक ध्रुवीकरण, कोविड-19 महामारी, जलवायु परिवर्तन के बढ़ते खतरे और सोशल मीडिया के दौर को देखा है। इन परिस्थितियों ने युवाओं में अलगाव की भावना बढ़ाई है और उन्हें खुद को सुरक्षित रखने की सोच की ओर धकेला है। इसके अतिरिक्त, विकासात्मक और भावनात्मक कारणों से भी युवा पीढ़ी अपने वरिष्ठों की तुलना में कम खुश महसूस करती है। शोध बताते हैं कि उम्र बढ़ने के साथ लोग अपनी भावनाओं को बेहतर ढंग से संभालना सीख जाते हैं, जबकि युवा अधिक नकारात्मक भावनाओं का सामना करते हैं। प्यू रिसर्च के एक सर्वे में भी पाया गया कि लगभग एक-तिहाई युवा वयस्क अपने मानसिक स्वास्थ्य को लेकर नकारात्मक सोच रखते हैं, जिससे उनके पास दूसरों की मदद करने के लिए भावनात्मक ऊर्जा की कमी हो जाती है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक जमील जाकी के शोध का हवाला देते हुए विशेषज्ञों ने बताया कि छात्र अक्सर इस गलतफहमी के शिकार होते हैं कि उनके साथी कम सहानुभूति रखते हैं। जब सही जानकारी के जरिए इस भ्रम को दूर किया जाता है, तो युवा एक-दूसरे के साथ जुड़ने और मदद करने के लिए अधिक खुले मन से आगे आते हैं। विभिन्न अध्ययनों और सामाजिक स्थितियों का विश्लेषण उम्र और दयालुता के संबंधों को समझने के लिए वैश्विक स्तर पर कई अन्य अध्ययन भी किए गए हैं। द जेरोन्टोलॉजिस्ट में प्रकाशित एक व्यापक विश्लेषण के अनुसार, सामान्य तौर पर बुजुर्ग लोग युवाओं की तुलना में अधिक दयालु आचरण करते हैं। हालांकि, यह अंतर इस बात पर निर्भर करता है कि मदद किस प्रकार की जा रही है। बुजुर्ग धन या संसाधनों को साझा करने में अधिक उदार पाए गए, जबकि किसी को सांत्वना देने या सीधी सहायता करने के मामले में विभिन्न आयु समूहों के बीच अंतर बहुत कम था। हांगकांग पोलिटेक्निक यूनिवर्सिटी के न्यूरोसाइकोलॉजिस्ट डेविड शुम बताते हैं कि वित्तीय स्थिति का भी सामाजिक व्यवहार पर गहरा प्रभाव पड़ता है। जब बुजुर्गों के पास उच्च आय होती है, तो उनकी उदारता अधिक स्पष्ट दिखाई देती है। यदि युवाओं के पास संसाधन कम हैं, तो वे चाहकर भी धन से जुड़ी मदद करने में पीछे रह सकते हैं, हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि उनके मन में दूसरों के प्रति परवाह नहीं है। दूसरी ओर, जर्मनी में किए गए एक प्रयोग में बिल्कुल अलग नतीजे देखने को मिले, जहां युवाओं ने बुजुर्गों की तुलना में अधिक सामाजिक सहयोग दिखाया। यह इस बात को सिद्ध करता है कि सांस्कृतिक संदर्भ, समय और मापने के तरीके भी नतीजों को प्रभावित करते हैं। हालांकि, गैलप सर्वे में यह बात भी सामने आई कि कम आय और कम शिक्षा वाले लोग अजनबियों की मदद करने में अधिक संकोच करते हैं, लेकिन एक ही आय वर्ग के भीतर भी युवाओं में बुजुर्गों की तुलना में मदद करने की हिचकिचाहट अधिक थी। सहानुभूतिपूर्ण समाज के निर्माण की दिशा में कदम शोध के निष्कर्ष चाहे जो भी हों, सच्चाई यही है कि समाज के हर वर्ग को अधिक दयालु बनने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। दयालुता एक सार्वभौमिक मूल्य है जो व्यक्तिगत स्वास्थ्य और सामाजिक एकता दोनों के लिए अनिवार्य है। वैज्ञानिक अध्ययनों से यह बात साबित हो चुकी है कि दुनिया भर में जब भी कोई व्यक्ति मदद मांगता है, तो अधिकांश मामलों में उसकी याचिका स्वीकार की जाती है। यदि कोई मदद करने से मना करता है, तो वह आमतौर पर इसका कारण भी बताता है। दयालुता को बढ़ावा देने के लिए यह समझना जरूरी है कि लोग अक्सर अपनी छोटी-छोटी कोशिशों के महत्व को कम आंकते हैं। वे सोचते हैं कि उनके छोटे से काम से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, जबकि सामने वाले व्यक्ति के लिए उसका बड़ा मूल्य होता है। कई बार लोगों को अपनी झिझक तोड़कर कम्फर्ट ज़ोन से बाहर निकलना पड़ता है। रोजमर्रा की जिंदगी में दयालुता को पहचानने का दायरा बढ़ाना भी एक प्रभावी उपाय है। अक्सर लोग अस्पताल में देखभाल करने वाली नर्स की सेवा या किसी दुखी मित्र को ध्यान से सुनने की प्रक्रिया को केवल कर्तव्य मान लेते हैं, जबकि ये भी दयालुता के ही रूप हैं। इसी सोच को बदलने के लिए यूएस ऑफ काइंडनेस जैसी जन-जागरूकता पहल चलाई जा रही हैं ताकि लोग अपने आसपास होने वाली भलमनसाहत को देख सकें और खुद भी इस श्रृंखला का हिस्सा बन सकें। इसका आप पर असर व्यावहारिक जीवन पर प्रभाव: यह सर्वे दिखाता है कि रोजमर्रा की जिंदगी में दूसरों की छोटी-छोटी मदद करना मानसिक तनाव को कम करने और आपसी विश्वास को मजबूत करने का प्रभावी तरीका है। सवाल-जवाब 1. गैलप पोल के अनुसार कितने अमेरिकी नागरिक नियमित रूप से दयालुता का अनुभव करते हैं? सर्वेक्षण के अनुसार 60% लोग अक्सर दूसरों को दयालु व्यवहार करते देखते हैं और 65% लोगों को पिछले सात दिनों में किसी से मदद मिली है। 2. अजनबियों की मदद करने को लेकर लोगों की क्या राय है? 90% उत्तरदाताओं ने कहा कि वे किसी अनजान व्यक्ति की मदद की पहल करने में सहज महसूस करते हैं। 3. युवा वयस्कों और बुजुर्गों के व्यवहार में क्या अंतर पाया गया? 18 से 29 वर्ष के केवल 35% युवा अजनबियों की मदद में सहज दिखे, जबकि 65 वर्ष से अधिक उम्र के 64% बुजुर्गों ने इसमें सहजता जताई। 4. युवाओं में कम सहजता के क्या कारण बताए गए हैं? आर्थिक तनाव, राजनीतिक ध्रुवीकरण, कोविड-19 महामारी, सोशल मीडिया का प्रभाव और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां इसके प्रमुख कारण हैं। https://trendkia.com/lifestyle/america-men-rojamarra-ki-dayaluta-para-naya-samajika-sarve-ankare-pesha-kara-rahe-hain-hairana-karane-vali-tasvira-11164 TrendKia — Har trend, sabse pehle.