अंडे या मांस के कारोबार में सही नस्ल कैसे तय करे मुर्गी पालक, पशु चिकित्सा अधिकारी ने बताए नियम मुर्गी पालन में बेहतर मुनाफा कमाने के लिए बाजार की मांग, स्थानीय मौसम और सही नस्ल का चुनाव बेहद जरूरी है। उप मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. राकेश कुमार तिवारी ने अंडा और मांस उत्पादन के प्रमुख तौर-तरीके साझा किए हैं। ग्रामीण इलाकों और कस्बों में किसानों तथा युवाओं के बीच पोल्ट्री फार्मिंग आजीविका सुधारने का एक मजबूत विकल्प बन रही है। इस व्यवसाय में कदम रखने से पहले पालक को अपनी व्यावसायिक प्राथमिकता स्पष्ट करनी होती है कि मुख्य उद्देश्य अंडा बेचना है या फिर चिकन मीट की आपूर्ति करना। इसके साथ ही इलाके की जलवायु, पक्षियों के रख-रखाव के संसाधन और स्थानीय खरीददारों की जरूरत को समझकर ही सही नस्ल तय करनी चाहिए। अंडा उत्पादन के लिए नस्ल और प्रबंधन के तरीके अंडे के व्यावसायिक उत्पादन को ध्यान में रखकर मुर्गियों का चयन करते समय लेयर नस्लों को प्रमुखता दी जाती है, क्योंकि ये नियमित और अधिक संख्या में अंडे देने के लिए अनुकूलित होती हैं। उप मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी डॉ. राकेश कुमार तिवारी के अनुसार, कड़कनाथ और असील जैसी पारंपरिक देसी नस्लों की अपनी विशिष्ट खूबियां होती हैं, जबकि बड़े पैमाने पर व्यावसायिक अंडा बिक्री के लिए लेयर प्रजातियों की सहायता ली जाती है। उपयुक्त नस्ल चुनने के साथ-साथ यदि प्रबंधन व्यवस्थित रहे तो सालभर लगातार उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है। इसके लिए मुर्गियों के दैनिक आहार, बाड़े की स्वच्छता, रोशनी की समुचित व्यवस्था, शुद्ध पेयजल और हवादार आवास पर विशेष निगरानी रखना अनिवार्य होता है। देसी प्रजातियों की बाजार में मांग और अंडे की क्षमता कड़कनाथ और असील जैसी देसी मुर्गियों का बाज़ार में अपना एक अलग उपभोक्ता वर्ग है। कई क्षेत्रों में इन देसी पक्षियों की मांग आम मुर्गियों से भिन्न बाजारों में देखने को मिलती है। इनसे मिलने वाला वित्तीय लाभ चुनी गई नस्ल, पालन की विधि और निकटवर्ती मंडियों में चल रहे भाव पर निर्भर करता है। गोंडा के अनुकूल वातावरण में ये मुर्गियां प्रतिवर्ष करीब 300 से 320 अंडे तक दे सकती हैं, जिससे पालक संतोषजनक आय अर्जित कर सकते हैं। नुकसान से बचने के लिए किसानों को चूजे या मुर्गियां खरीदने से पहले अपने नजदीकी बाजारों में अंडों और मुर्गों की वर्तमान मांग तथा प्रचलित दरों का सर्वेक्षण अवश्य कर लेना चाहिए। मांस उत्पादन के लिए ब्रॉयलर का विकल्प यदि किसान का प्राथमिक लक्ष्य केवल मांस उत्पादन करना है, तो ब्रॉयलर मुर्गियों का पालन सबसे उपयोगी माना जाता है। कॉर्निश क्रॉस जैसी ब्रॉयलर प्रजातियों को विशेष रूप से तेजी से शारीरिक वजन बढ़ाने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। कम दिनों के भीतर बाजार में बिकने योग्य वजन हासिल कर लेने की वजह से व्यावसायिक मीट व्यापार में इनका उपयोग बहुत व्यापक पैमाने पर किया जाता है। मौसम के अनुसार शेड प्रबंधन और देखभाल गोंडा के मौसम के उतार-चढ़ाव को देखते हुए शेड के भीतर का तापमान नियंत्रित रखना बेहद जरूरी होता है। गर्मियों में जब तापमान बढ़ता है, तब मुर्गियों को लू और अत्यधिक गर्मी से बचाना आवश्यक हो जाता है। शेड के अंदर ताजी हवा के आवागमन की व्यवस्था, ठंडा व स्वच्छ पानी और पक्षियों के लिए पर्याप्त खुली जगह सुनिश्चित की जानी चाहिए। इसी प्रकार बारिश के दिनों में सीलन और सर्दियों में सर्द हवाओं के सीधे प्रकोप से मुर्गियों को सुरक्षित रखना आवश्यक है। डॉ. राकेश कुमार तिवारी का कहना है कि सही नस्ल के चयन के अतिरिक्त पौष्टिक चारा, बाड़े की सफाई, समय पर टीकाकरण और मौसम अनुकूल देखभाल ही पोल्ट्री फार्मिंग को एक सफल और टिकाऊ व्यवसाय बनाती है। इसका आप पर असर यह जानकारी नया पोल्ट्री फार्म शुरू करने वाले किसानों और युवाओं को सही व्यावसायिक दिशा तय करने में मदद करती है। • भारत में: किसान अपनी पूंजी और नजदीकी बाजार की मांग देखकर अंडा या मांस उत्पादन के लिए सही नस्ल का चयन कर सकते हैं। इससे शुरुआती नुकसान से बचा जा सकता है और नियमित आमदनी सुनिश्चित होती है। • गोंडा में: स्थानीय मौसम के अनुकूल देसी मुर्गियां साल भर में 300 से 320 अंडे दे सकती हैं। शेड में पर्याप्त वेंटिलेशन और टीकाकरण पर ध्यान देकर स्थानीय पालक अपनी लागत घटा सकते हैं। • लागत और आमदनी: कॉर्निश क्रॉस जैसी ब्रॉयलर नस्लें कम समय में तैयार होकर मीट बाजार में तेजी से नकदी देती हैं। वहीं देसी नस्लों को अलग बाजार में प्रीमियम भाव मिल सकता है। • जोखिम प्रबंधन: मौसम के अनुसार शेड में नमी, गर्मी और ठंड से बचाव करने पर चूजों की मृत्यु दर काफी कम हो जाती है। समय पर दवा और संतुलित दाना देने से उत्पादन में निरंतरता बनी रहती है। ऐसा क्यों हुआ पोल्ट्री फार्मिंग में घाटे का एक मुख्य कारण बिना योजना और अधूरी जानकारी के किसी भी नस्ल का चुनाव कर लेना होता है। पशु चिकित्सा विशेषज्ञों द्वारा यह सलाह इसलिए दी गई है ताकि किसान बाजार की मांग और स्थानीय जलवायु के अनुसार सही निर्णय ले सकें। • नस्ल और उद्देश्य का तालमेल: अंडा उत्पादन और मांस उत्पादन के लिए मुर्गियों की शारीरिक बनावट और पोषण की आवश्यकताएं पूरी तरह अलग होती हैं। लेयर मुर्गियां अंडे देने के लिए अनुकूल होती हैं जबकि ब्रॉयलर तेजी से वजन बढ़ाने के लिए तैयार की जाती हैं। • गोंडा का मौसमी प्रभाव: अत्यधिक गर्मी, बारिश की नमी और सर्दियों की ठंड का सीधा असर पक्षियों के स्वास्थ्य और उत्पादन क्षमता पर पड़ता है। स्थानीय वातावरण को ध्यान में रखकर शेड का निर्माण न करने पर बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। • बाजार में मूल्य भिन्नता: कड़कनाथ और असील जैसी देसी नस्लों की मांग और दाम सामान्य ब्रॉयलर मुर्गियों से अलग होते हैं। बाजार का आकलन किए बिना उत्पादन शुरू करने पर किसानों को सही दाम मिलने में कठिनाई आती है। सवाल-जवाब 1. अंडा उत्पादन के लिए कौन-सी मुर्गियां पालनी चाहिए? व्यावसायिक स्तर पर अधिक उत्पादन के लिए लेयर नस्लें उपयुक्त होती हैं, जबकि कड़कनाथ और असील जैसी देसी प्रजातियां भी पाली जा सकती हैं। 2. गोंडा के वातावरण में देसी मुर्गियां सालभर में कितने अंडे देती हैं? उचित देखरेख और सही प्रबंधन मिलने पर ये मुर्गियां प्रतिवर्ष लगभग 300 से 320 अंडे तक दे सकती हैं। 3. मांस उत्पादन के लिए कौन-सी नस्ल सबसे तेजी से वजन बढ़ाती है? मांस के लिए कॉर्निश क्रॉस जैसी ब्रॉयलर प्रजातियां सबसे उपयुक्त हैं, जो बहुत कम समय में बाजार के वजन तक पहुंच जाती हैं। 4. गर्मियों में मुर्गियों के शेड में किन बातों का ध्यान रखना चाहिए? शेड में ताजी हवा के लिए उचित वेंटिलेशन, पर्याप्त खुली जगह और पीने के लिए लगातार साफ व ठंडा पानी उपलब्ध होना जरूरी है। https://trendkia.com/lifestyle/ande-ya-mansa-ke-karobara-men-sahi-nasla-kaise-taya-kare-murgi-palaka-pashu-chikitsa-adhikari-ne-batae-niyama-41421 TrendKia — Har trend, sabse pehle.