# बघेलखंड की पारंपरिक मक्के की रोटी: चकला-बेलन की जरूरत नहीं, हथेलियों से ही तैयार होती है ये खास डिश

> बघेलखंड की खास मक्के की रोटी न केवल अपने स्वाद के लिए जानी जाती है, बल्कि इसे बनाने की अनोखी कला इसे और भी विशेष बनाती है। यहां चकला-बेलन का इस्तेमाल नहीं, बल्कि हथेलियों से इसे आकार दिया जाता है।

**Type:** article · **Category:** जीवनशैली · **Published:** 2026-07-09 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/lifestyle/baghelkhand-ki-parnparika-makke-ki-roti-chakala-belana-ki-jarurata-nahin-hatheliyon-se-hi-taiyara-hoti-hai-ye-khasa-disha-6047 · **Language:** Hindi
**Tags:** बघेलखंड, मक्के की रोटी, पारंपरिक भोजन, सतना, देसी स्वाद, भारतीय व्यंजन

सतना के बघेलखंड अंचल में मक्के की रोटी का अपना एक विशेष स्थान है। यह केवल एक खाद्य पदार्थ नहीं है, बल्कि यहां की वर्षों पुरानी ग्रामीण संस्कृति और परंपरा की एक जीती-जागती मिसाल है। यदि आप बघेलखंड के असली और देसी स्वाद से रूबरू होना चाहते हैं, तो मक्के की इस पारंपरिक रोटी को चखना अनिवार्य है। इसे परोसने का अंदाज भी बेहद खास होता है। देसी घी या फिर ताजा सफेद मक्खन से सराबोर यह रोटी जब भंटा के भुरते, टमाटर की तीखी चटनी, ताजी सरसों या चने की भाजी और गुड़ के साथ थाली में आती है, तो इसका स्वाद किसी को भी मंत्रमुग्ध कर सकता है। यही कारण है कि ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी यह व्यंजन मेहमानों के स्वागत और पारिवारिक आयोजनों का मुख्य हिस्सा है।

## तैयारी की अनोखी विधि
सतना की रहने वाली मीना द्विवेदी बताती हैं कि बघेलखंडी मक्के की रोटी का असली रहस्य इसके बनाने की प्रक्रिया में छिपा है। इसे बनाने के लिए शुद्ध मक्के के आटे में बहुत थोड़ी मात्रा में गेहूं का आटा मिलाया जाता है, ताकि रोटी में सही बाइंडिंग रहे और वह आसानी से बन सके। आटा गूंथने के बाद इसे रखने के बजाय हर रोटी के लिए अलग लोई बनाई जाती है। इस लोई को हथेली के पिछले हिस्से, जिसे गदेली कहा जाता है, से लगभग दो से तीन मिनट तक अच्छी तरह मसला जाता है। यही मेहनत रोटी को भीतर से मुलायम और स्वादिष्ट बनाती है।

## हाथों से आकार देने की कला
जब लोई पूरी तरह से तैयार हो जाती है, तब इसे आकार देने की प्रक्रिया शुरू होती है। हथेलियों पर थोड़ा पानी लगाकर उसे धीरे-धीरे थपथपाते हुए गोल और हल्का मोटा रूप दिया जाता है। स्थानीय स्तर पर इस पूरी विधि को रोटी पोइना के नाम से जाना जाता है। इस काम के लिए किसी चकला या बेलन की जरूरत नहीं पड़ती। कुशल महिलाएं बिना किसी बाहरी सहायता के एक समान गोल और सुंदर रोटी तैयार कर लेती हैं, जो किसी कलाकारी से कम नहीं लगती।

## धीमी आंच पर पकने का स्वाद
रोटी को सेंकने के लिए सबसे पहले इसे गर्म लोहे के तवे पर रखा जाता है ताकि यह एक तरफ से हल्की पक जाए। इसके बाद इसे सीधे आग की धीमी आंच पर पकाया जाता है। चिमटे की सहायता से इसे बार-बार पलटा जाता है और तब तक सेंका जाता है जब तक कि रोटी पर सुनहरे और लाल रंग के चित्तीदार निशान न उभर आएं। धीमी आंच पर पकाने के कारण यह रोटी बाहर से कुरकुरी और अंदर से नरम बनी रहती है। पकने के तुरंत बाद इस पर शुद्ध देसी घी या मक्खन लगाया जाता है, जिससे इसकी महक और जायका कई गुना बढ़ जाता है।

## पारंपरिक थाली का संगम
बघेलखंड में मक्के की रोटी की सबसे बेहतरीन जोड़ी भंटा यानी बैंगन के भुरते के साथ मानी जाती है। लकड़ी या उपलों की आंच पर भुने हुए बैंगन से बना भुरता और उसमें मिले देसी मसाले इस रोटी का स्वाद दोगुना कर देते हैं। साथ में भुने टमाटर की चटनी, चने की भाजी, राई की भाजी और थोड़ा गुड़ मिलकर एक संपूर्ण और समृद्ध थाली तैयार करते हैं।

## नई पीढ़ी और बदलता चलन
आजकल फास्टफूड के दौर में भी बघेलखंड की यह पारंपरिक रोटी अपनी चमक बरकरार रखे हुए है। शहरी लोग भी अब वापस अपनी सांस्कृतिक जड़ों की ओर लौट रहे हैं और इस देसी स्वाद को बड़े चाव से अपना रहे हैं। यह व्यंजन न केवल हमारे खानपान को समृद्ध करता है, बल्कि बघेलखंड की सांस्कृतिक विरासत को भी आने वाली पीढ़ी के लिए जीवित रखे हुए है। यदि आप कभी बघेलखंड आएं, तो मक्के की इस रोटी और भंटा के भुरते का स्वाद लेना न भूलें, क्योंकि यह अनुभव आपके साधारण भोजन के स्वाद को पूरी तरह बदल सकता है।

## इसका आप पर असर
**भारत में:** यह कहानी ग्रामीण क्षेत्रों में लुप्त हो रही पारंपरिक खाना पकाने की विधियों को पुनर्जीवित करने के महत्व को दर्शाती है।

**सतना में:** स्थानीय लोगों के लिए, यह व्यंजन सांस्कृतिक गौरव का प्रतीक है और यह स्थानीय कृषि उत्पादों जैसे मक्का और मौसमी साग के सेवन को बढ़ावा देता है।

## सवाल-जवाब

### 1. बघेलखंड में मक्के की रोटी बनाने के लिए आटे में क्या मिलाया जाता है?
मक्के की रोटी बनाने के लिए शुद्ध मक्के के आटे में थोड़ा सा गेहूं का आटा मिलाया जाता है ताकि रोटी आसानी से बन सके और टूटे नहीं।

### 2. रोटी बनाने के लिए चकला-बेलन का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जाता?
इस इलाके की परंपरा के अनुसार रोटी को हाथों की हथेलियों से थपथपाकर आकार दिया जाता है, जिसे 'रोटी पोइना' कहा जाता है।

### 3. इस रोटी को सबसे स्वादिष्ट किसके साथ माना जाता है?
इस पारंपरिक रोटी को भंटा यानी बैंगन के भुरते के साथ खाना सबसे बेहतरीन माना जाता है।

### 4. रोटी को आग पर सेंकने से क्या फायदा होता है?
धीमी आंच पर सेंकने से रोटी बाहर से कुरकुरी और अंदर से पूरी तरह मुलायम बनी रहती है।

## प्रेरणा और सबक
- **धैर्य और मेहनत:** रोटी बनाने के लिए आटे को हथेलियों से लगातार मसलना यह सिखाता है कि किसी भी चीज को पूर्ण बनाने में समय और शारीरिक मेहनत लगती है।
- **परंपरा का सम्मान:** बिना किसी आधुनिक उपकरण के अपने पारंपरिक हुनर को जीवित रखना, अपनी जड़ों और विरासत से जुड़े रहने की प्रेरणा देता है।
- **प्राकृतिक उत्पादों का महत्व:** ताजा और स्थानीय सामग्री का उपयोग करना न केवल स्वास्थ्य के लिए अच्छा है, बल्कि स्वाद को भी अतुलनीय बनाता है।

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