# बाड़मेर के खेताराम सुम्बरा की पट्टू कला में जीवंत हो रही थार की लुप्त होती वन्यजीव विरासत

> बाड़मेर जिले के धनाऊ निवासी खेताराम सुम्बरा पारंपरिक पट्टू कला के जरिए गोडावण और काले हिरण जैसे विलुप्त होते वन्यजीवों को धागों में उकेर रहे हैं। उनकी यह अनूठी कला अब देश के कई बड़े राज्यों की प्रदर्शनियों में अपनी पहचान बना रही है।

**Type:** article · **Category:** जीवनशैली · **Published:** 2026-09-26 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/lifestyle/barmer-ke-khetaram-sumbra-ki-pattu-kala-me-jeevant-ho-rahi-thar-ki-lupt-hoti-vanyajiv-virasat-39061 · **Language:** Hindi
**Tags:** बाड़मेर, पट्टू कला, थार वन्यजीव, खेताराम सुम्बरा, हस्तशिल्प, गोडावण

रेत के धोरों और रेगिस्तानी जीवन के लिए मशहूर बाड़मेर जिले के धनाऊ गांव के रहने वाले खेताराम सुम्बरा एक अनूठे हुनर के जरिए थार की प्राकृतिक पहचान को जिंदा रखे हुए हैं। आमतौर पर जंगलों या सफारी में दिखने वाले वन्यजीवों को उन्होंने अपने पट्टू के धागों पर उतारना शुरू किया है। उनके हाथों से बुने जाने वाले इन खास पट्टुओं पर थार के प्रसिद्ध वन्यजीव बेहद खूबसूरती से नजर आते हैं। कभी इन डिजाइनों में गोडावण की सुंदर आकृति दिखाई देती है तो कभी रेगिस्तान में दौड़ता हुआ काला हिरण सबका ध्यान खींच लेता है। इसके अलावा कुरजां पक्षी की उड़ान भी इन पारंपरिक डिजाइनों का अहम हिस्सा बन चुकी है।

## पारंपरिक पट्टू कला में वन्यजीवों का अनूठा संगम
थार की असली पहचान सिर्फ यहां के रेतीले मैदानों से नहीं है, बल्कि यहां की समृद्ध और अनूठी जैव विविधता से भी जुड़ी हुई है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए खेताराम सुम्बरा पारंपरिक पट्टू निर्माण कला को आधुनिक उपयोग से जोड़ रहे हैं। वे केवल पारंपरिक परिधानों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि इन कलाकृतियों के जरिए उन वन्यजीवों को अमर कर रहे हैं जिनकी संख्या लगातार घटती जा रही है। उनके द्वारा तैयार किए जाने वाले पट्टू उत्पादों में केवल शॉल और स्टॉल ही शामिल नहीं हैं, बल्कि वे कुशन कवर, वॉल हैंगिंग और घर की सजावट के पर्दे जैसी कई उपयोगी चीजें भी बना रहे हैं। उनकी इस मेहनत का परिणाम यह है कि धनाऊ जैसे छोटे से इलाके से शुरू हुआ यह सफर अब देश के बड़े महानगरों तक पहुंच चुका है। उनके बनाए ये उत्पाद दिल्ली, मुंबई, पुणे, हैदराबाद और महाराष्ट्र के विभिन्न हिस्सों में आयोजित होने वाली राष्ट्रीय प्रदर्शनियों में खासे पसंद किए जा रहे हैं।

## कला के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का संदेश
इस अनूठी पहल के पीछे केवल व्यावसायिक उद्देश्य नहीं है, बल्कि विलुप्त होती प्रजातियों के प्रति लोगों को जागरूक करना भी मुख्य मकसद है। खेताराम बताते हैं कि गोडावण, काला हिरण और कुरजां जैसे जीव थार के पर्यावरण और प्राकृतिक इतिहास का अभिन्न अंग रहे हैं। इन जीवों को पट्टू के ताने-बाने में पिरोने का उद्देश्य सिर्फ सुंदरता बढ़ाना नहीं है, बल्कि समाज तक एक गंभीर संदेश पहुंचाना भी है। जब कोई व्यक्ति इन उत्पादों को अपने घर में सजाता है या ओढ़ता है, तो उसके साथ थार का पूरा परिवेश और वन्यजीवों की कहानी भी दूर-दूर तक पहुंचती है। आधुनिक दौर में जब कई प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं, तब यह कला उन्हें जीवित रखने का एक सशक्त माध्यम बन रही है।

## दस वर्षों की लंबी साधना और पुश्तैनी हुनर
यह कला खेताराम को विरासत में मिली है, जिसे वे अपने पिता और दादा से सीखकर आगे बढ़ा रहे हैं। वे पिछले 10 सालों से लगातार इस रचनात्मक कार्य में जुटे हुए हैं। अपनी औपचारिक शिक्षा के बारे में वे बताते हैं कि वे महज आठवीं पास हैं, लेकिन उनके हुनर और लगन ने उन्हें किसी बड़े मुकाम से कम पहचान नहीं दिलाई है। हालांकि यह काम पूरी तरह से पारंपरिक तरीकों से किया जाता है, लेकिन समय के साथ बाजार की मांग और ग्राहकों की पसंद को ध्यान में रखते हुए इसमें कई तरह के नए बदलाव भी किए गए हैं। पुश्तैनी कला में आधुनिक समय के अनुसार किए गए इन नवाचारों ने ही इसे देश के कोने-कोने तक पहुंचाने में मदद की है।

## इसका आप पर असर
यह अनोखी पहल पारंपरिक भारतीय हस्तशिल्प को बढ़ावा देने के साथ-साथ विलुप्त हो रहे वन्यजीवों के संरक्षण के प्रति लोगों में जागरूकता पैदा करती है।

- **भारत में:** देश भर के कला प्रेमी और खरीदार पारंपरिक थार संस्कृति से जुड़े इन हस्तशिल्प उत्पादों को सीधे खरीद सकते हैं। यह कारीगरों को राष्ट्रीय बाजारों तक अपनी पहुंच बनाने में मदद करता है।
- **बाड़मेर में:** स्थानीय बुनकरों और पारंपरिक कलाकारों को अपने पुश्तैनी हुनर से आर्थिक लाभ कमाने का नया जरिया मिलता है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के नए अवसर पैदा होते हैं।

## ऐसा क्यों हुआ
पारंपरिक पट्टू कला में वन्यजीवों के चित्रण का मुख्य कारण थार की समृद्ध जैव विविधता को सहेजना और विलुप्त होती प्रजातियों के प्रति जागरूकता फैलाना है। यह कला पुश्तैनी ज्ञान और आधुनिक बाजार की मांग के मेल से आगे बढ़ रही है।

- **पारंपरिक विरासत:** यह हुनर खेताराम को अपने पिता और दादा से विरासत में मिला है, जिसे वे पिछले 10 वर्षों से लगातार आगे बढ़ा रहे हैं।
- **लुप्त होती प्रजातियां:** गोडावण और काले हिरण जैसे स्थानीय जीव रेगिस्तानी पारिस्थितिकी तंत्र का अहम हिस्सा हैं, जिनका संरक्षण जरूरी है।
- **सांस्कृतिक संदेश:** कला के माध्यम से इन जीवों की कहानियों को देश के विभिन्न हिस्सों तक पहुँचाना इस अनूठी पहल का मुख्य आधार है।

## सवाल-जवाब

### 1. खेताराम सुम्बरा पट्टू पर किन वन्यजीवों की आकृतियां उकेरते हैं?
वे अपने पट्टू डिजाइनों पर गोडावण, काला हिरण और कुरजां जैसे थार के वन्यजीवों को उकेरते हैं।

### 2. वे पारंपरिक पट्टू से कौन-कौन सी चीजें तैयार कर रहे हैं?
वे शॉल, स्टॉल के अलावा कुशन कवर, वॉल हैंगिंग और पर्दे जैसी घरेलू सजावट की वस्तुएं तैयार कर रहे हैं।

### 3. खेताराम सुम्बरा का संबंध किस जगह से है?
वे सीमावर्ती बाड़मेर जिले के धनाऊ गांव के रहने वाले हैं।

### 4. वे कितने समय से इस कला से जुड़े हुए हैं?
वे पिछले 10 सालों से पारंपरिक पट्टू कला और वन्यजीव डिजाइनों पर काम कर रहे हैं।

### 5. उनकी कलाकृतियां देश के किन-किन शहरों की प्रदर्शनियों तक पहुंची हैं?
उनकी कलाकृतियां दिल्ली, मुंबई, पुणे, हैदराबाद और महाराष्ट्र समेत देश के विभिन्न राज्यों की प्रदर्शनियों तक पहुंची हैं।

## प्रेरणा और सबक
खेताराम सुम्बरा की यह अनूठी यात्रा पारंपरिक कौशल और दृढ़ संकल्प के जरिए सफलता हासिल करने की एक प्रेरणादायक मिसाल पेश करती है।

- **पारंपरिक विरासत का सम्मान:** पुश्तैनी हुनर को सहेजकर उसे आधुनिक समय की जरूरतों के अनुसार ढालना सफलता की कुंजी है।
- **सीमित संसाधनों में बड़ी उपलब्धि:** केवल आठवीं तक की पढ़ाई के बावजूद अपनी मेहनत के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई जा सकती है।
- **सामाजिक संदेश के साथ काम:** व्यवसाय के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण और कला के प्रचार जैसे नेक उद्देश्यों को जोड़ना समाज में बदलाव लाता है।

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