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  "type": "article",
  "title": "चक्रवाती तूफान अर्णव ने बिगाड़ा जमुई के कुम्हारों का गणित, इस बार दीपावली पर मिट्टी के दीयों की भारी कमी की आशंका",
  "summary": "चक्रवाती तूफान अर्णव के चलते हुई बेमौसम बारिश ने जमुई के कुम्हारों की आजीविका पर बड़ा असर डाला है। पिछले वर्ष 40 हजार दीये बनाने वाले कारीगर परिवार के लिए इस बार आधे दीये तैयार करना भी चुनौती बन गया है।",
  "content": "दीपावली के पावन पर्व की उल्टी गिनती शुरू होते ही बिहार के जमुई जिले में पारंपरिक मिट्टी के बर्तन और दीये गढ़ने वाले परिवारों की दिनचर्या पूरी तरह बदल गई है। आम तौर पर इस मौसम में मिट्टी सानने, चाक घुमाने और दीयों को धूप में पकाने का सिलसिला तेज गति से चलता है, मगर इस बार चक्रवाती तूफान अर्णव के चलते बदले मौसम ने कुम्हारों के पूरे काम पर पानी फेर दिया है। बेमौसम बारिश, आसमान में छाए घने बादलों और अत्यधिक नमी के कारण मिट्टी के बर्तनों व दीयों के सूखने की प्रक्रिया गंभीर रूप से बाधित हुई है। इसी वजह से कारीगरों को अंदेशा है कि इस साल बाजार में मिट्टी के दीयों की आपूर्ति पिछले साल के मुकाबले बेहद कम रह सकती है। हालांकि मौसम खुलते ही कारीगर परिवार दिन-रात एक करके नुकसान की भरपाई करने में जुट गए हैं।\n\nजमुई के शिवनडीह मोहल्ले में पीढ़ियों पुरानी परंपरा पर मौसम की मार\nजमुई शहर के शिवनडीह मोहल्ले में रहने वाले 60 वर्षीय मोहन पंडित इन दिनों अपने घर के आंगन में चाक पर तेजी से मिट्टी को आकार देने में लगे हैं। मोहन पंडित पिछले 48 वर्षों से लगातार मिट्टी के दीये, खिलौने और बर्तन बनाने की कला से जुड़े हुए हैं। उन्होंने यह पैतृक हुनर महज 12 साल की उम्र में अपने बड़ों से सीखा था और तब से लेकर आज तक वे निरंतर इस पेशे को आगे बढ़ा रहे हैं। उनके परिवार में कई पीढ़ियों से मिट्टी के बर्तन और पारंपरिक दीये तैयार करने का काम चलता आ रहा है। मोहन पंडित के अनुसार उनके पूरे अनुभव में ऐसे मौके बहुत कम आए हैं जब मौसम ने इस कदर काम बिगाड़ा हो। इस बार तूफान और लगातार हुई बारिश की मार ऐसी पड़ी है कि उनके पूरे कुनबे के लिए पिछले वर्ष के मुकाबले आधे दीये भी तैयार कर पाना बेहद कठिन साबित हो रहा है।\n\n40 हजार के मुकाबले आधे दीये भी बनाना हुआ मुश्किल\nआंकड़ों के नजरिए से देखें तो पिछले साल दीपावली के अवसर पर अकेले मोहन पंडित के परिवार ने करीब 40 हजार मिट्टी के दीये बनाकर बाजार में उतारे थे। इस बार की जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट नजर आ रही है। चक्रवाती तूफान अर्णव के कारण कई दिनों तक काम ठप रहने और कच्ची मिट्टी के सूख न पाने के चलते उत्पादन आधा भी पहुंचना मुश्किल लग रहा है। मोहन पंडित का कहना है कि अगर मौसम आगे पूरी तरह साफ भी रहता है, तब भी वे पिछले साल के आंकड़े के 50 प्रतिशत तक ही पहुंच पाएंगे। समय कम बचा है और बाजार की मांग सिर पर है, इसलिए नुकसान को कम से कम रखने के लिए परिवार के हर सदस्य को काम में झोंक दिया गया है।\n\nदीयों की मांग पूरी करने के लिए बेटों ने छोड़ा राजमिस्त्री का काम\nसंकट की इस घड़ी में परिवार के अस्तित्व और त्योहार की मांग को पूरा करने के लिए घर के सभी लोगों ने अपनी प्राथमिक जिम्मेदारियां किनारे रख दी हैं। मोहन पंडित के तीन बेटे हैं, जिनमें से दो बेटे आमतौर पर शहर में राजमिस्त्री का काम करके अपनी दिहाड़ी कमाते हैं। दीपावली के नजदीक आने, दीयों की ऊंची मांग और बचे हुए बेहद कम समय को देखते हुए दोनों बेटों ने फिलहाल राजमिस्त्री का काम छोड़ दिया है। वे दोनों अपने पिता के साथ चाक पर बैठकर मिट्टी गूंथने, सांचे में ढालने और दीये तैयार करने में हाथ बंटा रहे हैं। इसके साथ ही परिवार की महिलाएं और अन्य सदस्य भी दिन-रात मिट्टी के पारंपरिक खिलौने और दीयों की फिनिशिंग में जुटे हुए हैं ताकि समय रहते उत्पाद बाजार तक पहुंच सकें।\n\nधूप पर निर्भर दीयों का निर्माण और आर्थिक नुकसान का डर\nकुम्हारों के पूरे साल की आर्थिक रीढ़ दीपावली का त्योहार ही होता है। इसी एक पखवाड़े में साल भर की सबसे अधिक बिक्री और कमाई दर्ज की जाती है, क्योंकि मिट्टी के दीयों और पारंपरिक खिलौनों की मांग चरम पर पहुंचती है। मिट्टी का काम पूरी तरह से प्रकृति और अनुकूल मौसम पर निर्भर करता है। चाक से उतरने के बाद दीयों को पहले खुली हवा और कड़ी धूप में अच्छी तरह सुखाना पड़ता है, जिसके बाद ही उन्हें भट्ठी में पकाया जा सकता है। चक्रवाती तूफान के असर से हुई बारिश और नमी ने इस पूरी प्रक्रिया को लंबा खींच दिया। अब जब मौसम में थोड़ा सुधार हुआ है, तो शिवनडीह का यह कुम्हार परिवार अपनी पूरी ताकत झोंक रहा है, लेकिन लागत बढ़ने और उत्पादन आधा रह जाने से उन्हें भारी आर्थिक नुकसान सता रहा है।\n\nइसका आप पर असर\nजमुई में मिट्टी के दीयों के उत्पादन में 50 प्रतिशत से अधिक की गिरावट का सीधा असर स्थानीय बाजारों और आम उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।\n\n• भारत में: जलवायु परिवर्तन और चक्रवाती तूफानों की वजह से हस्तशिल्प और पारंपरिक कारीगरों की मौसमी आय पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। त्योहारों के दौरान ग्रामीण कारीगरों से सीधे सामान खरीदने पर ही इन पारंपरिक शिल्पों का संरक्षण संभव हो सकेगा।\n• जमुई में: स्थानीय बाजारों में इस बार मिट्टी के पारंपरिक दीयों की किल्लत देखने को मिल सकती है। आपूर्ति घटने और मांग अधिक रहने के चलते इस साल दीपावली पर दीयों की खुदरा कीमतों में बढ़ोतरी होने की संभावना है।\n• कारीगर परिवारों पर: उत्पादन आधा रह जाने से कुम्हारों की साल भर की सबसे बड़ी मौसमी कमाई पर सीधा आघात लगा है। अन्य काम छोड़कर चाक पर जुटे परिजनों को त्योहार के बाद गंभीर आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ सकता है।\n• उपभोक्ताओं के लिए: स्थानीय स्तर पर मिट्टी के दीये कम मिलने से लोगों को कृत्रिम या इलेक्ट्रॉनिक लाइटों पर अधिक निर्भर रहना पड़ सकता है। मिट्टी के दीयों के खरीदारों को समय रहते बाजार से खरीदारी पूरी करनी होगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nचक्रवाती तूफान अर्णव के प्रभाव से बिहार के जमुई जिले में बेमौसम बारिश और लंबे समय तक धूप न निकलने के कारण मिट्टी के दीयों के निर्माण चक्र में भारी रुकावट आई।\n\n• सीधा कारण: चक्रवाती तूफान अर्णव के कारण क्षेत्र में अचानक मौसम बिगड़ गया और लगातार नमी व बारिश बनी रही। गीले मौसम की वजह से चाक पर गढ़े गए कच्चे दीयों को पकाने से पहले सुखाने की प्रक्रिया पूरी तरह ठप हो गई।\n• प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियां: मिट्टी के बर्तन और दीये बनाने के लिए लगातार तेज धूप और सूखी हवा की सख्त जरूरत होती है। आकाश में छाए बादलों और भीगी मिट्टी के कारण दीयों को भट्ठी में पकाने लायक स्थिति तैयार नहीं हो पाई।\n• त्योहार से ठीक पहले का समय: दीपावली से ठीक पहले के दो हफ्ते कुम्हारों के लिए पीक प्रोडक्शन का समय होते हैं, जब साल की सबसे बड़ी खेप तैयार की जाती है। इसी महत्वपूर्ण समय पर तूफान आने के कारण उत्पादन का कीमती वक्त हाथ से निकल गया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. जमुई में कुम्हारों का काम क्यों प्रभावित हुआ है?\nचक्रवाती तूफान अर्णव के प्रभाव से हुए खराब मौसम और बारिश के कारण मिट्टी के दीयों को सुखाने और तैयार करने में गंभीर परेशानी आई है।\n\n2. इस साल दीयों के उत्पादन में कितनी गिरावट की आशंका है?\nकारीगरों के अनुसार इस बार उत्पादन पिछले साल की तुलना में आधे से भी कम रह जाने की आशंका है।\n\n3. मोहन पंडित ने पिछले साल दीपावली पर कितने दीये बनाए थे?\nमोहन पंडित के परिवार ने पिछले साल दीपावली के अवसर पर करीब 40 हजार मिट्टी के दीये तैयार किए थे।\n\n4. मोहन पंडित कब से मिट्टी के बर्तन और दीये बना रहे हैं?\nमोहन पंडित पिछले 48 वर्षों से यह काम कर रहे हैं, जिसकी शुरुआत उन्होंने 12 साल की उम्र में की थी।\n\n5. मोहन पंडित के बेटों ने अपना नियमित काम क्यों छोड़ दिया?\nदीपावली नजदीक होने और दीयों की मांग पूरी करने के लिए उनके दो बेटों ने राजमिस्त्री का काम छोड़कर पिता का हाथ बंटाया है।",
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  "publishedAt": "2026-11-02",
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