छतरपुर के आंगन से निकलकर चर्चा में आई शकरकंद की दरभजिया, जानिए इसे पकाने का पारंपरिक तरीका छतरपुर में सर्दियों के दौरान शकरकंद के पत्तों से तैयार की जाने वाली पौष्टिक दरभजिया काफी पसंद की जाती है। आयरन से भरपूर इस भाजी को दाल और लहसुन के तड़के के साथ गीला पकाया जाता है। बुंदेलखंड के छतरपुर जिले में सर्दियों की आहट के साथ ही पारंपरिक साग-भाजियों की खुशबू रसोईयों में महकने लगती है। सामान्य तौर पर लोग शकरकंद के कंद को भूनकर या उबालकर खाना पसंद करते हैं, लेकिन इसी पौधे की हरी पत्तियों से बनने वाला साग भी स्वाद और पोषण का एक अनोखा मेल प्रस्तुत करता है। छतरपुर के ग्रामीण अंचलों और कस्बों में दाल के साथ मिलाकर तैयार की जाने वाली इस खास डिश को स्थानीय बोलचाल में दरभजिया पुकारा जाता है। मौसमी बदलाव के दौरान सेहत को दुरुस्त रखने के लिए यह स्थानीय खानपान का एक अहम हिस्सा बनी हुई है। सर्दियों में विविध भाजियों का समृद्ध चलन छतरपुर जिले की खानपान संस्कृति में सालभर अलग-अलग वनस्पतियों और पत्तियों का साग खाने की परंपरा रही है, परंतु शीत ऋतु का आगमन होते ही इसकी विविधता चरम पर पहुंच जाती है। नौरपा भाजी और चना भाजी जैसे पारंपरिक साग इसी मौसम में प्रमुखता से थालियों का हिस्सा बनते हैं। इन्हीं के साथ शकरकंद की भाजी भी सर्दियों के दिनों में विशेष रूप से पकाई जाती है। रानू सोनी के अनुसार, ठंड के दिनों में लोग ऐसी भाजियों को प्राथमिकता देते हैं जो शरीर को गर्माहट प्रदान करें और सेहत को जरूरी पोषण दे सकें। बाजार की पहुंच से दूर, आंगन की बाड़ी में आसान उपज शकरकंद की भाजी व्यावसायिक मंडियों या आम सब्जी बाजारों में सामान्य रूप से बिकती हुई नहीं मिलती। इसका मुख्य कारण यह है कि अधिकांश लोगों को इसके पत्तों के खानपान उपयोग और गुणों की जानकारी नहीं है। शहरी इलाकों में तो इस साग की पहचान बहुत ही सीमित है, जबकि ग्रामीण परिवेश में लोग इसे पीढ़ियों से जानते और इस्तेमाल करते आए हैं। रानू सोनी साझा करती हैं कि उनके मायके में बचपन से ही शकरकंद की बेल घर पर लगाई जाती रही है, जिससे इस भाजी का स्वाद उनकी दिनचर्या में रचा-बसा रहा। विवाह के बाद उन्होंने ससुराल के कच्चे आंगन में सब्जियों के साथ शकरकंद का रोपण किया। इस पौधे की खासियत यह है कि यह एक साथ दोहरा लाभ देता है, जिसमें जमीन के भीतर शकरकंद का फल तैयार होता है और ऊपर फैली हरी पत्तियों से पौष्टिक भाजी तैयार कर ली जाती है। आयरन से भरपूर और तासीर में गर्म शकरकंद के पत्तों की भाजी यूं तो पूरे वर्ष तैयार की जा सकती है, किंतु सर्दियों के महीनों में इसका सेवन विशेष फलदायी माना जाता है। शकरकंद और उसके पत्तों में भरपूर मात्रा में आयरन मौजूद होता है, जिसके चलते इसके गुण पालक के समान लाभकारी आंके जाते हैं। इसके अतिरिक्त इस भाजी की तासीर गर्म प्रकृति की होती है, जो कड़ाके की ठंड में सर्दी और जुकाम के असर को कम करने में मदद करती है। मौसमी संक्रमणों से बचाव और शारीरिक स्फूर्ति बनाए रखने के लिए स्थानीय लोग इस देसी आहार को बेहद उपयोगी मानते हैं। दाल और लहसुन के बघार से तैयार होती है दरभजिया इस पारंपरिक व्यंजन को पकाने की विधि बहुत कुछ चने के साग से मिलती-जुलती है। सबसे पहले पौधे से ताजी और कोमल पत्तियां तोड़ ली जाती हैं। इन पत्तियों को साफ पानी से भली-भांति धोकर बारीक टुकड़ों में काट लिया जाता है। इसके पश्चात इसे दाल के साथ पकाया जाता है, जिसके लिए मसूर, मूंग अथवा अरहर की दाल का चयन किया जा सकता है। दाल और कटे पत्तों को एक साथ पकाने के बाद इसमें लहसुन का जोरदार तड़का या बघार लगाया जाता है। यह व्यंजन पूरी तरह सूखा न होकर रसेदार यानी गीला रखा जाता है। दाल के साथ घुटकर तैयार होने के इसी विशेष स्वरूप के कारण क्षेत्रीय बोली में इसे दरभजिया नाम दिया गया है। इसका आप पर असर यह पारंपरिक व्यंजन घर के बगीचे में उगाई जा सकने वाली हरी पत्तियों के जरिए सर्दियों में कम लागत पर उच्च पोषण प्राप्त करने का सीधा साधन प्रदान करता है। • भारत में: देश भर के पाठक अपने घर की बाड़ियों या गमलों में शकरकंद की बेल लगाकर फल और पत्तों का दोहरा लाभ उठा सकते हैं। इससे बाजार पर निर्भर रहे बिना ताजी, रसायन मुक्त और पालक जैसी पौष्टिक हरी भाजी आसानी से उपलब्ध हो जाती है। • छतरपुर में: स्थानीय निवासियों के लिए यह पारंपरिक खानपान सर्दी के मौसम में स्वास्थ्य और प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत रखने का सहज उपाय है। कड़ाके की ठंड में दाल और गर्म तासीर वाली भाजी का सेवन मौसमी बीमारियों से बचाव में सहायक साबित होता है। • रसोई बजट पर: महंगे बाजारू साग के विकल्प के रूप में घर में उगाई गई यह भाजी रोजमर्रा के खानपान के खर्च को घटाती है। बची हुई दालों के साथ इसे मिलाकर एक पौष्टिक और संपूर्ण भोजन आसानी से तैयार किया जा सकता है। • शारीरिक पोषण: आयरन की कमी से जूझ रहे लोगों के लिए यह देसी साग आहार में प्राकृतिक बदलाव का एक उपयोगी विकल्प है। नियमित सेवन से सर्दियों की सुस्ती दूर करने और शरीर में हीमोग्लोबिन स्तर बनाए रखने में मदद मिलती है। ऐसा क्यों हुआ छतरपुर अंचल में शकरकंद के पत्तों की भाजी पकाने की यह प्रथा घरेलू बागवानी और मौसमी स्वास्थ्य जरूरतों के आपसी तालमेल से विकसित हुई है। व्यावसायिक रूप से अनुपलब्ध होने के बावजूद यह देसी ज्ञान पीढ़ियों से परिवारों में संरक्षित रहा है। • सीमित बाजार पहुंच: शहरी बाजारों और थोक मंडियों में शकरकंद के पत्तों की मांग न होने से यह सब्जी दुकानों पर नहीं बिकती। इसके चलते जिन परिवारों के घरों में कच्चा आंगन या बाड़ी मौजूद है, वे स्वयं बेल लगाकर इसका उपभोग करते हैं। • दोहरे लाभ की परंपरा: शकरकंद की खेती से जमीन के नीचे कंद और जमीन के ऊपर पत्तियां दोनों प्राप्त होती हैं। ग्रामीण परिवेश में भोजन का कोई भी पौष्टिक हिस्सा व्यर्थ न करने की समझ ने इस भाजी को रसोई का हिस्सा बनाया। • सर्दियों में स्वास्थ्य लाभ: इस साग में भरपूर आयरन पाया जाता है और इसकी तासीर गर्म होती है। ठंड के महीनों में सर्दी, खांसी और जुकाम से बचाव के लिए घरेलू स्तर पर इसे पकाने का चलन बना हुआ है। सवाल-जवाब 1. शकरकंद की भाजी को स्थानीय भाषा में दरभजिया क्यों कहा जाता है? इस भाजी को मसूर, मूंग या अरहर की दाल के साथ मिलाकर पकाया जाता है और इसे गीला रखा जाता है, जिसके कारण स्थानीय बोली में इसे दरभजिया कहते हैं। 2. शकरकंद के पत्तों की भाजी आम बाजार में क्यों नहीं मिलती? अधिकांश लोगों को इसके उपयोग और लाभों के बारे में जानकारी नहीं है, इसलिए बाजार में इसकी मांग न होने से यह दुकानों पर उपलब्ध नहीं होती। 3. सर्दियों के मौसम में शकरकंद की भाजी खाना क्यों फायदेमंद माना जाता है? इस भाजी में आयरन प्रचुर मात्रा में होता है और इसकी तासीर गर्म होती है, जिससे यह ठंड में सर्दी-जुकाम से बचाव में मददगार होती है। 4. शकरकंद का पौधा घर के आंगन में लगाने का क्या दोहरा लाभ मिलता है? पौधे से जमीन के भीतर खाने के लिए शकरकंद फल मिल जाता है और ऊपर की पत्तियों से स्वादिष्ट भाजी तैयार हो जाती है। 5. दरभजिया तैयार करने के लिए तड़के में किस सामग्री का मुख्य रूप से प्रयोग किया जाता है? कटी हुई पत्तियों और दाल के मिश्रण को पकाने के बाद इसमें विशेष रूप से लहसुन का तड़का या बघार लगाया जाता है। https://trendkia.com/lifestyle/chhatarpur-ke-angana-se-nikalakara-charcha-men-ai-shakaraknda-ki-darabhajiya-janie-ise-pakane-ka-parnparika-tarika-55003 TrendKia — Har trend, sabse pehle.