# डेढ़ सदी पुराना जायका: जब पटना के महंगु होटल में पकता है मटन और बटेर, खिंचे चले आते हैं दिग्गज

> पटना में करीब 150 साल पुराना महंगु होटल आज भी अपनी पारंपरिक मटन, बटेर, कबाब और मछली की रेसिपी के लिए जाना जाता है, जिसे परिवार की तीसरी पीढ़ी चला रही है।

**Type:** article · **Category:** जीवनशैली · **Published:** 2026-09-20 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/lifestyle/derha-sadi-purana-jayaka-jaba-patna-ke-mhangoo-hotel-men-pakata-hai-matana-aura-batera-khinche-chale-ate-hain-diggaja-35132 · **Language:** Hindi
**Tags:** महंगु होटल, पटना खानपान, बिहारी मटन, बटेर करी, स्ट्रीट फूड बिहार, ऐतिहासिक भोजनालय

बिहार की राजधानी पटना की चहल-पहल भरी गलियों में खानपान के कई ऐसे ठिकाने हैं, जिनका जुड़ाव शहर के गुजरे जमाने से रहा है। इन्हीं में एक ऐसा भोजनालय भी शामिल है, जो बाहर से देखने पर भले ही एक साधारण और पारंपरिक होटल की तरह नजर आए, मगर इसकी रसोई से उठने वाली महक अपने भीतर करीब डेढ़ सदी की विरासत समेटे हुए है। इस ठिकाने का नाम महंगु होटल है, जो बीते करीब 150 वर्षों से मांसाहारी खाने के कद्रदानों के बीच एक खास मुकाम बनाए हुए है। ब्रिटिश हुकूमत के दौर से लेकर आज तक इस रसोई में बनने वाले मटन, कबाब, चिकन, बटेर और मछली के स्वाद में कोई कमी नहीं आई है। यहां की पुरानी देहाती शैली की ग्रेवी और मसालों का ऐसा जादू रहा है कि आम लोगों के साथ-साथ राज्य की सत्ता के शीर्ष चेहरे, न्यायपालिका और प्रशासन के बड़े अधिकारी तथा क्रिकेट और सिनेमा जगत के दिग्गज भी इसके दीवाने रहे हैं।

## दादाजी के नाम से शुरू हुआ 150 साल का सफर
इस ऐतिहासिक भोजनालय की सबसे बड़ी पहचान इसका दशकों पुराना इतिहास और पीढ़ियों से चली आ रही रवायत है। वर्तमान में इस होटल की जिम्मेदारी संभाल रहे सोनू बताते हैं कि इस प्रतिष्ठान की नींव उनके दादाजी महंगु राम ने रखी थी। जिस दौर में यह भोजनालय खुला था, उस समय पटना शहर के भीतर मांसाहारी व्यंजनों के गिने-चुने ठिकाने ही हुआ करते थे। महंगु राम ने कई दशकों तक खुद कड़ाही संभाली और ग्राहकों को अपनी खास रेसिपी से तैयार भोजन परोसा। दादाजी के नाम पर ही इस जगह का नाम महंगु होटल पड़ा, जो वक्त बीतने के साथ पटना के खानपान के नक्शे पर एक मजबूत पहचान बन गया। महंगु राम के बाद उनके बेटे ने इस कारोबार को आगे बढ़ाया और अब परिवार की तीसरी पीढ़ी इसकी बागडोर संभाल रही है।

## सोनू और प्रदीप के कंधों पर 45 साल से जिम्मेदारी
परिवार की विरासत को जीवंत रखने का काम सोनू और उनके छोटे भाई प्रदीप मिलकर कर रहे हैं। दोनों भाई पिछले करीब 40 से 45 वर्षों से रोजाना भोजनालय के संचालन, रसोई की निगरानी और ग्राहकों की सेवा में जुटे हुए हैं। सोनू का कहना है कि यह उनके लिए केवल आजीविका चलाने का जरिया भर नहीं है, बल्कि एक पारिवारिक धरोहर है जिसे उनके पूर्वजों ने खून-पसीने से सींचा है। बाजार में कई आधुनिक रेस्टोरेंट और नए फूड आउटलेट आ जाने के बाद भी महंगु होटल ने अपने पकाने के तौर-तरीकों और बुनियादी स्वाद से कोई समझौता नहीं किया। यही वजह है कि 45 साल से लगातार काउंटर और रसोई संभालने के बावजूद दोनों भाइयों का उत्साह आज भी पहले जैसा ही बना हुआ है।

## मटन, बटेर से लेकर रोहू मछली और झींगा का मेन्यू
महंगु होटल में रोजाना की तैयारियां सुबह से ही पूरे जोर-शोर के साथ शुरू हो जाती हैं। दोपहर के भोजन का समय होने से पहले ही बड़ी-बड़ी कड़ाहियों में मटन की हांडी चढ़ जाती है, तो दूसरी तरफ कलेजी और चिकन की ग्रेवी खदकने लगती है। यहां के मेन्यू में केवल आम चिकन और मटन ही शामिल नहीं है, बल्कि उन लोगों के लिए भी खास इंतजाम रहता है जो कुछ अलग स्वाद तलाशते हैं। होटल में तीतर-बटेर के शौकीनों के लिए खास तौर पर बटेर तैयार किया जाता है। इसके अलावा मीठे पानी की ताजा रोहू मछली ग्राहकों की मांग के अनुसार काटकर पकाई जाती है। समुद्री और ताजे पानी के अन्य विकल्पों में झींगा भी बनाया जाता है। वहीं चिकन पसंद करने वालों के लिए फ्राइड चिकन और ग्रेवी वाला चिकन दोनों उपलब्ध रहते हैं। शुरुआत करने वालों के लिए सींक या कड़ाही वाले कबाब और मटन गोली भी यहां के सबसे लोकप्रिय व्यंजनों में गिने जाते हैं।

## किफायती दाम और तय की गई कीमतें
महंगु होटल की लोकप्रियता का एक बड़ा कारण इसका किफायती होना भी है। छोटे भाई प्रदीप के अनुसार, होटल में मटन-चावल की पूरी थाली 200 रुपये में दी जाती है, जिसमें प्लेट भर चावल के साथ मटन के तीन बड़े टुकड़े परोसे जाते हैं। वहीं सामान्य बजट वाले ग्राहकों के लिए मुर्गा-चावल की थाली 100 रुपये में उपलब्ध कराई जाती है। विशेष स्वाद चाहने वालों के लिए बटेर-चावल की थाली 190 रुपये और कलेजी-चावल की थाली 190 रुपये रखी गई है। अगर कोई ग्राहक अलग से कलेजी लेना चाहे, तो उसकी कीमत भी 200 रुपये तय है। इसके अलावा कबाब की पूरी प्लेट 200 रुपये में मिलती है, जबकि मटन गोली मात्र 20 रुपये प्रति पीस के हिसाब से बेची जाती है। ग्राहकों का मानना है कि आज की महंगाई के दौर में भी इस दाम पर शुद्ध और पारंपरिक स्वाद मिलना बहुत बड़ी बात है।

## लालू-नीतीश से लेकर कपिल देव तक ने चखा स्वाद
सोनू बताते हैं कि इस भोजनालय के मुरीदों की सूची में समाज के हर तबके के लोग शामिल रहे हैं। आम मेहनतकश लोगों से लेकर बिहार की राजनीति के सबसे बड़े चेहरे जैसे लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार भी यहां के भोजन का स्वाद ले चुके हैं। सोनू के मुताबिक, लालू यादव के परिवार की तरफ से आज भी कबाब की मांग आती रहती है और उनका घरेलू या दफ्तर का स्टाफ यहां से कबाब पैक करवाकर ले जाता है। इसके अलावा भारतीय क्रिकेट टीम के पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर, कपिल देव और बॉलीवुड अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा जैसी मशहूर हस्तियां भी यहां के व्यंजनों का लुत्फ उठा चुकी हैं। कई प्रशासनिक अधिकारी और जज, जो छात्र जीवन में पटना में रहते हुए यहां भोजन करते थे, वे आज भी शहर आने पर इस पुरानी दुकान का रुख करते हैं।

## दोपहर से देर रात तक ग्राहकों का तांता
दुकान का दैनिक चक्र बेहद व्यस्त रहता है। दोपहर का खाना शुरू होने से पहले ही रसोई में सारा सामान पूरी तरह तैयार कर लिया जाता है ताकि आने वाले ग्राहकों को इंतजार न करना पड़े। दोपहर के समय सरकारी दफ्तरों के कर्मचारी, व्यापारी और राहगीर भोजनालय में पहुंचते हैं। सोनू के अनुसार, दोपहर की शुरुआत से लेकर देर रात तक भोजनालय में ग्राहकों की निरंतर आवाजाही लगी रहती है। शाम ढलते ही कबाब, मटन गोली और फ्राइड चिकन की मांग तेजी से बढ़ जाती है। इतने लंबे समय तक बिना किसी बड़े प्रचार के केवल जुबानी तारीफ के दम पर ग्राहकों का यह विश्वास कायम रखना इस बात का प्रमाण है कि स्वाद की गुणवत्ता आज भी वैसी ही है जैसी दशकों पहले हुआ करती थी।

## चौथी पीढ़ी की बेरुखी और भविष्य के सवाल
डेढ़ सौ साल की यह गौरवशाली यात्रा आज एक भावुक मोड़ पर भी खड़ी नजर आती है। जब होटल के भविष्य और अगली पीढ़ी के बारे में पूछा जाता है, तो सोनू की बातों में एक संकोच और सच्चाई झलकती है। उनका कहना है कि परिवार की चौथी पीढ़ी अब इस पारंपरिक कारोबार को आगे बढ़ाने में बहुत ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। उनके बच्चे इस समय बेंगलुरु में उच्च शिक्षा हासिल कर रहे हैं और वे कॉर्पोरेट नौकरी या अन्य आधुनिक पेशों में अपना करियर बनाना चाहते हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि तीसरी पीढ़ी के रूप में सोनू और प्रदीप जब तक सक्रिय हैं, तब तक वे इस 150 साल पुरानी मशाल को थामे रखेंगे। इसके बावजूद, जब दोपहर में कड़ाही में मटन की छौंक लगती है और ग्राहकों का जमावड़ा लगता है, तो डेढ़ सदी पुरानी यह दास्तान अपने पूरे शबाब पर नजर आती है।

## इसका आप पर असर
पटना के इस ऐतिहासिक भोजनालय की निरंतरता पारंपरिक स्वाद और किफायती खानपान के शौकीनों के लिए एक बेहतरीन विकल्प पेश करती है।

- **पटना के स्थानीय निवासियों के लिए:** शहर के केंद्र में किफायती दर पर प्रामाणिक मांसाहारी भोजन का विश्वसनीय विकल्प हमेशा मौजूद रहता है। दोपहर के भोजन से लेकर देर रात तक दफ्तर जाने वाले और छात्र 100 से 200 रुपये के बजट में भरपेट भोजन कर सकते हैं।
- **बिहार के बाहर के पर्यटकों के लिए:** पटना भ्रमण पर आने वाले यात्रियों को 150 साल पुरानी पाक विरासत का प्रत्यक्ष अनुभव करने का मौका मिलता है। आधुनिक रेस्तरां की तुलना में यहां प्रामाणिक देहाती मसालों और पारंपरिक कुकिंग स्टाइल का स्वाद चखा जा सकता है।
- **मांसाहारी खाने के शौकीनों के लिए:** मेन्यू में मटन और चिकन के अलावा बटेर, रोहू मछली और झींगा जैसे दुर्लभ विकल्प एक ही छत के नीचे मिल जाते हैं। किसी विशेष पक्षी या सी-फूड के लिए अलग-अलग दुकानों पर भटकने की जरूरत नहीं पड़ती।
- **पारंपरिक व्यवसायों के भविष्य पर असर:** नई पीढ़ी के अन्य पेशों में जाने से ऐसे ऐतिहासिक फूड स्पॉट्स के अस्तित्व पर लंबी अवधि में संकट आ सकता है। आने वाले सालों में इन पारंपरिक स्वादों का लुत्फ उठाने के लिए समय रहते इन धरोहरों का अनुभव करना जरूरी है।

## ऐसा क्यों हुआ
महंगु होटल की 150 साल पुरानी सफलता के पीछे पारंपरिक रेसिपी की निरंतरता, पारिवारिक देखरेख और किफायती मूल्य निर्धारण की ठोस रणनीति रही है।

- **पारिवारिक परंपरा की निरंतरता:** दादा महंगु राम द्वारा शुरू की गई कुकिंग तकनीकों को परिवार की तीन पीढ़ियों ने बिना बदलाव के आगे बढ़ाया है। सोनू और प्रदीप ने पिछले 45 वर्षों से रोजाना खुद रसोई में रहकर मसालों और पकाने की प्रक्रिया की गुणवत्ता पर सख्त नियंत्रण बनाए रखा।
- **मेनू में दुर्लभ विकल्पों का समावेश:** आम रेस्टोरेंट जहां केवल चिकन और मटन तक सीमित रहते हैं, वहीं इस भोजनालय ने शुरुआत से ही बटेर, ताजी रोहू और झींगा जैसे व्यंजन परोसने की पहचान बनाई। इस विविधता ने शहर के हर वर्ग के मांसाहारी भोजन प्रेमियों को लंबे समय तक जोड़े रखा।
- **किफायती मूल्य संरचना:** महंगाई बढ़ने के बावजूद 100 रुपये में चिकन-चावल और 200 रुपये में मटन-चावल परोसने की नीति ने आम जनता और छात्रों का अटूट भरोसा जीता। भारी प्रचार के बजाय किफायती दरों और प्रामाणिक स्वाद के दम पर यह भोजनालय पीढ़ियों तक प्रासंगिक बना रहा।

## सवाल-जवाब

### 1. महंगु होटल कितना पुराना है और इसका नाम कैसे पड़ा?
यह भोजनालय करीब 150 साल पुराना है। इसकी शुरुआत महंगु राम ने की थी और उन्हीं के नाम पर इस होटल का नाम पड़ा।

### 2. वर्तमान में इस भोजनालय का संचालन कौन कर रहा है?
परिवार की तीसरी पीढ़ी के दो भाई, सोनू और प्रदीप, पिछले करीब 40-45 वर्षों से मिलकर इसे चला रहे हैं।

### 3. महंगु होटल में मटन और चावल की थाली की कीमत क्या है?
मटन-चावल की एक थाली 200 रुपये में मिलती है, जिसमें मटन के तीन पीस और चावल परोसा जाता है।

### 4. मेन्यू में अन्य कौन-कौन से मांसाहारी व्यंजन उपलब्ध हैं?
यहां मटन के अलावा बटेर, रोहू मछली, झींगा, फ्राइड व ग्रेवी चिकन, कलेजी, कबाब और 20 रुपये प्रति पीस की मटन गोली मिलती है।

### 5. क्या इस भोजनालय में प्रसिद्ध हस्तियों ने भी भोजन किया है?
हां, लालू प्रसाद यादव, नीतीश कुमार, सुनील गावस्कर, कपिल देव और शत्रुघ्न सिन्हा जैसी प्रमुख हस्तियां यहां का स्वाद ले चुकी हैं।

### 6. क्या परिवार की चौथी पीढ़ी इस कारोबार को आगे बढ़ाएगी?
सोनू के अनुसार, उनके बच्चे बेंगलुरु में पढ़ाई कर रहे हैं और कॉर्पोरेट नौकरी या अन्य क्षेत्रों में करियर बनाना चाहते हैं, जिससे वे इस काम में रुचि नहीं रखते।

## प्रेरणा और सबक
महंगु होटल का डेढ़ सौ वर्षों का लंबा सफर पारिवारिक समर्पण, सादगी और अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणादायक सीख देता है।

- **मेहनत और निरंतरता की ताकत:** चार दशकों से अधिक समय तक रोजाना सुबह से रात तक भोजनालय संभालना यह सिखाता है कि किसी भी काम में स्थिरता ही दीर्घकालिक सफलता की चाबी है। बिना किसी दिखावे के अपने बुनियादी काम पर टिके रहना एक बड़ी पहचान खड़ी कर सकता है।
- **विरासत का सम्मान:** आधुनिकता की दौड़ में अपनी पहचान खोए बिना पुरखों के हुनर और नाम को जीवित रखना सिखाता है कि परंपराएं केवल अतीत नहीं, बल्कि भविष्य की बुनियाद होती हैं। सोनू और प्रदीप ने अपने दादा के नाम को एक ब्रांड बनाकर संरक्षित रखा।
- **गुणवत्ता और ईमानदारी का तालमेल:** आम जनता से लेकर दिग्गजों तक को एक ही भाव और एक ही स्वाद परोसना दिखाता है कि ग्राहकों का भरोसा केवल सच्चाई और वाजिब व्यवहार से ही जीता जा सकता है।

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