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  "type": "article",
  "title": "गाजीपुर की गृह विज्ञान छात्राओं का कमाल, मात्र सौ रुपये में पुरानी चीजों से बना रहीं खूबसूरत तोरण",
  "summary": "गाजीपुर के पीजी कॉलेज की गृह विज्ञान की छात्राओं ने पुराने पेपर कप और चूड़ियों का इस्तेमाल करके दिवाली के लिए आकर्षक और किफायती तोरण तैयार किए हैं।",
  "content": "त्योहारों का मौसम आते ही हर घर में साफ-सफाई और सजावट का दौर शुरू हो जाता है। अपने आशियाने को खूबसूरत बनाने के लिए लोग बाजार से नए-नए और महंगे सजावटी सामान खरीदकर लाते हैं, लेकिन इस बार गाजीपुर में कुछ अलग ही रचनात्मक पहल देखने को मिल रही है। गाजीपुर के पीजी कॉलेज की गृह विज्ञान की छात्राएं घर में बेकार पड़ी पुरानी चीजों का इस्तेमाल करके बेहद आकर्षक और सुंदर तोरण तैयार कर रही हैं। इन सजावटी सामानों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इन्हें बनाने में जेब पर बिल्कुल भी भारी बोझ नहीं पड़ता और घर का कबाड़ भी ठिकाने लग जाता है।\n\nइंटरनेट और सीनियर्स की मदद से सीखी कला\nगृह विज्ञान की पढ़ाई कर रही छात्रा निशा पिछले तीन-चार वर्षों से इस तरह की सुंदर और अनोखी हस्तकला से तोरण बनाने का काम कर रही हैं। इस रचनात्मक हुनर को निखारने के लिए उन्होंने शुरुआत में इंटरनेट पर तरह-तरह के डिजाइन खंगाले और अपनी कॉलेज की सीनियर छात्राओं से भी काफी मार्गदर्शन लिया। धीरे-धीरे उन्होंने अपने खुद के आइडिया और पसंद के हिसाब से विभिन्न प्रकार के बेहतरीन पैटर्न तैयार करना शुरू कर दिया। निशा के हाथों से बने इन तोरणों में मुख्य रूप से दो बेहद खास और अनोखे डिजाइन देखने को मिलते हैं, जो किसी का भी मन मोह सकते हैं।\n\nपुरानी चूड़ियों और ऊन का शानदार इस्तेमाल\nपहला डिजाइन पुराने मेटल की चूड़ियों और रंग-बिरंगे ऊन का उपयोग करके बनाया जाता है। इसमें सबसे पहले पुरानी और बेकार चूड़ियों को अलग-अलग रंगों के ऊन से करीने से लपेटा जाता है, जिससे वे बेहद आकर्षक दिखने लगती हैं। इसके बाद इन सजी हुई चूड़ियों को आपस में जोड़कर रंग-बिरंगी लड़ियां तैयार की जाती हैं। इस सजावट में मोतियों और ऊन से बने सुंदर लटकन चार चांद लगा देते हैं। उदाहरण के लिए, गुलाबी रंग के फूलनुमा डिजाइन को पीले रंग के धागे के साथ जोड़कर बनाया गया तोरण इसी शानदार हस्तकला का एक बेहतरीन नमूना है।\n\nपेपर कप से बन रहे मनमोहक तोरण\nदूसरा डिजाइन और भी ज्यादा अनोखा है, जिसमें चाय पीने वाले इस्तेमाल किए हुए कागज के पेपर कप का उपयोग किया जाता है। सबसे पहले इन पेपर कप के बाहरी हिस्से पर अलग-अलग रंगों का ऊन लपेटकर उन्हें खूबसूरत रूप दिया जाता है। इसके बाद सुई-धागे, मोतियों और ऊन के सुंदर लटकन की मदद से इन्हें आपस में पिरोकर एक भव्य तोरण का रूप दे दिया जाता है। लाल और हरे रंग के ऊन से तैयार की गई इन कप वाली झालरों को आप अपने घर के मुख्य दरवाजे या फिर किसी भी दीवार पर सजावट के लिए आसानी से टांग सकते हैं।\n\nसमय और लागत दोनों की भारी बचत\nइन अनूठे तोरणों को तैयार करने में समय भी बहुत कम लगता है। निशा के अनुसार, पुरानी चूड़ियों की मदद से तोरण बनाने में महज 30 मिनट से एक घंटे तक का समय लगता है और इसमें लगभग 30 रुपये का खर्च आता है। ठीक इसी तरह, पेपर कप वाले तोरण को तैयार करने में भी आधा से एक घंटा ही लगता है। अगर दोनों तरह के तोरणों में लगने वाले कुल खर्च की बात की जाए, तो ऊन, कप और चूड़ियों को मिलाकर अधिकतम खर्च केवल 100 रुपये तक ही आता है।\n\nसृजनात्मकता और बचत का अनूठा संदेश\nइस पूरी रचनात्मक पहल के पीछे का मुख्य उद्देश्य केवल घर को सजाना भर नहीं है, बल्कि बाजार से मिलने वाले महंगे सजावटी सामानों पर होने वाले फालतू खर्च को बचाना और अपनी छिपी हुई रचनात्मकता को आजमाना है। इसके जरिए यह संदेश दिया जा रहा है कि घर को सुंदर बनाने के लिए हर छोटी चीज़ बाजार से खरीदना जरूरी नहीं है, बल्कि घर में पहले से मौजूद पुरानी चूड़ियां और अन्य बेकार सामान भी बहुत काम आ सकते हैं। गृह विज्ञान की ये छात्राएं घरेलू चीजों को नया जीवन देकर यह साबित कर रही हैं कि थोड़ी सी मेहनत और कल्पनाशीलता के दम पर बहुत ही कम बजट में घर को भव्य रूप दिया जा सकता है।\n\nइसका आप पर असर\nइस रचनात्मक पहल से आम लोगों को त्योहारी सीजन में बाजार के भारी-भरकम खर्चों से राहत मिलती है और कम बजट में घर की सजावट हो जाती है।\n\n• भारत में: त्योहारों के समय सजावट पर होने वाले घरेलू बजट को कम करने के लिए पुरानी चीजों का यह इस्तेमाल एक बेहतरीन और किफायती प्रेरणा देता है।\n• गाजीपुर में: स्थानीय स्तर पर गृह विज्ञान की छात्राओं द्वारा किए गए इस प्रयास से लोगों को बेकार पड़े सामानों से उपयोगी कलाकृतियां बनाने की नई प्रेरणा मिलेगी।\n\nऐसा क्यों हुआ\nत्योहारों के मौसम में सजावटी सामानों के बढ़ते दाम और बाजार पर निर्भरता कम करने की सोच ने इस अनोखी पहल को जन्म दिया। पुरानी चूड़ियों और पेपर कप जैसे घरेलू कचरे का सदुपयोग करने की इच्छा से यह कला विकसित हुई।\n\n• बढ़ता खर्च: बाजार में मिलने वाले रेडीमेड तोरण और झालरों की ऊंची कीमतें आम लोगों के बजट पर असर डालती हैं, जिसे इस विधि से टाला जा सकता है।\n• कचरे का सदुपयोग: घरों में बेकार पड़ी मेटल की पुरानी चूड़ियां और चाय के पेपर कप आसानी से उपलब्ध होते हैं, जिससे बिना किसी अतिरिक्त लागत के बेहतरीन चीजें बन जाती हैं।\n• रचनात्मकता का विकास: इंटरनेट के माध्यम से नए डिजाइन सीखने और खुद कुछ नया करने की लगन ने छात्राओं को इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. गाजीपुर में तोरण कौन बना रहा है?\nगाजीपुर के पीजी कॉलेज की गृह विज्ञान की छात्राएं ये तोरण तैयार कर रही हैं।\n\n2. तोरण बनाने में मुख्य रूप से किन चीजों का इस्तेमाल हो रहा है?\nइसमें पुरानी मेटल की चूड़ियों, ऊन, मोतियों और चाय पीने वाले पेपर कप का इस्तेमाल किया जा रहा है।\n\n3. एक तोरण को बनाने में कितना समय लगता है?\nचूड़ियों या पेपर कप से तोरण बनाने में लगभग 30 मिनट से एक घंटे तक का समय लगता है।\n\n4. इन तोरणों को बनाने में अधिकतम कितना खर्च आता है?\nऊन, कप और चूड़ियों से दोनों तरह के तोरण बनाने में कुल खर्च अधिकतम करीब 100 रुपये तक आता है।\n\n5. गृह विज्ञान की छात्रा निशा कितने समय से तोरण बना रही हैं?\nछात्रा निशा पिछले तीन-चार वर्षों से इस तरह के तोरण बना रही हैं।\n\nप्रेरणा और सबक\nगृह विज्ञान की छात्राओं की यह सफलता दिखाती है कि सीमित संसाधनों और कम पैसों में भी बेहतरीन परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।\n\n• कौशल का उपयोग: अपनी पढ़ाई और कौशल का सही इस्तेमाल करके रोजमर्रा की समस्याओं और बजट की पाबंदियों को हल किया जा सकता है।\n• कबाड़ से जुगाड़: घर में पड़ी पुरानी और बेकार चीजों को फेंके बिना उन्हें एक नया और सुंदर रूप दिया जा सकता है।\n• आत्मनिर्भरता: छोटी-छोटी चीजों में रचनात्मकता दिखाकर बाजार पर निर्भरता को कम किया जा सकता है और पैसे बचाए जा सकते हैं।\n• सीखने की ललक: इंटरनेट और सीनियर्स से मार्गदर्शन लेकर किसी भी नए हुनर को आसानी से सीखा और सुधारा जा सकता है।",
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  "publishedAt": "2026-11-07",
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