# मधुबनी में मिट्टी के खपरैल मकानों की देखरेख कैसे करें, सीपेज और पानी रिसाव रोकने की पारंपरिक तकनीक

> बिहार के मधुबनी जिले में मिट्टी के खपरैल मकानों को पानी और सीपेज से बचाने के लिए मिस्त्री पारंपरिक मिट्टी के घोल की तकनीक अपनाते हैं।

**Type:** article · **Category:** जीवनशैली · **Published:** 2026-09-12 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/lifestyle/madhubani-men-mitti-ke-khaparaila-makanon-ki-dekharekha-kaise-karen-sipeja-aura-pani-risava-rokane-ki-parnparika-takanika-31484 · **Language:** Hindi
**Tags:** मधुबनी, खपरैल मकान, छत मरम्मत, सीपेज, बिहार, पारंपरिक घर

बिहार के मधुबनी जिले में आज भी पारंपारिक खपरैल के मकान बड़ी संख्या में देखने को मिलते हैं। मिट्टी को पकाकर बनाए गए खपरैल के घर मौसम के लिहाज से बेहद अनुकूल माने जाते हैं, लेकिन इनकी देखभाल और मरम्मत एक कठिन चुनौती होती है। पक्की मिट्टी से बने होने के कारण ये खपरैल आसानी से टूट जाते हैं, जिससे बारिश के दिनों में छत से पानी टपकने और सीपेज की गंभीर समस्या खड़ी हो जाती है।

## खपरैल मकानों की बनावट और पानी टपकने की मुख्य वजहें
खपरैल के घरों की छत की बनावट काफी खास होती है। अंदरूनी हिस्से में बांस, लकड़ी और खर-पतवार का ढांचा तैयार किया जाता है, जिसके ऊपर पकी हुई मिट्टी की खपरैल की परत बिछाई जाती है। चारकोण आकार की छत होने के कारण इनकी मरम्मत करना साधारण कारीगरों के बस की बात नहीं होती। ग्रामीण इलाकों में अक्सर छतों पर बंदरों की आवाजाही या किसी भारी वस्तु के गिरने से खपरैल टूट जाती हैं। जरा सी दरार या टूट-फूट होते ही बारिश का पानी सीधे घर के अंदर टपकने लगता है।

## गिलेवे के घोल से मरम्मत करने का पारंपरिक तरीका
खपरैल छत को सीपेज और पानी के रिसाव से बचाने के लिए पुरानी तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। स्थानीय अनुभवी मिस्त्री शत्रुघ्न के अनुसार, जिस तरह पक्के मकानों में ईंटों को जोड़ने के लिए सीमेंट का प्रयोग होता है, ठीक उसी तरह खपरैल घर में मिट्टी का गीला घोल यानी गिलेवा बनाया जाता है। इस मिट्टी के घोल की मदद से खपरैल को बहुत बारीकी और सफाई से आपस में जोड़ा जाता है। इससे ढलान बनी रहती है और बारिश का पानी छत पर रुके बिना तेजी से नीचे गिर जाता है।

## मौसम के अनुकूल खपरैल और एस्बेस्टस पर इसका नया इस्तेमाल
खपरैल के मकानों की सबसे बड़ी खासियत यह है कि ये भीषण गर्मी में भी अंदर से काफी ठंडे रहते हैं और ठंड के मौसम में भी रहने में आरामदायक होते हैं। हालांकि, बदलते दौर के साथ अब नए खपरैल मकान बहुत कम बनते हैं और मिट्टी पकाने वाली पारंपारिक भट्टियां भी लगभग खत्म हो चुकी हैं। इसके बावजूद, जिन लोगों के पास पुरानी खपरैल बची होती है, वे अपने घरों को गर्मी से बचाने के लिए एस्बेस्टस की चादरों के ऊपर इन्हें फैला देते हैं, ताकि कमरा ज्यादा गर्म न हो।

## इसका आप पर असर
खपरैल मकानों के उचित रख-रखाव से ग्रामीणों को कम खर्च में छत के रिसाव और भीषण गर्मी दोनों से राहत मिल सकती है।

- **बिहार और मधुबनी में:** पुराने खपरैल मकान मालिकों को बारिश से पहले मिट्टी के घोल (गिलेवा) से छतों की मरम्मत करानी चाहिए ताकि सीपेज से बचाव हो सके।
- **देशभर के पाठकों के लिए:** एस्बेस्टस या टीन की छतों पर पुरानी खपरैल की परत बिछाकर कम लागत में कमरे का तापमान काफी हद तक कम किया जा सकता है।
- **कारीगरों और कौशल के लिए:** पारंपरिक मिट्टी कार्य से जुड़े स्थानीय मिस्त्रियों की मांग बनी रहती है जिससे ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा मिलता है।
- **संरक्षण के मामले में:** बिना नया खर्च किए पुरानी खपरैल की री-रीफाइंग करके घर को मौसम अनुकूल बनाए रखना संभव है।

## ऐसा क्यों हुआ
मधुबनी जिले में खपरैल घरों के रिसाव और उनकी देखरेख में आने वाली समस्याओं के पीछे कई संरचनात्मक और व्यावहारिक कारण हैं।

- **नाजुक सामग्री:** पकी हुई मिट्टी से बनी खपरैल बहुत संवेदनशील होती है और थोड़ा सा दबाव पड़ने पर ही टूट जाती है।
- **बाहरी कारक:** छतों पर बंदरों की कूद-फांद और भारी चीजों का गिरना खपरैल के टूटने का सबसे प्रमुख कारण बनता है।
- **जटिल छत डिजाइन:** चारकोण आकार की छत की बनावट और बांस-लकड़ी का ढांचा होने से केवल अनुभवी मिस्त्री ही इसकी मरम्मत कर पाते हैं।
- **भट्टियों का बंद होना:** आधुनिक समय में मिट्टी की खपरैल बनाने वाली भट्टियां बंद होने से नई खपरैल पाना कठिन हो गया है।

## सवाल-जवाब

### 1. मधुबनी में खपरैल मकानों से पानी क्यों टपकने लगता है?
पकी मिट्टी की खपरैल नाजुक होती है और बंदरों के चढ़ने या भारी सामान गिरने से टूट जाती है, जिससे बारिश का पानी अंदर रिसने लगता है।

### 2. खपरैल की छत को जोड़ने के लिए किस चीज का इस्तेमाल किया जाता है?
स्थानीय मिस्त्री पक्के घर में सीमेंट की तरह खपरैल छत में मिट्टी का गीला घोल (गिलेवा) बनाकर बारीकी से खपरैल जोड़ते हैं।

### 3. गर्मी के मौसम में खपरैल के मकान क्यों बेहतर माने जाते हैं?
मिट्टी की पकी खपरैल प्राकृतिक रूप से मौसम के अनुकूल होती है, जिससे भीषण गर्मी में भी घर का तापमान ठंडा बना रहता है।

### 4. पुरानी खपरैल का एस्बेस्टस की छत पर क्या इस्तेमाल किया जाता है?
लोग एस्बेस्टस की छत के ऊपर पुरानी बची हुई खपरैल फैला देते हैं ताकि धूप से मकान गर्म न हो।

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