# मिट्टी के बिना वर्मी कंपोस्ट बैग में तैयार होगी हल्दी, उत्पादन डेढ़ गुना बढ़ने की उम्मीद

> जहानाबाद के कृषि विज्ञान केंद्र गंधार के वैज्ञानिकों ने वर्मी कंपोस्ट से भरी थैलियों में हल्दी उगाने की नई तकनीक पेश की है, जिससे पारंपरिक खेती की तुलना में डेढ़ गुना अधिक पैदावार मिल सकती है।

**Type:** article · **Category:** जीवनशैली · **Published:** 2026-10-15 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/lifestyle/mitti-ke-bina-vermicompost-baiga-men-taiyara-hogi-haldi-utpadana-derha-guna-barhane-ki-ummida-47682 · **Language:** Hindi
**Tags:** हल्दी की खेती, कृषि विज्ञान केंद्र, वर्मी कंपोस्ट, जहानाबाद, जैविक खेती, कृषि तकनीक

खेती को अधिक सुलभ और उत्पादक बनाने के लिए आधुनिक कृषि पद्धतियों में निरंतर नए प्रयोग किए जा रहे हैं। इसी क्रम में जहानाबाद में आयोजित कृषि प्रदर्शनी मेले के दौरान हल्दी उत्पादन का एक अनूठा मॉडल सामने आया है। इस नई व्यवस्था की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें फसल उगाने के लिए पारंपरिक मिट्टी की आवश्यकता पूरी तरह खत्म हो जाती है। जिस प्रकार मशरूम की खेती नियंत्रित वातावरण में प्लास्टिक बैग के भीतर की जाती है, ठीक उसी तर्ज पर अब वर्मी कंपोस्ट की मदद से हल्दी उगाने का सफल तरीका तैयार किया गया है।

## कृषि विज्ञान केंद्र गंधार का नया मॉडल
इस नवाचार को कृषि विज्ञान केंद्र गंधार के कृषि प्रसार एक्सपर्ट डॉक्टर निराला ने पेश किया है। उन्होंने बताया कि केंद्र में किसानों की लागत घटाने और पैदावार बढ़ाने के लिए लगातार नई तकनीकों पर अनुसंधान चलता रहता है। आम तौर पर किसान हल्दी की बुवाई सीधे खेतों की मिट्टी में करते आए हैं, लेकिन इस नए मॉडल ने साबित किया है कि जैविक खाद के आधार पर बिना मिट्टी भी इसकी बेहतर फसल ली जा सकती है। यह तकनीक न केवल जमीन की बाध्यता को खत्म करती है, बल्कि पैदावार की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में सुधार लाती है।

## मशरूम की तरह प्लास्टिक बैग में लटकेगी फसल
डॉक्टर निराला के अनुसार, इस तकनीक की कार्यप्रणाली काफी सरल और व्यावहारिक है। जिस तरह प्लास्टिक की थैलियों में वर्मी कंपोस्ट भरकर उन्हें हवा में लटकाकर मशरूम उपजाया जाता है, हल्दी के लिए भी वही प्रक्रिया अपनाई जाती है। किसान आसानी से वर्मी कंपोस्ट तैयार कर सकते हैं और फिर उसे मजबूत प्लास्टिक बैग में भर सकते हैं। इसके बाद इन बैगों में हल्दी के बीज रोपे जाते हैं। पौधों की देखभाल और सिंचाई की जरूरतें भी सामान्य खेती की तरह ही रहती हैं, जिससे किसानों को किसी जटिल प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता।

## डेढ़ गुना अधिक पैदावार और जगह की भारी बचत
इस जैविक विधि से हल्दी तैयार होने में उतना ही समय लगता है जितना सामान्य मिट्टी में लगता है, लेकिन लाभ कई गुना बढ़ जाते हैं। डॉक्टर निराला ने स्पष्ट किया कि वर्मी कंपोस्ट बैग में उगाई गई हल्दी से मिट्टी के मुकाबले 1.5 गुना अधिक उपज हासिल की जा सकती है। चूंकि इन थैलियों को वर्टिकल तरीके से या कम जगह में व्यवस्थित किया जा सकता है, इसलिए बहुत बड़े खेत की जरूरत नहीं पड़ती। साथ ही, खरपतवार निकालने और जुताई जैसी भारी शारीरिक मेहनत से भी मुक्ति मिल जाती है।

## ट्रायल और किसानों को प्रशिक्षण
जिले में इस विधि को बढ़ावा देने के लिए शुरुआती स्तर पर कुछ चुनिंदा स्थानों पर प्रायोगिक ट्रायल शुरू किए गए हैं। स्थानीय किसानों को इस नई तकनीक को अपनाने के लिए लगातार जागरूक किया जा रहा है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि इस मॉडल को अपनाकर कम लागत और सीमित संसाधन वाले किसान भी अपनी आय में उल्लेखनीय बढ़ोतरी कर सकते हैं। डॉक्टर निराला ने किसानों से अपील की है कि वे केंद्र पर आकर वैज्ञानिकों से इस पूरी तकनीक की बारीकियों को समझें और इसे अपने स्तर पर लागू करें।

## इसका आप पर असर
यह नई तकनीक छोटे और भूमिहीन किसानों को कम जगह में अधिक मुनाफा कमाने का व्यावहारिक विकल्प देती है।

- **भारत में:** बिना मिट्टी वर्मी कंपोस्ट में फसल उगाने का यह प्रयोग देश भर के लघु किसानों के लिए खेती की लागत घटाने में मददगार हो सकता है। इससे छत या छोटे बाड़ों में भी व्यावसायिक तौर पर हल्दी उगाई जा सकेगी।
- **जहानाबाद में:** स्थानीय किसान कृषि विज्ञान केंद्र गंधार जाकर इस मॉडल का प्रत्यक्ष प्रशिक्षण ले सकते हैं। ट्रायल के आधार पर इसे अपनाकर वे अपनी उपज में डेढ़ गुना वृद्धि कर अतिरिक्त आय कमा सकते हैं।
- **शारीरिक श्रम:** इसमें खेत जोतने और खरपतवार निकालने जैसी कड़ी मशक्कत की जरूरत नहीं पड़ती। इससे बुजुर्ग और पारिवारिक श्रम पर निर्भर छोटे किसान भी आसानी से प्रबंधन कर सकते हैं।
- **उत्पादकता:** सामान्य मिट्टी की तुलना में 1.5 गुना अधिक पैदावार दर्ज की जा सकती है। सीमित पूंजी वाले किसानों के लिए यह प्रति वर्ग फुट अधिकतम मुनाफा सुनिश्चित करता है।

## ऐसा क्यों हुआ
कृषि विज्ञान केंद्र गंधार के वैज्ञानिकों ने यह मॉडल इसलिए तैयार किया ताकि जमीन की कमी और पारंपरिक मिट्टी जनित बाधाओं को दूर किया जा सके। कृषि प्रदर्शनी मेले में इसका प्रदर्शन किसानों को आधुनिक तकनीकों से जोड़ने के उद्देश्य से किया गया।

- **सीमित जमीन और श्रम की समस्या:** पारंपरिक हल्दी की खेती में बड़े भूखंड, गहरी जुताई और लगातार निराई की आवश्यकता होती है। वैज्ञानिकों ने मशरूम की तर्ज पर थैलियों का उपयोग कर जगह और शारीरिक मेहनत दोनों को न्यूनतम करने का विकल्प खोजा।
- **जैविक पोषण की उपलब्धता:** वर्मी कंपोस्ट में पौधों के विकास के लिए सभी आवश्यक पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में होते हैं। मिट्टी रहित माध्यम में पोषक तत्वों का सीधा अवशोषण होने से पौधों को आदर्श वृद्धि मिलती है।
- **तकनीकी प्रसार की पहल:** जहानाबाद में आयोजित कृषि प्रदर्शनी का मुख्य उद्देश्य नवीनतम अनुसंधानों को किसानों के खेतों तक पहुंचाना था। इसी प्रयास के तहत वैज्ञानिकों ने प्रायोगिक परीक्षण पूरे होने के बाद इस मॉडल को सार्वजनिक रूप से प्रदर्शित किया।

## सवाल-जवाब

### 1. बिना मिट्टी हल्दी उगाने का यह नया मॉडल कहां प्रदर्शित किया गया?
यह मॉडल जहानाबाद में आयोजित कृषि प्रदर्शनी मेले में प्रदर्शित किया गया।

### 2. इस नई तकनीक को किस संस्थान ने विकसित और पेश किया है?
इसे कृषि विज्ञान केंद्र गंधार के कृषि प्रसार एक्सपर्ट डॉक्टर निराला और उनकी टीम ने प्रस्तुत किया है।

### 3. मिट्टी की जगह इस तकनीक में किसका इस्तेमाल किया जाता है?
इस तकनीक में मिट्टी के स्थान पर प्लास्टिक की थैलियों में वर्मी कंपोस्ट भरकर हल्दी के बीज बोए जाते हैं।

### 4. पारंपरिक मिट्टी के मुकाबले इस मॉडल में कितनी अधिक उपज मिल सकती है?
वैज्ञानिकों के अनुसार इस जैविक विधि से सामान्य मिट्टी की तुलना में 1.5 गुना यानी डेढ़ गुना तक अधिक उत्पादन मिल सकता है।

### 5. क्या इस विधि में फसल तैयार होने के समय में कोई बदलाव आता है?
नहीं, जितने समय में हल्दी की फसल मिट्टी में तैयार होती है, ठीक उतने ही समय में वर्मी कंपोस्ट बैग में भी तैयार हो जाती है।

### 6. क्या इस तकनीक के व्यावहारिक परीक्षण किए गए हैं?
हां, जिले में कुछ स्थानों पर ट्रायल के तौर पर इसे लगाया गया है और किसानों को प्रशिक्षण के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

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