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  "title": "पीली पत्तियों और सड़ी जड़ों से बचाएं कटहल के बाग, प्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह ने बताए 4 असरदार उपाय",
  "summary": "बिहार सहित कई राज्यों में बेमौसम बारिश और जलभराव के चलते कटहल के पेड़ों में जड़ सड़न का खतरा बढ़ा है। फल रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह ने पौधों को बचाने के लिए 4 वैज्ञानिक उपाय बताए हैं।",
  "content": "जलवायु परिवर्तन, बेमौसम बारिश और लंबे सूखे के बाद अचानक तेज जलभराव के कारण बिहार सहित कई राज्यों में कटहल के बाग गंभीर संकट से गुजर रहे हैं। 'पोषण सुरक्षा का पेड़' कहे जाने वाले कटहल के पौधों में इन दिनों जड़ सड़न और मुरझान रोग का प्रकोप तेजी से बढ़ा है। इस समस्या के कारण हरे-भरे पेड़ अचानक सूखने लगे हैं। फल रोग विशेषज्ञ प्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह के अनुसार, यदि समय रहते सही कदम न उठाए जाएं तो पूरा का पूरा बाग नष्ट हो सकता है।\n\nकटहल की जड़ों पर हमला करने वाले मुख्य कवक और कारण\nकटहल की खेती हाल के वर्षों में बिहार, झारखंड, बंगाल और केरल जैसे राज्यों में काफी तेजी से फैली है। हालांकि, मौसम के बदलते मिजाज, अनिश्चित बारिश और बढ़ते तापमान ने किसानों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। प्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह का कहना है कि जब लंबे सूखे के बाद अचानक भारी बारिश होती है और बागों में पानी ठहर जाता है, तो मिट्टी में फफूंद का संक्रमण बहुत तेजी से पनपता है। यह घातक समस्या मुख्य रूप से फाइटोफ्थोरा, फ्यूजेरियम और पिथियम नामक तीन हानिकारक फफूंद के कारण उत्पन्न होती है। ये फफूंद सीधे पौधों की जड़ों पर आक्रमण करते हैं, जिससे जड़ें अंदर से गलने लगती हैं और पौधे तक पोषण की आपूर्ति पूरी तरह बंद हो जाती है।\n\nजड़ सड़न और मुरझान रोग की पहचान के प्रमुख लक्षण\nबागवानों को अपने कटहल के पेड़ों में इस बीमारी के शुरुआती संकेतों पर पैनी नजर रखनी चाहिए ताकि समय पर उपचार किया जा सके। प्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह के अनुसार, इस बीमारी के शुरुआती लक्षणों में पौधों की बढ़वार अचानक रुक जाती है और पत्तियां हल्की पीली पड़ने लगती हैं। धीरे-धीरे पत्तियों के किनारे सूखने लगते हैं और वे गिरना शुरू हो जाती हैं। इसके अलावा, पेड़ पर लगने वाले फल बहुत छोटे रह जाते हैं। यदि संक्रमण का संदेह हो और पेड़ के पास की मिट्टी खोदकर जड़ों की जांच की जाए, तो वे भूरी या काली पड़ी हुई और पूरी तरह सड़ी मिलती हैं। इन सड़ी हुई जड़ों से तेज बदबू भी आती है। साथ ही, पौधे के मुख्य तने के आसपास की छाल ढीली होकर बेहद आसानी से निकलने लगती है, जो इस रोग के गंभीर स्तर तक पहुंचने का स्पष्ट संकेत है।\n\nप्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह द्वारा सुझाए गए 4 वैज्ञानिक बचाव उपाय\nकटहल के बागों को इस तबाही से बचाने के लिए प्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह ने चार महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपाय साझा किए हैं\n\n• जल निकासी की उचित व्यवस्था: कटहल का पौधा तने के आसपास जलभराव को बिल्कुल सहन नहीं कर सकता। इसलिए नए बाग हमेशा ऊंची मेड़ या क्यारी पर ही स्थापित करने चाहिए। मानसून के दौरान यदि खेत में अतिरिक्त पानी जमा हो, तो उसे तुरंत बाहर निकालने का प्रबंध करें। सिंचाई के लिए ड्रिप प्रणाली का उपयोग करें और पानी को हमेशा तने से सुरक्षित दूरी पर रखें।\n• जैविक कवकनाशी का प्रयोग: जड़ों को स्वस्थ रखने और हानिकारक फफूंद को खत्म करने के लिए सड़ी हुई गोबर की खाद में ट्राइकोडर्मा और बैसिलस जैसे मित्र कवकनाशी मिलाकर पौधों के जड़ क्षेत्र में डालें। यह मिश्रण नुकसानदायक फफूंद को नष्ट कर जड़ों को नई मजबूती देता है।\n• वार्षिक कंपोस्ट और जैविक खाद: हर साल पेड़ों की जड़ों में पर्याप्त मात्रा में जैविक खाद और कंपोस्ट डालें। इससे मिट्टी में उपयोगी जीवाणुओं की संख्या बढ़ती है, जिससे मिट्टी की उर्वरता सुधरती है और पौधों की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है।\n• रसायनों से ड्रेंचिंग (अंतिम विकल्प): यदि बीमारी बाग में बहुत अधिक फैल चुकी हो और जैविक उपायों से नियंत्रित न हो रही हो, तो मेटालैक्सिल + मैंकोजेब या फॉसेटाइल-एएल जैसी फफूंदनाशक दवाओं के घोल से जड़ क्षेत्र की ड्रेंचिंग करें। हालांकि, प्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह ने स्पष्ट किया है कि रासायनिक दवाओं का इस्तेमाल केवल अंतिम उपाय के रूप में ही किया जाना चाहिए।\n\nइसका आप पर असर\nभारत में: कटहल उगाने वाले किसान बारिश और जलभराव से पहले बागों में जल निकासी और मिट्टी का उपचार करके पेड़ों को सूखने से बचा सकते हैं।\n\nबिहार, झारखंड, बंगाल और केरल में: लंबे सूखे के बाद भारी बारिश का सामना कर रहे बागवान अपनी फसलों में पीली पत्तियों और जड़ों की तुरंत जांच करें ताकि बड़े नुकसान से बचा जा सके।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. कटहल में जड़ सड़न और मुरझान रोग का मुख्य कारण क्या है?\nयह बीमारी अनिश्चित बारिश, जलभराव और तापमान वृद्धि के कारण मिट्टी में पनपने वाले फाइटोफ्थोरा, फ्यूजेरियम और पिथियम फफूंद के हमले से होती है।\n\n2. कटहल के पेड़ में इस बीमारी के शुरुआती लक्षण क्या हैं?\nशुरुआती लक्षणों में पत्तियां हल्की पीली पड़कर किनारों से सूखने और गिरने लगती हैं, पौधों का विकास रुक जाता है और फल छोटे रह जाते हैं।\n\n3. सड़ी जड़ों की पहचान कैसे की जा सकती है?\nपौधे के आसपास की मिट्टी खोदने पर जड़ें भूरी या काली और सड़ी हुई मिलती हैं, जिनसे बदबू आती है और तने के पास की छाल आसानी से निकलने लगती है।\n\n4. कटहल की जड़ों को फफूंद से बचाने के लिए कौन से जैविक कवकनाशी प्रयोग करें?\nसड़ी हुई गोबर की खाद में ट्राइकोडर्मा और बैसिलस मिलाकर जड़ों में डालने से हानिकारक फफूंद नष्ट होती है और जड़ें मजबूत बनती हैं।\n\n5. कटहल के बागों में रासायनिक दवाओं का प्रयोग कब करना चाहिए?\nप्रोफेसर डॉ. एस.के. सिंह के अनुसार रासायनिक कवकनाशी जैसे मेटालैक्सिल + मैंकोजेब या फॉसेटाइल-एएल से ड्रेंचिंग केवल अंतिम विकल्प के रूप में ही करनी चाहिए।",
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  "category": "जीवनशैली",
  "publishedAt": "2026-08-21",
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    "कटहल की खेती",
    "जड़ सड़न रोग",
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