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  "title": "सहारनपुर में दिव्यांगों को आत्मनिर्भर बनाने की अनोखी पहल, सीख रहे डिजाइनर मोमबत्तियां बनाना",
  "summary": "सहारनपुर के शेखपुरा कदीम में दिव्यांगों को निशुल्क फैंसी और डिजाइनर कैंडल बनाने की ट्रेनिंग दी जा रही है, ताकि वे घर बैठे कमाई कर सकें.",
  "content": "सहारनपुर में दिव्यांगजनों को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने और उन्हें स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध कराने के मकसद से एक खास प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाया जा रहा है. इस कार्यक्रम के जरिए दिव्यांग पुरुषों और महिलाओं को बिना किसी शुल्क के आधुनिक और फैंसी मोमबत्तियां तैयार करने का व्यावहारिक कौशल सिखाया जा रहा है, जिससे वे अपने पैरों पर खड़े होकर आत्मनिर्भर बन सकें.\n\nशेखपुरा कदीम में निशुल्क प्रशिक्षण का आयोजन\nयह प्रशिक्षण कार्यक्रम गांव शेखपुरा कदीम में आयोजित किया गया है. पंजाब नेशनल बैंक ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान यानी आरएसईटीआई (RSETI) और इनेबल इंडिया की संयुक्त पहल से दिव्यांगों के लिए यह वर्कशॉप संचालित हो रही है. अमित कुमार चौबे ने इस बारे में जानकारी देते हुए स्पष्ट किया कि इस पहल का मुख्य उद्देश्य दिव्यांगजनों को अपने हुनर के दम पर आजीविका कमाने के सक्षम बनाना है.\n\nसाधारण मोमबत्तियों से आगे, डिजाइनर और कलात्मक कैंडल का निर्माण\nइस कार्यशाला में प्रतिभागियों को केवल पारंपरिक या साधारण मोमबत्तियां बनाना ही नहीं सिखाया जा रहा, बल्कि वे सजावटी और कलात्मक कैंडल भी तैयार कर रहे हैं. प्रतिभागी यहां फूल, बॉल्स और कपल्स जैसे कई आकर्षक डिजाइनों की मोमबत्तियां बनाना सीख रहे हैं. इन खूबसूरत सजावटी मोमबत्तियों की होम डेकोरेशन और विभिन्न निजी व सार्वजनिक आयोजनों में काफी मांग रहती है.\n\nहोटलों और गिरजाघरों में फैंसी कैंडल की भारी मांग\nप्रशिक्षक कुसुम कश्यप ने बताया कि कार्यशाला के दौरान प्रतिभागियों को अलग-अलग किस्म के वैक्स और जेल का इस्तेमाल करके बेहतरीन डिजाइन बनाना सिखाया जा रहा है. कुसुम कश्यप के अनुसार, ऐसी फैंसी मोमबत्तियों की मांग सामान्य घरों के अलावा गिरजाघरों, होटलों और रेस्टोरेंट में बड़े पैमाने पर देखने को मिलती है. इस कला को पूरी तरह सीखकर प्रतिभागी खुद का व्यवसाय शुरू करने की स्थिति में आ सकते हैं.\n\nहुनर से बदली सोच, व्यवसाय शुरू करने का बढ़ा आत्मविश्वास\nप्रशिक्षण सत्र में भाग ले रहीं रहमानी ने अपना अनुभव साझा करते हुए बताया कि पहले उनकी सोच थी कि मोमबत्ती बस एक या दो सामान्य प्रकार की ही होती है और उनकी कीमत भी बाजार में बेहद कम मिलती है. हालांकि, इस ट्रेनिंग में शामिल होने के बाद उन्होंने तरह-तरह की डिजाइनर कैंडल तैयार करना सीखा. अब उन्हें पूरा भरोसा हो रहा है कि इस हुनर को एक लाभकारी कारोबार के रूप में आगे ले जाया जा सकता है.\n\nघर बैठे काम और ऑनलाइन बिक्री के गुर भी सिखाए जा रहे\nअमित कुमार चौबे ने आगे बताया कि इस प्रशिक्षण का एक बड़ा लक्ष्य यह भी है कि दिव्यांग लोग घर पर रहकर ही अपना काम कर सकें और आय अर्जित करें. मोमबत्ती निर्माण की बारीकियों के साथ-साथ प्रतिभागियों को उत्पादों की ऑनलाइन बिक्री करने की प्रक्रिया भी समझाई जा रही है. इससे वे अपने तैयार उत्पादों को सीधे व्यापक बाजार तक पहुंचाकर अपने नए हुनर को एक सफल व्यवसाय में तब्दील कर पाएंगे.\n\nइसका आप पर असर\nयह प्रशिक्षण दिव्यांगजनों को घर बैठे आत्मनिर्भर बनने और नियमित आय अर्जित करने का सीधा माध्यम प्रदान करता है.\n\n• भारत में: देश भर के दिव्यांगजनों और ग्रामीण युवाओं के लिए यह कार्यक्रम दिखाता है कि निशुल्क सरकारी व गैर-सरकारी प्रशिक्षण संस्थानों से जुड़कर पारंपरिक उत्पादों को आधुनिक रूप देकर स्वरोजगार पाया जा सकता है. ऐसे कौशल से लोग बिना बड़े निवेश के लघु उद्योग और ऑनलाइन बिक्री शुरू कर सकते हैं.\n• सहारनपुर में: सहारनपुर और आसपास के गांवों के दिव्यांग प्रतिभागी इस हुनर को सीखकर स्थानीय होटलों, गिरजाघरों और त्योहारों के बाजार में अपने उत्पाद सीधे बेच सकते हैं. इससे क्षेत्र के कमजोर वर्ग के परिवारों को आर्थिक संबल मिलेगा और उन्हें रोजगार के लिए बाहर जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी.\n• घर बैठे काम करने की सुविधा: मोमबत्ती निर्माण का काम घर के भीतर ही सीमित स्थान में आसानी से किया जा सकता है. इससे चलने-फिरने में असमर्थ लोगों को यात्रा की परेशानी से मुक्ति मिलती है और वे अपनी सुविधानुसार काम कर सकते हैं.\n• ऑनलाइन बिक्री का दायरा: डिजिटल प्लेटफॉर्म और ई-कॉमर्स की सीख मिलने से प्रतिभागी अपने उत्पाद स्थानीय सीमाओं से बाहर भी बेच सकेंगे. इससे उनकी कमाई का दायरा केवल नजदीकी बाजारों तक सीमित नहीं रहेगा.\n\nऐसा क्यों हुआ\nदिव्यांगजनों को समाज की मुख्यधारा से जोड़ने और आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रदान करने के उद्देश्य से यह विशेष कार्यशाला आयोजित की गई है.\n\n• स्वरोजगार का विस्तार: दिव्यांग व्यक्तियों के लिए पारंपरिक नौकरियों में आने वाली आवाजाही और बुनियादी ढांचे की बाधाओं को दूर करने के लिए घरेलू स्वरोजगार की आवश्यकता महसूस की गई. घर पर बैठकर काम करने की संभावना ने इस पहल को जन्म दिया.\n• संस्थानों का साझा सहयोग: पंजाब नेशनल बैंक के ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान और इनेबल इंडिया ने मिलकर ग्रामीण क्षेत्रों में हुनर विकास को बढ़ावा देने के लिए संसाधन जुटाए. दोनों संगठनों की साझेदारी ने इस निशुल्क प्रशिक्षण को संभव बनाया.\n• सजावटी बाजार में बढ़ती मांग: पारंपरिक मोमबत्तियों की तुलना में आधुनिक फैंसी, जेल और फ्लोरल कैंडल की मांग होटलों, रेस्टोरेंट और घरेलू सजावट में लगातार बढ़ रही है. इस बाजार क्षमता को देखते हुए प्रतिभागियों को प्रीमियम डिजाइन सिखाने का निर्णय लिया गया.\n\nसवाल-जवाब\n\n1. सहारनपुर में दिव्यांगों के लिए यह प्रशिक्षण कहां आयोजित किया जा रहा है?\nयह निशुल्क प्रशिक्षण सहारनपुर जिले के गांव शेखपुरा कदीम में आयोजित किया जा रहा है.\n\n2. यह मोमबत्ती प्रशिक्षण कार्यक्रम किन संस्थानों द्वारा चलाया जा रहा है?\nयह कार्यक्रम पंजाब नेशनल बैंक ग्रामीण स्वरोजगार प्रशिक्षण संस्थान (आरएसईटीआई) और इनेबल इंडिया के संयुक्त सहयोग से चलाया जा रहा है.\n\n3. कार्यशाला में प्रतिभागियों को किस तरह की मोमबत्तियां बनाना सिखाया जा रहा है?\nप्रतिभागियों को सामान्य मोमबत्तियों के अलावा फूल, बॉल्स और कपल्स जैसे कई आकर्षक डिजाइनों की फैंसी व जेल कैंडल बनाना सिखाया जा रहा है.\n\n4. ट्रेनर कुसुम कश्यप के अनुसार इन फैंसी मोमबत्तियों की मांग कहां अधिक रहती है?\nकुसुम कश्यप के अनुसार इन सजावटी और फैंसी मोमबत्तियों की मांग गिरजाघरों, होटलों और रेस्टोरेंट में काफी अधिक रहती है.\n\n5. मोमबत्ती बनाने के अलावा प्रतिभागियों को और क्या सिखाया जा रहा है?\nमोमबत्ती निर्माण के अलावा प्रतिभागियों को तैयार उत्पादों की ऑनलाइन बिक्री करने की प्रक्रिया भी सिखाई जा रही है.\n\nप्रेरणा और सबक\nयह पहल सिखाती है कि सही मार्गदर्शन और कौशल से कोई भी व्यक्ति अपनी शारीरिक चुनौतियों को पार कर आत्मनिर्भर बन सकता है.\n\n• शारीरिक सीमाओं से ऊपर हुनर: दिव्यांग प्रतिभागियों ने दिखाया कि लगन और सही प्रशिक्षण के जरिए शारीरिक बाधाओं के बावजूद उच्च कोटि का कलात्मक काम सीखा जा सकता है. प्रतिभा और मेहनत किसी भी शारीरिक कमी से कहीं अधिक शक्तिशाली होती है.\n• सोच बदलने से खुलते हैं नए रास्ते: प्रतिभागी रहमानी की तरह अपनी सीमित धारणाओं को तोड़कर नए हुनर सीखने से सामान्य काम भी एक बड़े व्यावसायिक अवसर में बदल जाता है. सीखने की इच्छा व्यक्ति के लिए नए आर्थिक रास्ते तैयार करती है.\n• पारंपरिक काम में आधुनिक तकनीक का मेल: साधारण मोमबत्ती बनाने के साथ ऑनलाइन बिक्री की रणनीति सीखने से काम को आधुनिक और प्रतिस्पर्धी बनाया जा सकता है. बदलते समय के साथ अपने कौशल में नई तकनीक जोड़ना सफलता की कुंजी है.",
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    "दिव्यांग स्वरोजगार",
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