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  "type": "article",
  "title": "सतना के रामपुर में 100 साल पुरानी खुरचन की महक, 3 किलोमीटर हाईवे पर 150 दुकानों का मीठा कारोबार",
  "summary": "मध्य प्रदेश के सतना जिले स्थित रामपुरबघेलन में आजादी से पहले की पारंपरिक मिठाई खुरचन आज भी बेहद लोकप्रिय है। नेशनल हाईवे किनारे तीन किलोमीटर में फैली 150 से अधिक दुकानों से यह स्वाद विदेशों तक पहुंच रहा है।",
  "content": "मध्य प्रदेश के सतना जिले में स्थित रामपुरबघेलन की सड़कों से गुजरने वाले हर मुसाफिर को एक खास सोंधी महक बरबस अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। यह खुशबू शुद्ध दूध से तैयार होने वाली मशहूर पारंपरिक मिठाई खुरचन की है। रामपुर इलाके में यह केवल एक मिष्ठान नहीं, बल्कि एक सदी से भी ज्यादा पुरानी समृद्ध पाक परंपरा की जीवंत पहचान बन चुकी है। धीमी आंच पर कड़ाहियों में उबलते दूध की मलाईदार परतों से तैयार होने वाला यह स्वाद आज स्थानीय गलियारों से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी धाक जमा चुका है।\n\nनेशनल हाईवे पर फैला 3 किलोमीटर लंबा अनोखा बाजार\nरामपुरबघेलन से होकर गुजरने वाले नेशनल हाईवे के किनारे लगभग 3 किलोमीटर के दायरे में खुरचन का एक पूरा बाजार विकसित हो चुका है। आजादी से पहले शुरू हुए इस कारोबार की महक आज भी वैसी ही बरकरार है। वर्तमान समय में इस राजमार्ग के दोनों तरफ करीब 150 दुकानें कतारबद्ध तरीके से सजी हुई हैं। इन दुकानों पर दिन-रात खुरचन तैयार की जाती है और आने-जाने वाले यात्री यहां रुककर इस पारंपरिक स्वाद का आनंद लेते हैं। सड़क किनारे सजी इन दुकानों के चलते यह पूरा इलाका खुरचन मार्केट के नाम से अपनी पहचान बना चुका है।\n\nतीन पीढ़ियों का तजुर्बा और टीन शेड की छोटी दुकान\nरामपुरबघेलन क्षेत्र के अंतर्गत ग्राम नेमुआ वार्ड नंबर 5 के निवासी कमलेश पांडे इस पुश्तैनी मिठाई निर्माण के प्रमुख चेहरों में से एक हैं। वह पिछले 40 से भी अधिक वर्षों से लगातार खुरचन बनाने और बेचने का काम कर रहे हैं। कमलेश पांडे अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी हैं, जो इस पारंपरिक कारोबार को पूरी निष्ठा से आगे बढ़ा रही है। उन्होंने खुरचन तैयार करने का यह हुनर सीधे अपने माता-पिता से सीखा था।\n\nअपने काम के शुरुआती दिनों में कमलेश पांडे ने एक पक्का ढाबा स्थापित करके खुरचन बेचना शुरू किया था। समय बीतने के साथ उन्होंने भी हाईवे पर अन्य स्थानीय कारीगरों की तरह एक टीन शेड वाली दुकान बना ली। आज वह अपनी उसी ग्रामीण टीन शेड की दुकान पर बैठकर प्रतिदिन कम से कम 5 से 10 किलो खुरचन आसानी से बेच लेते हैं। इसके अतिरिक्त शादी-ब्याह और अन्य आयोजनों के लिए मिलने वाले विशेष आर्डर की आपूर्ति अलग से की जाती है। कमलेश पांडे द्वारा बनाई गई खुरचन का स्वाद अमेरिका तक पहुंचता है, जबकि पूरे रामपुर बाजार से यह मिठाई भारत के विभिन्न राज्यों समेत दुनिया के कई मुल्कों में भेजी जाती है।\n\nधीमी आंच पर कड़ाहियों में दूध की मलाई कुरेदने की विधि\nखुरचन तैयार करने की पूरी विधि बेहद धैर्य और पारंपरिक कारीगरी पर आधारित है। इसे बनाने के लिए सबसे पहले एक कतार में 6 कड़ाहियों को एक साथ भट्टी की धीमी आंच पर रखा जाता है। इसके बाद प्रत्येक कड़ाही के अंदर एक-एक पाव शुद्ध दूध डाला जाता है। जैसे-जैसे धीमी आंच पर दूध खौलता है, उसकी ऊपरी सतह पर मलाई की गाढ़ी परत जमने लगती है।\n\nकारीगर बड़ी कुशलता से उस मलाईदार परत को कड़ाही के भीतरी किनारों पर चिपकाते चले जाते हैं। जब किनारों पर पर्याप्त मलाई एकत्र हो जाती है, तब खुरचनी नामक विशेष औजार की मदद से उसे कुरेदकर अलग कर लिया जाता है। कुरेदी गई इस मलाई में हल्की शक्कर मिलाई जाती है। इस प्रक्रिया को कड़ाही में बार-बार दोहराया जाता है, जिसमें मलाई की नई परतों को खुरच-खुरचकर एक के ऊपर एक सलीके से रखा जाता है और बीच-बीच में शक्कर का छिड़काव किया जाता है।\n\nरोल और चौकोर टुकड़ों में बिक्री, जानें दोनों के दाम\nबाजार में खुरचन मुख्य रूप से दो अलग-अलग स्वरूपों में ग्राहकों के लिए उपलब्ध कराई जाती है, जिनकी कीमतें भी उनकी बनावट के आधार पर तय हैं\n\n• रोल वाली खुरचन: इस किस्म को तैयार करने के लिए मलाई की सभी परतों को एक साथ सहेजकर बेलनाकार रोल का आकार दिया जाता है। बाजार में रोल वाली खुरचन की कीमत 600 रुपये प्रति किलो है।\n• पीसेस वाली खुरचन: इस प्रकार में मलाई की तहों को एक के ऊपर एक जमाकर चौकोर टुकड़ों में काटा जाता है। यह पीसेस वाली खुरचन 400 रुपये प्रति किलो के भाव से बेची जाती है।\n\nमहीने में 60 हजार की आय और करोड़ों का ग्रामीण व्यापार\nखुरचन का यह पुश्तैनी काम सतना जिले के रामपुरबघेलन इलाके की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत रीढ़ बन चुका है। हाईवे पर स्थित हर छोटी और मझोली दुकान प्रतिदिन औसतन 5 किलो खुरचन आसानी से बेच लेती है। इस सामान्य दैनिक बिक्री से एक साधारण दुकानदार को हर महीने करीब 60,000 रुपये तक की आमदनी हो जाती है। वहीं क्षेत्र के कई बड़े व्यापारियों का वार्षिक कारोबार करोड़ों रुपये के स्तर को पार कर चुका है।\n\nरामपुर और उसके आसपास के गांवों के 150 से अधिक परिवार प्रत्यक्ष रूप से इस मिठाई निर्माण और बिक्री से जुड़े हैं। पूरे क्षेत्र में हजारों लोगों की आजीविका इसी कारोबार पर निर्भर करती है। लगातार बढ़ती मांग के कारण स्थानीय डेयरी उद्योग भी तेजी से फल-फूल रहा है, जिससे पशुपालकों और दूध उत्पादक किसानों को भी नियमित आर्थिक संबल मिल रहा है।\n\nइसका आप पर असर\nमध्य प्रदेश के सतना स्थित रामपुरबघेलन का यह खुरचन बाजार स्थानीय कारीगरों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए पारंपरिक शुद्ध स्वाद और आर्थिक सुरक्षा का संगम है।\n\n• भारत में: शुद्ध मलाई से तैयार होने वाली पारंपरिक भारतीय मिठाइयों की मांग देश और विदेश में तेजी से बढ़ रही है। खरीदार प्रामाणिक स्वाद के लिए 400 से 600 रुपये प्रति किलो के भाव से इसे सीधे मंगवा रहे हैं।\n• सतना और रामपुर में: स्थानीय स्तर पर 150 से अधिक परिवारों को सड़क किनारे दुकान लगाकर प्रति माह 60,000 रुपये तक की स्थिर आमदनी हो रही है। इस मिष्ठान उद्योग के लगातार चलने से क्षेत्र के पशुपालकों और डेयरी किसानों से दूध की निरंतर खरीद सुनिश्चित रहती है।\n• यात्रियों के लिए: नेशनल हाईवे से गुजरने वाले मुसाफिरों को बिना किसी मिलावट के ताजा और पारंपरिक खुरचन आसानी से उपलब्ध हो जाती है। यात्री अपनी पसंद के अनुसार रोल वाली या टुकड़ों वाली किस्म चुन सकते हैं।\n• स्थानीय रोजगार: मिठाई निर्माण, दूध आपूर्ति और पैकेजिंग के जरिए हजारों स्थानीय युवाओं और ग्रामीणों को अपने ही क्षेत्र में नियमित रोजगार मिल रहा है। इससे ग्रामीणों को आजीविका की तलाश में बड़े शहरों की ओर पलायन नहीं करना पड़ता।\n\nऐसा क्यों हुआ\nरामपुरबघेलन में खुरचन का यह व्यापक बाजार 100 से अधिक वर्षों से पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही अनूठी निर्माण विधि और नेशनल हाईवे पर मुसाफिरों की निरंतर आवाजाही के कारण स्थापित हुआ है।\n\n• आजादी से पहले की पाक परंपरा: स्थानीय परिवारों ने धीमी आंच पर कड़ाहियों में दूध की मलाई को कुरेदकर जमाने की पारंपरिक विधि को एक सदी से अधिक समय तक बिना बदलाव के जीवित रखा। शुद्ध दूध और बुनियादी सामग्री पर आधारित इस रेसिपी ने इसे एक खास पहचान दी।\n• नेशनल हाईवे की भौगोलिक स्थिति: तीन किलोमीटर लंबे राजमार्ग पर दुकानों की मौजूदगी ने वाहनों से आने-जाने वाले यात्रियों के लिए खरीदारी को बेहद सुगम बना दिया। इसी निरंतर ग्राहक प्रवाह ने इसे एक स्थाई बाजार का रूप दिया।\n• पारिवारिक कौशल का हस्तांतरण: कारीगरों ने इस हुनर को अपने माता-पिता से सीखा और तीसरी पीढ़ी तक सफलतापूर्वक पहुंचाया। कारीगरों की निष्ठा और प्रामाणिक स्वाद के चलते इसकी मांग अमेरिका सहित अन्य देशों तक फैल गई।\n• मजबूत स्थानीय डेयरी नेटवर्क: आसपास के गांवों में दूध का प्रचुर उत्पादन इस पूरे उद्योग के लिए निरंतर कच्चा माल उपलब्ध कराता रहा। पर्याप्त दूध की आपूर्ति ने 150 दुकानों के प्रतिदिन के संचालन को आसान बनाया।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. मध्य प्रदेश के रामपुर में खुरचन का बाजार कितना पुराना है?\nरामपुरबघेलन में खुरचन बनाने की यह परंपरा 100 साल से भी अधिक पुरानी है, जो देश की आजादी के पहले से चली आ रही है।\n\n2. रामपुर में खुरचन की कितनी दुकानें हैं और यह बाजार कहां फैला है?\nयह बाजार नेशनल हाईवे पर लगभग 3 किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ है, जहां करीब 150 दुकानें सजी हुई हैं।\n\n3. खुरचन बनाने की पारंपरिक विधि क्या है?\nधीमी आंच पर रखी 6 कड़ाहियों में एक-एक पाव दूध डालकर खौलाया जाता है, फिर किनारों पर जमने वाली मलाई को खुरचनी से कुरेदकर हल्की शक्कर के साथ परतों में जमाया जाता है।\n\n4. बाजार में खुरचन के कौन से प्रकार मिलते हैं और उनके दाम क्या हैं?\nबाजार में रोल वाली खुरचन 600 रुपये प्रति किलो और चौकोर टुकड़ों (पीसेस) वाली खुरचन 400 रुपये प्रति किलो के भाव से मिलती है।\n\n5. कमलेश पांडे कौन हैं और इस कारोबार में उनका कितना अनुभव है?\nकमलेश पांडे ग्राम नेमुआ वार्ड नंबर 5 के निवासी हैं, जो अपने परिवार की तीसरी पीढ़ी के रूप में पिछले 40 से अधिक वर्षों से खुरचन बना रहे हैं।\n\n6. खुरचन की दुकान से एक साधारण दुकानदार को हर महीने कितनी कमाई हो जाती है?\nरोजाना कम से कम 5 किलो खुरचन बेचने वाली छोटी या मझोली दुकान से महीने में 60 हजार रुपये तक की कमाई आसानी से हो जाती है।\n\nप्रेरणा और सबक\nरामपुरबघेलन के कारीगरों की यह कहानी साबित करती है कि पारंपरिक हुनर, सादगी और निष्ठा के बल पर गांव के टीन शेड से भी अंतरराष्ट्रीय स्तर का सफल उद्यम खड़ा किया जा सकता है।\n\n• पारंपरिक ज्ञान का सम्मान: कमलेश पांडे ने अपने माता-पिता से सीखी पुश्तैनी विधि को 40 वर्षों तक पूरी ईमानदारी से जारी रखा। अपनी सांस्कृतिक और पारिवारिक जड़ों से जुड़े रहकर भी बड़ा मुकाम हासिल किया जा सकता है।\n• सादगी में सफलता: बड़े तामझाम या महंगे शोरूम के बजाय सड़क किनारे टीन शेड की छोटी सी दुकान से काम करके उन्होंने हर महीने 60,000 रुपये की कमाई और विदेशों तक ग्राहक बनाए। संसाधनों की कमी कभी हुनर के आड़े नहीं आती।\n• सामूहिक विकास की मिसाल: एक मिठाई के कारोबार ने 150 परिवारों और क्षेत्र के हजारों डेयरी किसानों को आर्थिक रूप से सशक्त किया। जब कोई स्थानीय उत्पाद प्रसिद्ध होता है, तो पूरा समुदाय साथ मिलकर आगे बढ़ता है।",
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  "category": "जीवनशैली",
  "publishedAt": "2026-09-24",
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