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  "type": "article",
  "title": "सतना की पारंपरिक रसोई से सीखें रेरुया का देसी भर्ता, सादी गिलकी को मिलेगा नया बघेली स्वाद",
  "summary": "अगर रोजाना की हरी सब्जियों से ऊब चुके हैं, तो सतना की मीना द्विवेदी द्वारा बताई गई विधि से रेरुया और भुने लहसुन का पारंपरिक बघेली भर्ता मिनटों में तैयार कर सकते हैं।",
  "content": "दैनिक भोजन में अगर बार-बार वही पारंपरिक हरी सब्जियां खाकर मन भर गया हो, तो रसोई में मौजूद सामान्य सामग्री से ही कुछ नया और लजीज बनाया जा सकता है। मध्य प्रदेश के बघेलखंड अंचल में गिलकी यानी रेरुया को एक बेहद खास अंदाज में पकाया जाता है, जिसे रेरुया का भर्ता कहते हैं। आमतौर पर तरोई या गिलकी की पतली रसेदार सब्जी हर किसी को पसंद नहीं आती, लेकिन जब इसे पारंपरिक बघेली शैली में भूना जाता है, तो इसका जायका पूरी तरह बदल जाता है। सतना निवासी मीना द्विवेदी ने इस पारंपरिक और पौष्टिक व्यंजन को झटपट तैयार करने की सरल विधि साझा की है। इस रेसिपी की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें किसी भारी-भरकम मसाले या जटिल प्रक्रिया की जरूरत नहीं होती, बल्कि बहुत कम समय और बेहद सीमित रसोई सामग्रियों के साथ यह तुरंत तैयार हो जाती है।\n\nग्रामीण खानपान में रेरुया का पारंपरिक महत्व\nविंध्य और बघेलखंड के ग्रामीण इलाकों में रेरुया एक बहुत ही सामान्य और सुलभ सब्जी है, जिसे अन्य क्षेत्रों में गिलकी या तरोई के नाम से भी पहचाना जाता है। गांव-देहात के घरों के आसपास की बाड़ियों और खेतों की मेड़ों पर यह बेल आसानी से फलती-फूलती है। स्थानीय संस्कृति में इस सब्जी का उपयोग केवल रोजमर्रा की कढ़ी या तरीदार सब्जी तक सीमित नहीं रहा है, बल्कि पीढ़ियों से इसे कलौंजी और भरते के रूप में भी चाव से बनाया जाता रहा है। साधारण तरीके से पकाई गई गिलकी को बच्चे और युवा अक्सर नापसंद कर देते हैं, लेकिन जब इसे भूनकर भर्ते का रूप दिया जाता है, तो इसका सौंधापन हर किसी को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। यह तरीका न केवल भोजन में विविधता लाता है, बल्कि हरी सब्जी को बिना किसी ना-नुकर के खाने का एक स्वादिष्ट माध्यम भी बन जाता है।\n\nलहसुन के साथ रेरुया को भूनने का पहला चरण\nइस देहाती भर्ते को तैयार करने की शुरुआत सबसे पहले ताजी और मुलायम रेरुया के चयन से होती है। सब्जी को अच्छी तरह धोकर साफ कर लेने के बाद एक खास बघेली तकनीक अपनाई जाती है। रेरुया की सतह पर छोटे चीरे लगाकर या सीधे ही उसमें साबुत लहसुन की कलियों को चारों तरफ अंदर तक गाड़ दिया जाता है। ऐसा करने से जब सब्जी आंच पर पकती है, तो लहसुन भी अंदर ही अंदर अपनी खुशबू और तेल छोड़ते हुए अच्छी तरह भुन जाता है। इसके बाद रेरुया को सीधे चूल्हे की अंगीठी या गैस की धीमी आंच पर रखा जाता है। इसे चारों तरफ से तब तक सेंका जाता है जब तक कि बाहरी परत पूरी तरह भुन न जाए और अंदर का गूदा अच्छी तरह गल न जाए। आंच पर सीधे भूनने की यही प्रक्रिया इस व्यंजन को एक अनोखा स्मोकी और देसी स्वाद प्रदान करती है।\n\nछिलका उतारने और पारंपरिक रूप से मसलने की विधि\nजब रेरुया चारों तरफ से एकसार पक जाए, तो उसे आंच से उतारकर थोड़ी देर के लिए ठंडा होने के लिए छोड़ देना चाहिए। हल्का ठंडा हो जाने के बाद उसकी जली हुई बाहरी त्वचा या छिलके को सावधानीपूर्वक उतार लिया जाता है। इसके पश्चात छिले हुए हिस्से को एक खुले मुंह वाले बर्तन में निकाल लिया जाता है। इस भुनी हुई सब्जी में अंदर से पका हुआ लहसुन पहले से मौजूद होता है, जो बेहद नरम हो चुका होता है। अब इसमें स्वादानुसार सादा नमक, बारीक कटी या कुटी हुई मिर्च और ऊपर से ताजी हरी धनिया की पत्तियां मिलाई जाती हैं। इस पूरी सामग्री को किसी चम्मच, मिक्सी या कांटे से मिलाने के बजाय पारंपरिक तरीके से हाथों से अच्छी तरह मसला जाता है। हाथों से मसलने पर गिलकी, भुना लहसुन और मसाले आपस में एकरस हो जाते हैं और चंद मिनटों में खुशबूदार देसी भर्ता तैयार हो जाता है।\n\nटमाटर के साथ बढ़ाएं अतिरिक्त चटपटापन\nस्वाद के शौकीन लोग अगर इस भर्ते में थोड़ा तीखापन और खटास जोड़ना चाहते हैं, तो इसमें भुना हुआ टमाटर भी शामिल किया जा सकता है। इसके लिए एक ताजा टमाटर लें और उसे भी चूल्हे या गैस की आंच पर सीधे भून लें। टमाटर की ऊपरी पतली परत जब सिक कर जल जाए, तो उसका छिलका अलग कर लें और फिर गूदे को रेरुया के मिश्रण के साथ हाथों से अच्छी तरह मिला दें। हालांकि मीना द्विवेदी बताती हैं कि बिना टमाटर के केवल रेरुया, लहसुन, मिर्च और नमक के साथ तैयार किया गया सादा भर्ता भी अपने मूल स्वाद में बेहद लाजवाब लगता है। घर में बेहद आसानी से उपलब्ध होने वाली एक साधारण सब्जी से इस तरह का स्वादिष्ट पारंपरिक व्यंजन तैयार हो जाता है, जिसे बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक बड़े चाव से खाते हैं।\n\nशहरी रसोई में भी बढ़ रही है पारंपरिक व्यंजनों की मांग\nबघेलखंड का यह सादा और देहाती भर्ता केवल अपनी सरलता के लिए ही नहीं, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बहुत लाभकारी माना जाता है क्योंकि इसमें भारी तेल और अत्यधिक मसालों का उपयोग बिल्कुल नहीं होता। यही कारण है कि आज गांवों की सीमाओं से निकलकर यह पारंपरिक रेसिपी आधुनिक शहरी घरों की रसोई तक भी अपनी पहचान बना रही है। जब भी भागदौड़ भरी जिंदगी में कम समय में कुछ पौष्टिक, हल्का और अलग स्वाद चखने का मन हो, तो चूल्हे या गैस पर भुनी रेरुया से तैयार यह भर्ता एक बेहतरीन विकल्प साबित होता है। यह सादी थाली को भी एक खास क्षेत्रीय पहचान और पारंपरिक बघेली स्वाद से भर देता है।\n\nइसका आप पर असर\nसाधारण हरी सब्जियों से बोर हो चुके परिवारों के लिए यह पारंपरिक बघेली रेसिपी बिना किसी अतिरिक्त खर्च के दैनिक भोजन में नया स्वाद जोड़ने का विकल्प देती है।\n\n• मध्य प्रदेश में: बघेलखंड अंचल के इस पारंपरिक देसी भर्ते से स्थानीय खानपान की धरोहर को बढ़ावा मिलता है और ग्रामीण परंपराएं शहरी रसोई तक पहुंचती हैं। स्थानीय बाजारों में आसानी से मिलने वाली ताजी गिलकी का यह सबसे किफायती और पौष्टिक उपयोग साबित होता है।\n• भारत में: देश भर के परिवारों के लिए यह रेसिपी बिना तेल और मसालों के झटपट तैयार होने वाला एक बेहद सुपाच्य विकल्प उपलब्ध कराती है। जिन घरों में बच्चे या बड़े तरोई की सामान्य सब्जी खाने से बचते हैं, वहां इस स्मोकी भर्ते के जरिए हरी सब्जियों का सेवन आसानी से बढ़ाया जा सकता है।\n• रसोई बजट: इस व्यंजन में किसी महंगे मसाले या तेल की जरूरत नहीं पड़ती, जिससे रसोई का बजट पूरी तरह संतुलित रहता है। घर में पहले से मौजूद लहसुन, नमक और मिर्च से ही पूरी डिश बनकर तैयार हो जाती है।\n• समय की बचत: व्यस्त कामकाजी लोगों के लिए यह विधि महज कुछ ही मिनटों में एक पौष्टिक और स्वादिष्ट साइड डिश तैयार करने की सुविधा देती है। इसे सीधे गैस बर्नर पर भूनकर बिना किसी बर्तन के झंझट के तुरंत परोसा जा सकता है।\n\nऐसा क्यों हुआ\nतरोई या गिलकी की सामान्य रसेदार सब्जी को अक्सर लोग नीरस मानते हैं, जिसके कारण ग्रामीण रसोई में इसे भूनकर नया स्वाद देने का यह पारंपरिक तरीका विकसित हुआ।\n\n• स्वाद में विविधता की जरूरत: लगातार एक जैसी सब्जी खाने से पैदा होने वाले उबाऊपन को दूर करने के लिए बघेलखंड के ग्रामीणों ने गिलकी को सीधे आंच पर भूनने की शुरुआत की। चूल्हे की आंच पर पकने से सब्जी में सौंधापन आ जाता है और उसका चिपचिपापन पूरी तरह खत्म हो जाता है।\n• लहसुन का आंतरिक संयोजन: भूनने से पहले रेरुया के भीतर लहसुन की कलियां गाड़ देने से गर्मी सीधे लहसुन तक पहुंचती है और उसकी तीखी गंध मधुर सौंधेपन में बदल जाती है। इस देशी तकनीक से सब्जी के हर रेशे में लहसुन का स्वाद प्राकृतिक रूप से समा जाता है।\n• सुलभ संसाधनों का उपयोग: विंध्य क्षेत्र के ग्रामीण घरों में गिलकी और लहसुन बाड़ियों में प्रचुरता से उपलब्ध रहते हैं, जिससे बिना बाजार जाए तुरंत ताजा व्यंजन बनाने की परंपरा ने जन्म लिया। यह विधि कम सामग्री में सबसे स्वादिष्ट व्यंजन परोसने की देहाती समझ को दर्शाती है।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. रेरुया किस सब्जी को कहा जाता है?\nरेरुया बघेलखंड में गिलकी या तरोई को कहा जाता है, जो एक सामान्य हरी बेल वाली सब्जी है।\n\n2. रेरुया का भर्ता बनाने की यह विधि किसने साझा की है?\nयह पारंपरिक विधि मध्य प्रदेश के सतना निवासी मीना द्विवेदी ने साझा की है।\n\n3. भूनने से पहले रेरुया में लहसुन क्यों गाड़ा जाता है?\nलहसुन की कलियां अंदर तक पकने के बाद भर्ते का सौंधा स्वाद और खुशबू दोनों कई गुना बढ़ा देती हैं।\n\n4. क्या रेरुया के भर्ते में टमाटर मिलाना जरूरी है?\nटमाटर मिलाना पूरी तरह वैकल्पिक है; अधिक चटपटा स्वाद चाहने वाले भुना हुआ टमाटर मिला सकते हैं, हालांकि बिना टमाटर के भी यह बहुत स्वादिष्ट बनता है।\n\n5. इस भर्ते को मसलने के लिए किस तरीके की सलाह दी जाती है?\nसभी सामग्रियों को चम्मच या मिक्सी के बजाय हाथों से अच्छी तरह मसलने की सलाह दी जाती है ताकि सभी चीजें पारंपरिक रूप से एकसार मिल सकें।",
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  "category": "जीवनशैली",
  "publishedAt": "2026-10-12",
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    "रेरुया का भर्ता",
    "बघेलखंडी व्यंजन",
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