# सत्ता में 25 साल पूरे होने पर चर्चा में आईं मां हीराबेन की वे नसीहतें जिन्होंने गढ़ा प्रधानमंत्री का व्यक्तित्व

> शासन व्यवस्था में 25 वर्ष का सफर पूरा करने के मौके पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के जीवन को दिशा देने वाली उनकी मां हीराबेन की सादगी, ईमानदारी और सेवा से जुड़ी प्रमुख सीखें फिर सुर्खियों में हैं.

**Type:** article · **Category:** जीवनशैली · **Published:** 2026-10-07 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/lifestyle/satta-men-25-sala-pure-hone-para-charcha-men-ain-man-heeraben-ki-ve-nasihaten-jinhonne-garha-pradhanamntri-ka-vyaktitva-44644 · **Language:** Hindi
**Tags:** नरेंद्र मोदी, हीराबेन मोदी, जनसेवा दिवस, गुजरात, भारतीय जनता पार्टी, सुशासन, जीवन मूल्य

सार्वजनिक जीवन और शासन व्यवस्था में 25 वर्ष का लंबा सफर तय करने के ऐतिहासिक पड़ाव पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व की बुनियाद एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस खास अवसर को भारतीय जनता पार्टी की तरफ से जनसेवा दिवस के रूप में चिन्हित किया गया है। ढाई दशक के इस कार्यकाल के दौरान देश की नीतियों और व्यवस्था में कई बड़े बदलाव दर्ज किए गए हैं, लेकिन इस पूरे सफर में उनकी सबसे बड़ी नैतिक ताकत उनकी मां हीराबेन मोदी की दी हुई परवरिश रही है। प्रधानमंत्री ने कई अलग-अलग मंचों पर इस बात को रेखांकित किया है कि उनकी मां के सिद्धांतों ने उन्हें एक संवेदनशील नागरिक और समर्पित जनसेवक के तौर पर तराशने का काम किया।

## पद संभालने से पहले मिली थी ईमानदारी की कड़ी हिदायत
सार्वजनिक पद पर बैठने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए शुचिता सबसे बड़ी परीक्षा होती है। जब नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री का पदभार संभालने जा रहे थे, तब उनकी मां ने उन्हें एक बेहद सरल किंतु कड़े अनुशासन से भरी सलाह दी थी। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा था कि कभी किसी से रिश्वत मत लेना। यह एक ऐसा बुनियादी वाक्य था जिसने उनके पूरे प्रशासनिक और राजनीतिक जीवन के सिद्धांतों की दिशा तय कर दी। प्रधानमंत्री ने अक्सर अपने भाषणों और बातचीत में यह दोहराया है कि मां की यह हिदायत उनके जीवन के मूलभूत आचरण का अटूट हिस्सा बन गई, जिसे उन्होंने कभी भी अपने रास्ते से हटने नहीं दिया।

## कठिन परिस्थितियों को मात देने का जरिया बना अनवरत परिश्रम
हीराबेन मोदी का निजी जीवन निरंतर संघर्षों और चुनौतियों से भरा हुआ था। बेहद सीमित संसाधनों और कमजोर आर्थिक हालात के बावजूद उन्होंने कभी हिम्मत नहीं हारी और लगातार मेहनत करते हुए अपने पूरे परिवार की जिम्मेदारी उठाई। इस कठिन दौर से उन्होंने अपने बच्चों को यह सबक दिया कि दुनिया में कोई भी मुश्किल ऐसी नहीं है जिसे कड़ी मेहनत से हल न किया जा सके। प्रधानमंत्री के मुताबिक उनकी मां का मानना था कि विषम हालात से बाहर निकलने का सबसे सटीक और अचूक रास्ता सिर्फ और सिर्फ निरंतर परिश्रम करना ही है।

## दिखावे से दूरी और सादगी से सीखी जमीन पर टिके रहने की कला
आधुनिक जीवन में जहां वैभव और संपत्ति को प्रतिष्ठा का पैमाना माना जाता है, वहीं हीराबेन का पूरा जीवन सादगी की मिसाल बना रहा। उनके पास न तो कोई बड़ी संपत्ति थी और न ही उन्हें महंगे आभूषणों या दिखावे वाली चीजों का कोई शौक था। उन्होंने ताउम्र एक बेहद साधारण दिनचर्या अपनाई। इसी आचरण को देखकर नरेंद्र मोदी ने यह सीखा कि सत्ता या प्रभाव के शिखर पर पहुंचने के बाद भी इंसान को हमेशा जमीन से जुड़ा रहना चाहिए और विनम्रता को कभी नहीं छोड़ना चाहिए। अपनी मां के 100वें जन्मवर्ष के मौके पर लिखे गए एक भावुक ब्लॉग में भी उन्होंने इस सादगी भरे जीवन के प्रभावों का विस्तार से उल्लेख किया था।

## अन्न की बर्बादी रोकने और भोजन के आदर का नियम
परिवार के भीतर संसाधनों की कद्र करना सिखाने के लिए हीराबेन का नियम बेहद सख्त और स्पष्ट था। वह अपने बच्चों को बचपन से यह समझाती थीं कि अपनी थाली में उतना ही भोजन परोसना चाहिए जितना खाया जा सके। भोजन का एक भी दाना बर्बाद करना उनके उसूलों के खिलाफ था और वह स्वयं भी इस नियम का कड़ाई से पालन करती थीं। प्रधानमंत्री ने इस बात को कई बार साझा किया है कि बचपन में मिले इस संस्कार ने उन्हें जीवन भर अन्न और संसाधनों के प्रति सजग और आदर भाव से युक्त बनाए रखा।

## जीव मात्र के प्रति दया, करुणा और सेवा की भावना
हीराबेन का सरोकार केवल अपने परिवार तक सीमित नहीं था, बल्कि वह पूरे समाज और मूक प्राणियों के प्रति भी उतनी ही संवेदनशील थीं। गर्मियों के दिनों में पक्षियों के लिए पानी का प्रबंध करना, रोज गायों के लिए रोटी निकालना और अपने आसपास के किसी भी जरूरतमंद इंसान की मदद के लिए तत्पर रहना उनके रोजमर्रा के स्वभाव का हिस्सा था। इन्हीं आदतों को देखते हुए प्रधानमंत्री के भीतर समाज सेवा, कमजोरों के प्रति करुणा और नागरिक जिम्मेदारी की गहरी भावना विकसित हुई। इसके साथ ही उन्होंने यह भी साबित किया कि किसी व्यक्ति के पास औपचारिक शिक्षा की डिग्री न होने के बावजूद वह व्यावहारिक रूप से बेहद ज्ञानवान और समझदार हो सकता है, यही वजह रही कि उन्होंने हमेशा ज्ञान और शिक्षकों का आदर करने की सीख दी।

## इसका आप पर असर
सार्वजनिक पदों पर बैठे प्रतिनिधियों और सामान्य नागरिकों के लिए ये सीखें प्रशासनिक शुचिता, मितव्ययिता और नागरिक दायित्व के व्यावहारिक नियम तय करती हैं।

- **भारत में:** देश भर के नागरिकों और जनसेवकों को यह संदेश मिलता है कि भ्रष्टाचार से दूरी और सादगी ही लंबी सार्वजनिक सेवा का मुख्य आधार है। इसे अपनाकर लोग अपने दैनिक जीवन में ईमानदारी और समाज सेवा की भावना को मजबूत कर सकते हैं।
- **दैनिक जीवन में:** भोजन और संसाधनों की बर्बादी रोकने की सीख हर परिवार के बजट और पर्यावरण संतुलन के लिए उपयोगी है। लोग अपनी थाली में जरूरत के मुताबिक भोजन लेकर अन्न के सम्मान की शुरुआत अपने घर से कर सकते हैं।
- **कार्यक्षेत्र में:** कठिन परिस्थितियों में हताश होने के बजाय निरंतर परिश्रम को समाधान मानने का दृष्टिकोण युवाओं के करियर में सहायक है। यह सोच कार्यस्थल पर चुनौतियों का सामना करने के लिए मानसिक दृढ़ता प्रदान करती है।
- **सामाजिक स्तर पर:** बेजुबान जीवों और जरूरतमंदों की मदद करने का व्यवहार समाज में आपसी सहयोग और संवेदनशीलता को बढ़ावा देता है। गर्मियों में पक्षियों के लिए पानी रखना और पड़ोसियों की सुध लेना एक बेहतर समाज का निर्माण करता है।

## ऐसा क्यों हुआ
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सत्ता में 25 वर्ष का कार्यकाल पूरा करने पर उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि और नैतिक मूल्यों की चर्चा फिर से सामने आई है। इस ऐतिहासिक अवसर पर उनकी मां हीराबेन द्वारा दिए गए संस्कारों को उनकी कार्यशैली की असली बुनियाद के रूप में देखा जा रहा है।

- **सत्ता में 25 वर्षों की पूर्णता:** नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक शासन व्यवस्था में 25 साल पूरे होने के अवसर को पार्टी स्तर पर जनसेवा दिवस के रूप में रेखांकित किया गया। इस मील के पत्थर पर उनकी प्रशासनिक सफलता के पीछे मौजूद नैतिक प्रेरणाओं की समीक्षा की गई।
- **शुरुआती दौर का पारिवारिक संघर्ष:** हीराबेन मोदी का जीवन बेहद साधारण और आर्थिक तंगी के बीच बीता, जिससे उन्होंने अपने बच्चों को संघर्षों का सामना परिश्रम से करने का व्यावहारिक पाठ पढ़ाया। इस पारिवारिक पृष्ठभूमि ने प्रधानमंत्री के दृष्टिकोण को गहराई से प्रभावित किया।
- **संवैधानिक दायित्व की शुरुआत:** जब नरेंद्र मोदी पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बनने जा रहे थे, तब उनकी मां ने उन्हें भ्रष्टाचार से पूरी तरह दूर रहने का स्पष्ट निर्देश दिया था। यही नसीहत उनके पूरे राजनीतिक आचरण का केंद्रीय तत्व बनी।

## सवाल-जवाब

### 1. नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक पद पर कितने वर्ष पूरे किए हैं?
नरेंद्र मोदी ने शासन और सत्ता में 25 वर्ष का कार्यकाल पूरा किया है।

### 2. इस अवसर को भारतीय जनता पार्टी ने किस नाम से चिन्हित किया है?
भारतीय जनता पार्टी ने इस दिन को जनसेवा दिवस का नाम दिया है।

### 3. गुजरात का मुख्यमंत्री बनते समय नरेंद्र मोदी को उनकी मां ने क्या सलाह दी थी?
उनकी मां ने उन्हें सख्त हिदायत देते हुए कहा था कि कभी रिश्वत मत लेना।

### 4. हीराबेन मोदी के अनुसार कठिन परिस्थितियों से निपटने का क्या तरीका था?
उनका मानना था कि विषम हालात और मुश्किलों से बाहर निकलने का सबसे अच्छा जरिया निरंतर परिश्रम करना है।

### 5. भोजन और अन्न को लेकर हीराबेन मोदी की क्या सीख थी?
वह हमेशा समझाती थीं कि थाली में उतना ही भोजन लेना चाहिए जितना खा सकें और अन्न को कभी बर्बाद नहीं करना चाहिए।

### 6. प्रधानमंत्री ने अपनी मां की इन सीखों का उल्लेख कहां किया था?
उन्होंने कई भाषणों के अलावा अपनी मां के 100वें जन्मवर्ष पर लिखे एक भावुक ब्लॉग में इन संस्कारों का जिक्र किया था।

## प्रेरणा और सबक
हीराबेन मोदी के जीवन से यह प्रेरणा मिलती है कि विपरीत परिस्थितियों में भी सादगी, ईमानदारी और अनथक परिश्रम के बल पर परिवार और समाज को नई दिशा दी जा सकती है।

- **ईमानदारी से समझौता न करना:** किसी भी पद या जिम्मेदारी पर रहते हुए शुचिता को सर्वोच्च प्राथमिकता दें। रिश्वत और अनुचित लाभ से दूर रहकर ही दीर्घकालिक सम्मान हासिल किया जा सकता है।
- **परिश्रम ही सबसे बड़ा संबल:** आर्थिक या व्यक्तिगत कठिनाइयों का समाधान केवल अनवरत मेहनत में निहित है। बिना रुके प्रयास करने से बड़े से बड़ा संकट हल किया जा सकता है।
- **सादगी और अहंकार से मुक्ति:** प्रतिष्ठा या प्रभाव हासिल करने के बाद भी दिखावे से दूर रहें। विनम्रता और सादा जीवन ही व्यक्ति को समाज से जोड़े रखता है।
- **संसाधनों की कद्र करना:** भोजन और दैनिक संसाधनों की बर्बादी से बचना एक आवश्यक अनुशासन है। अपनी आवश्यकता अनुसार उपयोग करना प्रकृति और समाज दोनों का सम्मान है।
- **मूक प्राणियों और समाज की सेवा:** औपचारिक उपाधियों के बिना भी इंसान संवेदनशील और बुद्धिमान हो सकता है। जरूरतमंदों और पशु-पक्षियों की सेवा करना मानवीय कर्तव्य का हिस्सा है।

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