# सीतामढ़ी के भुतही की पारंपरिक बालूशाही ने खींचा सबका ध्यान, 200 साल पुरानी विरासत का स्वाद सात समंदर पार भी मशहूर

> बिहार के सीतामढ़ी स्थित भुतही गांव की पारंपरिक बालूशाही अपनी खास कारीगरी, शुद्ध छेने और अनूठे स्वाद की बदौलत देश-विदेश तक पहचानी जाती है। पांच पीढ़ियों से चल रहे इस प्रतिष्ठान में रोजाना सैकड़ों लीटर दूध की खपत होती है।

**Type:** article · **Category:** जीवनशैली · **Published:** 2026-10-02 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/lifestyle/sitamarhi-ke-bhutahi-ki-parnparika-balushahi-ne-khincha-sabaka-dhyana-200-sala-purani-virasata-ka-svada-sata-samndara-para-bhi-mas-41558 · **Language:** Hindi
**Tags:** सीतामढ़ी, भुतही बालूशाही, सुंदर मिष्ठान भंडार, पारंपरिक मिठाई, छेना बालूशाही, बिहार पर्यटन, स्थानीय व्यंजन

बिहार के सीतामढ़ी जिले का छोटा सा कस्बा भुतही आज किसी परिचय का मोहताज नहीं है। इस इलाके की पहचान दशकों से चली आ रही एक ऐसी पारंपरिक मिठास से जुड़ी है जिसने राज्य की सीमाओं को पार कर वैश्विक पटल पर अपनी छाप छोड़ी है। करीब 150 से 200 साल पुरानी यह बालूशाही अपनी बेजोड़ शुद्धता और अनूठी पाक शैली के कारण हर उम्र के लोगों की पसंदीदा बनी हुई है। मिट्टी की दीवारों और फूस की छत वाली एक साधारण झोपड़ी से शुरू हुआ यह जायकेदार सफर अब अपनी पांचवीं पीढ़ी तक पहुंच चुका है। सबसे दिलचस्प बात यह है कि बिना किसी केमिकल या प्रिजर्वेटिव के भी यह मिठाई पूरे 10 दिनों तक एकदम ताजी और खाने योग्य बनी रहती है।

## पांच पीढ़ियों से संजोई जा रही है लजीज विरासत
भुतही बाजार के मुख्य केंद्र में स्थित सुंदर मिष्ठान भंडार इस पारंपरिक स्वाद का सबसे पुराना केंद्र माना जाता है। इस ऐतिहासिक दुकान का संचालन फिलहाल स्वर्गीय लक्ष्मी साह के चौथी पीढ़ी के वंशज पवन कुमार संभाल रहे हैं। उन्होंने बताया कि इस कारोबार की आधारशिला उनके परदादा ने रखी थी। शुरुआत में बेहद सीमित संसाधनों के बीच एक छोटी सी झोपड़ी में मिठाई तैयार की जाती थी। धीरे-धीरे स्वाद के पारखियों ने इसकी कारीगरी को सराहा और यह दुकान पूरे क्षेत्र में विख्यात हो गई।

मूल्यों के उतार-चढ़ाव की चर्चा करते हुए पवन कुमार ने बताया कि शुरुआती दौर में इस बालूशाही की दर महज 15 से 20 रुपये प्रति किलोग्राम हुआ करती थी। इसके बाद 1980-85 के दशक के दौरान यह मिठाई 40 से 45 रुपये प्रति किलो की दर पर बिकी। वर्तमान समय में महंगाई और दूध के बढ़ते दामों के बावजूद यह बालूशाही 200 रुपये प्रति किलो के हिसाब से उपलब्ध कराई जा रही है। बदलते दौर के साथ भले ही कीमतें बदली हों, लेकिन इसके पारंपरिक स्वाद और बनाने के तरीकों में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया है।

## मिलावट के दौर में शुद्ध छेने की कारीगरी बनी असली यूएसपी
आमतौर पर देश भर के बाजारों में बनने वाली बालूशाही में मैदा और सूजी का अत्यधिक उपयोग किया जाता है, जिसे बाद में तेल या घी में तला जाता है। इसके विपरीत भुतही की बालूशाही की पूरी बुनियाद शुद्ध छेने पर टिकी है। इस प्रतिष्ठान में पिछले 20 वर्षों से निरंतर सेवाएं दे रहे मुख्य कारीगर राजकुमार साह ने बताया कि वे किसी भी सूरत में मिल्क पाउडर या बाजार के मिलावटी तत्वों को हाथ तक नहीं लगाते। यहां केवल शुद्ध भैंस के दूध से ही छेना निकाला जाता है।

मिठाई के संतुलन को समझाते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि 7 किलो छेने में मात्र 200 से 300 ग्राम सूजी मिलाई जाती है ताकि मिठाई खिलकर सही आकार ले सके। इसके अलावा पकाने की प्रक्रिया भी पूरी तरह पारंपरिक है। एलपीजी गैस चूल्हों के बजाय इसे गाय के गोबर से बने उपलों और कोयले की भट्टी पर धीमी आंच में पकाया जाता है। इसी पारंपरिक ईंधन से मिठाई में वह सोंधापन आता है जो आधुनिक भट्टियों में कभी नहीं मिल सकता।

## रोजाना 800 लीटर दूध की खपत और चीनी की चाशनी में पकने का हुनर
इस ग्रामीण केंद्र पर बालूशाही की मांग किस कदर है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि केवल एक ही दुकान में हर दिन 8 क्विंटल यानी 800 लीटर शुद्ध दूध की सीधी खपत होती है। आसपास के ग्रामीण इलाकों जैसे बिसनपुर और संपुर के स्थानीय दूध विक्रेता हर सुबह ताजा दूध सीधे दुकान पर पहुंचाते हैं। कारीगरों की अनथक मेहनत और ग्राहकों के भरोसे के चलते यहां प्रतिदिन 6 से 7 क्विंटल बालूशाही तैयार होती है और हाथों-हाथ बिक जाती है।

इस मिठाई को पकाने की तकनीक भी बेहद अलग और सेहत के लिहाज से खास है। इसे घी या रिफाइंड तेल में डीप फ्राई करने का कोई चलन नहीं है। 10 किलो छेने से तैयार गोटियों को पकाने के लिए करीब 20 किलो चीनी की गाढ़ी चाशनी तैयार की जाती है। यह पूरी मिठाई इसी खौलती चाशनी के अंदर पकती है। तेल या घी का इस्तेमाल बिल्कुल न होने के कारण यह स्वाद में भारी नहीं लगती और आसानी से पच जाती है।

## देश के कोने-कोने से लेकर विदेशों तक पहुंच रही मिठास की सौगात
भुतही की इस अनोखी बालूशाही की शेल्फ लाइफ बहुत लंबी है। बिना किसी प्रिजर्वेटिव के पूरे 10 दिनों तक खराब न होने की खूबी इसे यात्रा के लिए सबसे मुफीद मिठाई बनाती है। यही कारण है कि जब भी स्थानीय निवासी अपने रिश्तेदारों से मिलने किसी अन्य शहर या परदेस जाते हैं, तो भुतही की बालूशाही को उपहार के तौर पर साथ ले जाना उनकी पहली पसंद होती है। सीतामढ़ी आने वाले पर्यटक और देश से बाहर रहने वाले प्रवासी भारतीय इसे खास डिब्बों में पैक करवाकर अपने साथ ले जाते हैं। सदियों पुरानी यह स्वाद परंपरा आज पूरे बिहार का गौरव बनकर दुनिया भर में अपनी मिठास बिखेर रही है।

## इसका आप पर असर
पारंपरिक मिठाई प्रेमियों और स्थानीय दूध उत्पादकों के लिए भुतही की बालूशाही शुद्धता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक मजबूत उदाहरण पेश करती है।

- **भारत में:** यात्रा या त्योहारों के दौरान लंबी दूरी तक ले जाने के लिए यह 10 दिनों तक बिना खराब हुए सुरक्षित रहने वाला एक बेहतरीन प्राकृतिक विकल्प है। बिना घी या तेल में तले बनने के कारण यह पारंपरिक तली हुई मिठाइयों की तुलना में हल्का मिष्ठान साबित होती है।
- **बिहार और सीतामढ़ी में:** बिसनपुर और संपुर जैसे स्थानीय गांवों के पशुपालकों को रोजाना 800 लीटर दूध की सुनिश्चित खपत के जरिए निरंतर आय का साधन मिलता है। सीतामढ़ी आने वाले पर्यटक और प्रवासी कामगार इसे एक प्रामाणिक स्थानीय सांस्कृतिक सौगात के रूप में खरीद सकते हैं।
- **कीमत और उपलब्धता:** मौजूदा समय में यह शुद्ध मिठाई 200 रुपये प्रति किलो की दर पर आम उपभोक्ताओं के लिए उपलब्ध है। बजट के अनुकूल दर होने से आम लोग इसे त्योहारों और पारिवारिक कार्यक्रमों के लिए आसानी से खरीद सकते हैं।
- **शुद्धता की गारंटी:** बाजार में मिलावटी मावा या केमिकल की चिंताओं के बीच ग्राहक बिना प्रिजर्वेटिव वाली शुद्ध छेने की मिठाई का सुरक्षित उपभोग कर सकते हैं। यह बच्चों और बुजुर्गों के लिए पारंपरिक स्वाद का एक भरोसेमंद विकल्प है।

## ऐसा क्यों हुआ
भुतही की बालूशाही की यह अद्वितीय पहचान इसकी प्राचीन निर्माण पद्धति, शुद्ध सामग्री के चयन और पांच पीढ़ियों के अटूट अनुशासन के समन्वय से संभव हुई है।

- **शुद्ध सामग्री का उपयोग:** इस मिठाई की लोकप्रियता का सबसे प्रमुख कारण मिल्क पाउडर या भारी मैदे के बजाय शुद्ध भैंस के दूध से बने छेने का इस्तेमाल है। 7 किलो छेने में मात्र 200 से 300 ग्राम सूजी मिलाने से इसका मूल दूधिया स्वाद पूरी तरह बरकरार रहता है।
- **पारंपरिक ईंधन और पकाने की विधि:** इसे गैस स्टोव पर पकाने के बजाय कोयले और गाय के गोबर के उपलों की आंच पर पकाया जाता है। इसके साथ ही इसे तेल या घी में तलने के बजाय सीधे खौलती चाशनी में पकाया जाता है, जो इसे अनोखा सोंधापन और टिकाऊपन देता है।
- **स्थानीय आपूर्ति श्रृंखला:** बिसनपुर और संपुर जैसे पड़ोसी ग्रामीण इलाकों से हर सुबह 800 लीटर ताजा दूध पहुंचने की सुदृढ़ व्यवस्था उत्पादन की गुणवत्ता बनाए रखती है। कारीगरों की पीढ़ियों पुरानी निष्ठा इस पारंपरिक स्वाद को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत रखे हुए है।

## सवाल-जवाब

### 1. भुतही की बालूशाही किस दुकान पर मिलती है और इसका संचालन कौन कर रहा है?
यह बालूशाही भुतही बाजार स्थित सुंदर मिष्ठान भंडार पर मिलती है, जिसका संचालन वर्तमान में चौथी पीढ़ी के वंशज पवन कुमार कर रहे हैं।

### 2. भुतही की बालूशाही की मौजूदा कीमत क्या है और पहले यह कितने में बिकती थी?
वर्तमान में यह 200 रुपये प्रति किलो बिक रही है, जबकि 1980-85 के दशक में इसका भाव 40 से 45 रुपये और शुरुआती दिनों में 15 से 20 रुपये प्रति किलो था।

### 3. इस बालूशाही को बनाने में मुख्य सामग्री क्या इस्तेमाल होती है?
यह मुख्य रूप से शुद्ध भैंस के दूध से बने छेने से तैयार होती है, जिसमें 7 किलो छेने में केवल 200 से 300 ग्राम सूजी मिलाई जाती है।

### 4. क्या भुतही की बालूशाही को तेल या घी में तला जाता है?
नहीं, इसे तेल या घी में बिल्कुल नहीं तला जाता, बल्कि 10 किलो छेने को पकाने के लिए करीब 20 किलो चीनी की चाशनी का उपयोग किया जाता है।

### 5. दुकान पर प्रतिदिन कितने दूध की खपत होती है और कितनी बालूशाही बनती है?
दुकान में रोज करीब 8 क्विंटल यानी 800 लीटर दूध की खपत होती है और औसतन 6 से 7 क्विंटल बालूशाही तैयार की जाती है।

### 6. यह बालूशाही बिना खराब हुए कितने दिनों तक सुरक्षित रहती है?
यह मिठाई बिना किसी रासायनिक प्रिजर्वेटिव के पूरे 10 दिनों तक तरोताजा और खाने योग्य बनी रहती है।

## प्रेरणा और सबक
मिट्टी की एक साधारण झोपड़ी से निकलकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने वाली भुतही की यह बालूशाही स्वरोजगार और परंपरा के संरक्षण की प्रेरक मिसाल है।

- **गुणवत्ता से कोई समझौता नहीं:** आधुनिक दौर में मिलावट और शॉर्टकट के बावजूद शुद्ध छेने और पारंपरिक उपलों की भट्टी पर टिके रहना सिखाता है कि शुद्धता ही लंबे समय तक व्यापार को टिकाए रखती है।
- **सीमित साधनों से बड़ी विरासत:** पांच पीढ़ियों पहले झोपड़ी से शुरू हुआ कारोबार यह साबित करता है कि अटूट लगन और हुनर के दम पर स्थानीय उत्पादों को वैश्विक स्तर पर प्रतिष्ठित किया जा सकता है।
- **सामुदायिक विकास का मॉडल:** एक दुकान का फलना-फूलना किस तरह बिसनपुर और संपुर के स्थानीय दूध उत्पादकों और कारीगरों को वर्षों तक निरंतर रोजगार दे सकता है, यह कहानी इसका प्रमाण है।

---
_TrendKia — Har trend, sabse pehle.. Machine-readable view; canonical HTML at the URL above._