# सितंबर में बदलते मौसम के बीच दुधारू मवेशियों की सेहत पर संकट, जानिए डॉक्टर की अहम हिदायतें

> मानसून के बाद सितंबर में बदलते मौसम के कारण गाय-भैंसों में संक्रामक रोगों और परजीवियों का खतरा बढ़ जाता है, जिससे दूध उत्पादन पर असर पड़ता है। पशु चिकित्सक ने समय पर टीकाकरण, डीवॉर्मिंग और चारे के प्रबंधन की सलाह दी है।

**Type:** article · **Category:** जीवनशैली · **Published:** 2026-09-22 · **Source:** TrendKia
**Canonical:** https://trendkia.com/lifestyle/sitnbara-men-badalate-mausama-ke-bicha-dudharu-maveshiyon-ki-sehata-para-snkata-janie-doktara-ki-ahama-hidayaten-36593 · **Language:** Hindi
**Tags:** पशुपालन, दुधारू पशु, गाय भैंस, पशु रोग, डीवॉर्मिंग, हरा चारा, सीधी, टीकाकरण

मानसून की विदाई और सितंबर के महीने में मौसम के करवट लेते ही दुधारू मवेशियों के स्वास्थ्य पर गंभीर प्रतिकूल असर पड़ने की संभावना बढ़ जाती है। वातावरण में आने वाले बदलावों के कारण गायों और भैंसों में आंतरिक परजीवियों यानी पेट के कीड़ों, बाहरी परजीवियों जैसे चिचड़ी और किलनी के साथ-साथ कई संक्रामक रोगों का प्रकोप तेजी से फैलता है। सीधी वेटरनरी अस्पताल के पशु चिकित्सक डॉ. सलिल कुमार पाठक के अनुसार, इन बीमारियों की चपेट में आने से मवेशी न केवल शारीरिक रूप से कमजोर होने लगते हैं, बल्कि उनके दूध देने की क्षमता में भी भारी गिरावट दर्ज की जाती है।

## पेट के कीड़ों की रोकथाम और डीवॉर्मिंग के नियम
बरसात के बाद पशुओं के पेट में कीड़े होना एक बेहद आम लेकिन नुकसानदेह समस्या बन जाती है। जब मवेशियों के पेट में कीड़े पनपते हैं, तो वे चारा सामान्य रूप से खाते तो हैं, लेकिन उस चारे में मौजूद जरूरी पोषक तत्वों को उनका शरीर पूरी तरह ग्रहण नहीं कर पाता। पोषक तत्वों की कमी के कारण जानवर धीरे-धीरे कमजोर होने लगता है और इसका सीधा असर दुग्ध उत्पादन पर पड़ता है। डॉ. सलिल कुमार पाठक बताते हैं कि इस स्थिति से बचने के लिए पशुओं को नियमित अंतराल पर पेट के कीड़े मारने की दवा यानी डीवॉर्मिंग कराना अत्यंत आवश्यक है। हालांकि पशुपालकों को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि गाभिन और खाली पशुओं के लिए दवा की खुराक और उसकी किस्म बिल्कुल अलग होती है, इसलिए बिना किसी पशु चिकित्सक के परामर्श के अपने स्तर पर कोई भी दवा देने से बचना चाहिए।

## चिचड़ी, किलनी और मच्छरों से मवेशियों का बचाव
बरसात के मौसम के समापन पर मवेशियों के शरीर पर चिचड़ी और किलनी जैसे परजीवी चिपक जाते हैं, जो लगातार उनका खून चूसकर उन्हें भीतर से दुर्बल बना देते हैं। इसके अतिरिक्त बारिश के पानी के जमाव और नमी के चलते पशुशालाओं में मच्छरों की तादाद भी बेतहाशा बढ़ जाती है, जिससे जानवरों को लगातार परेशानी होती है। इन बाह्य परजीवियों और मच्छरों से सुरक्षा के लिए पशुपालकों को अपने बाड़े की नियमित सफाई पर विशेष ध्यान देना चाहिए। पशुशाला में कीटनाशक व परजीवी रोधी दवाओं का उचित छिड़काव करने के साथ-साथ मवेशियों के शरीर पर आवश्यक चिकित्सीय उपचार अपनाना चाहिए ताकि संक्रमण के फैलाव को रोका जा सके।

## गलघोंटू और लंगड़ा बुखार जैसे संक्रामक रोगों से बचाव
इस संक्रमण काल में पशुओं में गलघोंटू, लंगड़ा बुखार और खुरपका-मुंहपका जैसी जानलेवा संक्रामक बीमारियों के फैलने का जोखिम सबसे अधिक रहता है। यदि किसी कारणवश मानसून शुरू होने से पहले पशुओं का नियमित टीकाकरण पूरा नहीं कराया जा सका था, तो अब इसमें तनिक भी देरी नहीं की जानी चाहिए। समय पर लगाया गया टीका पशुओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है और उन्हें इन गंभीर और जानलेवा संक्रमणों से सुरक्षित रखने में मदद करता है।

## हरे चारे का प्रबंधन और साइलेज निर्माण
सितंबर माह के बीतने के साथ ही खेतों में ज्वार, बाजरा और मक्का जैसे खरीफ सत्र के हरे चारे की उपलब्धता धीरे-धीरे घटने लगती है। दूसरी तरफ रबी सत्र के चारे जैसे बरसीम, जई और रिजका के उगने और चारे के रूप में तैयार होने में अभी काफी वक्त लगता है। ऐसे संक्रमण काल में हरे चारे की भारी किल्लत पैदा हो सकती है, जो मवेशियों के दूध उत्पादन को सीधे तौर पर प्रभावित करती है। इस कमी से निपटने के लिए यदि खेतों में ज्वार, बाजरा या मक्का की फसल अभी खड़ी है, तो उसे काटकर साइलेज बनाकर सुरक्षित रख लेना बेहद लाभकारी कदम होगा। इसके अलावा इसी महीने के अंतिम दिनों तक पशुपालकों को अपने खेतों में बरसीम, जई और रिजका की बुवाई के लिए जमीन की तैयारी पूरी कर लेनी चाहिए।

## इसका आप पर असर
बदलते मौसम में दुधारू पशुओं की सेहत और दैनिक दूध उत्पादन को गिरने से बचाने के लिए पशुपालकों को तत्काल चिकित्सकीय और प्रबंधन कदम उठाने होंगे।

- **भारत में:** देशभर के पशुपालक यदि समय पर डीवॉर्मिंग और टीकाकरण पूरा नहीं करते, तो मवेशियों की दूध उत्पादन क्षमता घटने से सीधा आर्थिक नुकसान हो सकता है। समय रहते साइलेज बनाकर और शीतकालीन चारे की तैयारी करके चारे के संकट से बचा जा सकता है।
- **सीधी में:** सीधी जिले और आसपास के क्षेत्रों के किसान स्थानीय वेटरनरी अस्पताल से संपर्क करके अपने पशुओं के लिए सही दवा ले सकते हैं। गाभिन पशुओं की सुरक्षा के लिए बिना डॉक्टर की सलाह के दवा देने से बचें।
- **पशु स्वास्थ्य पर:** बाड़े में नियमित सफाई और कीटनाशक छिड़काव करने से पशुओं को चिचड़ी, किलनी और मच्छरों से राहत मिलेगी। इससे जानवर तनावमुक्त रहेंगे और उनकी शारीरिक दुर्बलता दूर होगी।
- **आर्थिक सुरक्षा:** खुरपका-मुंहपका और गलघोंटू जैसी बीमारियों का टीका लगवाने से पशुओं की अकाल मृत्यु और महंगे इलाज के खर्च से बचाव होगा। उचित पोषण मिलने से दूध का दैनिक स्तर भी स्थिर बना रहेगा।

## ऐसा क्यों हुआ
मानसून के समापन और सितंबर में तापमान व नमी के उतार-चढ़ाव के कारण जीवाणुओं, विषाणुओं और परजीवियों के पनपने के लिए अनुकूल परिस्थितियां बन जाती हैं।

- **मौसम में बदलाव और नमी:** बारिश के ठीक बाद वातावरण में बची हुई नमी और बदलता तापमान बैक्टीरिया और कीड़ों के प्रजनन को तेज कर देता है। इसके चलते चारे और पानी के जरिए आंतरिक परजीवी आसानी से जानवरों के पेट में पहुंच जाते हैं।
- **बाह्य परजीवियों का जमावड़ा:** पशुशालाओं में सीलन और जलभराव के कारण मच्छरों और किलनी का फैलाव तेजी से होता है। ये परजीवी पशुओं का खून चूसकर उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को काफी कमजोर कर देते हैं।
- **चारे का मौसमी बदलाव:** खरीफ की फसलों का समय समाप्त होने और रबी के हरे चारे के तैयार न होने के बीच हरे चारे की कमी पैदा हो जाती है। पोषक चारे की कमी और संक्रामक रोगों का मिलाजुला प्रभाव पशुओं के दूध उत्पादन को गिरा देता है।

## सवाल-जवाब

### 1. सितंबर के महीने में पशुओं में कौन से प्रमुख रोग फैलने का खतरा रहता है?
इस मौसम में गलघोंटू, लंगड़ा बुखार, खुरपका-मुंहपका, पेट के कीड़े और चिचड़ी-किलनी जैसी समस्याएं तेजी से फैलती हैं।

### 2. पेट में कीड़े होने पर मवेशियों में क्या लक्षण नजर आते हैं?
पशु चारा तो सामान्य रूप से खाते हैं लेकिन पोषक तत्वों का अवशोषण न होने से कमजोर हो जाते हैं और दूध उत्पादन घट जाता है।

### 3. डीवॉर्मिंग की दवा देते समय किस बात का ध्यान रखना चाहिए?
गाभिन और खाली पशुओं के लिए दवा की खुराक और प्रकार अलग होते हैं, इसलिए डॉक्टर के परामर्श के बाद ही दवा देनी चाहिए।

### 4. मवेशियों को चिचड़ी, किलनी और मच्छरों से कैसे बचाया जाए?
पशुशाला की नियमित साफ-सफाई करें, बाड़े में उचित दवा का छिड़काव करें और पशुओं के शरीर पर जरूरी उपचार अपनाएं।

### 5. सितंबर के बाद हरे चारे की कमी से निपटने के लिए क्या करना चाहिए?
खेत में खड़ी ज्वार, बाजरा या मक्का को काटकर साइलेज बना लें और बरसीम, जई व रिजका की बुवाई की तैयारी शुरू करें।

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