संतान की दीर्घायु का महापर्व जीवित्पुत्रिका: शनिवार को निर्जला उपवास, जानें पूजन की सटीक बेला और पारणा नियम आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रदोष व्यापिनी अष्टमी पर माताएं अपनी संतान की रक्षा के लिए निर्जला व्रत रख रही हैं। जानिए पूजन का शाम का मुहूर्त, सामग्री और अगले दिन पारणा का समय। संतान के सुदीर्घ जीवन, निरोगी काया और अटूट मंगल की कामना के साथ माताओं का कठोर तप जीवित्पुत्रिका यानी जीउतिया के रूप में मनाया जा रहा है। लोक परंपरा में इस कठिन उपवास का विशेष स्थान है, जिसमें माताएं पूरे दिन और रात बिना जल ग्रहण किए साधना करती हैं। तिथि निर्धारण को लेकर उत्पन्न संशयों के समाधान के क्रम में आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की प्रदोष व्यापिनी अष्टमी तिथि का चयन शास्त्रसम्मत माना गया है। ज्योतिषाचार्य पं. राकेश पाण्डेय के अनुसार यह तिथि शनिवार को पड़ रही है, जिसके चलते इसी दिन व्रत अनुष्ठान संपन्न करना सर्वोत्तम विधान है। प्रदोष काल और निर्णयसिंधु के आधार पर तिथि का चयन धर्मग्रंथ निर्णयसिंधु के स्पष्ट निर्देशानुसार, जब प्रदोष काल में अष्टमी तिथि का संयोग बने, तब जीमूतवाहन के पूजन का विधान पूर्ण फलदायी माना जाता है। इसी शास्त्रीय गणना को ध्यान में रखते हुए शनिवार का दिन इस पवित्र अनुष्ठान के लिए सर्वाधिक उपयुक्त ठहराया गया है। माताएं अपने पुत्रों के जीवन की हर बाधा दूर करने और परिवार की खुशहाली के लिए इस संकल्प को धारण करती हैं। शाम की पूजा का शुभ समय और आर्द्रा नक्षत्र व्रत की मुख्य पूजा के लिए शनिवार की शाम का समय निर्धारित किया गया है। ज्योतिषाचार्य पं. राकेश पाण्डेय के अनुसार शाम 4:52 बजे से लेकर 6:20 बजे तक पूजन का श्रेष्ठ काल रहेगा। इस पूरी समयावधि में आर्द्रा नक्षत्र का विशेष संयोग बना रहेगा। इसी शुभ बेला में व्रती महिलाएं पूरे विधि-विधान के साथ कुश से निर्मित राजा जीमूतवाहन की प्रतिमा स्थापित कर आराधना करेंगी। यह मान्यता है कि इस विशेष नक्षत्र और मुहूर्त में की गई प्रार्थना संतान के स्वास्थ्य और कल्याण को दृढ़ता प्रदान करती है। पारंपरिक तैयारी और पूजन की मुख्य सामग्री जीउतिया के अनुष्ठान की तैयारी मुख्य व्रत से एक दिन पहले ही आरंभ हो जाती है। परंपरा के अनुसार एक दिन पूर्व ब्रह्ममुहूर्त में फल, अन्न और जल ग्रहण करने का नियम है। इसके उपरांत अष्टमी तिथि के आरंभ होते ही महिलाएं पूरे चौबीस घंटे से अधिक समय तक निर्जला व्रत का पालन करती हैं, जिसमें जल की एक बूंद भी नहीं ली जाती। संध्याकालीन पूजन के लिए कुशा से जीमूतवाहन की आकृति तैयार की जाती है। इस पूजन में पंचामृत, शुद्ध जल, रक्षासूत्र, अक्षत, चंदन, सुगंधित पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करने का विधान है। इसके साथ ही लोक आस्था के अनुसार गीली मिट्टी और गाय के ताजे गोबर से चील तथा सियारिन की आकृतियां बनाई जाती हैं। इन दोनों प्रतीकात्मक प्रतिमाओं के माथे पर लाल सिंदूर का टीका लगाने की अनिवार्य परंपरा है, जिसके बाद अनुष्ठान को आगे बढ़ाया जाता है। व्रतकथा का श्रवण और ब्राह्मण दक्षिणा का विधान मूर्ति पूजन और दीप प्रज्ज्वलन के पश्चात जीवित्पुत्रिका व्रत की पावन कथा का सामूहिक श्रवण किया जाता है। इस कथा में राजा जीमूतवाहन के महान त्याग, परोपकार और नाग वंश की जीवन रक्षा के प्रसंग का वर्णन मिलता है। माताएं अत्यंत भक्ति भाव से इस आख्यान को सुनकर अपने पुत्रों और पौत्रों की दीर्घायु की प्रार्थना करती हैं। अनुष्ठान की पूर्णता पर ब्राह्मण को दान और दक्षिणा भेंट करने का विधान है, जिसे संतान सुख और वंश वृद्धि का आधार माना गया है। अगले दिन पारणा की समयावधि कठिन निर्जला साधना का समापन पारणा के साथ होता है। शनिवार को रखे गए इस उपवास का पारणा अगले दिन यानी रविवार को सुबह 7:27 बजे के बाद करना श्रेयस्कर बताया गया है। व्रती महिलाओं को परामर्श दिया जाता है कि वे पारणा का संकल्प लेते समय अपने स्थानीय पंचांग के सूर्योदय और तिथि समापन समय का भी मिलान अवश्य कर लें। इसका आप पर असर जीवित्पुत्रिका व्रत रखने वाली माताओं और उनके परिवारों के लिए इस पंचांग गणना से पूजा और पारणा के नियम स्पष्ट हो गए हैं। • उपवास का समय: शनिवार को पूरे दिन और रात का निर्जला व्रत रखना होगा। इस दौरान जल की एक बूंद भी ग्रहण नहीं की जाती है। • शाम की पूजा: शनिवार शाम 4:52 बजे से 6:20 बजे के बीच ही जीमूतवाहन का मुख्य पूजन पूरा कर लें। यह समय आर्द्रा नक्षत्र के अंतर्गत सबसे शुभ माना गया है। • पारणा का नियम: रविवार सुबह 7:27 बजे के बाद ही व्रत खोलें। समय से पूर्व पारणा करने से धार्मिक नियमों का उल्लंघन माना जाता है। • स्थानीय पंचांग का मिलान: अपने शहर के सूर्योदय और पंचांग के अनुसार पारणा के समय की पुष्टि अवश्य कर लें। इससे क्षेत्रीय समय के अंतर से होने वाले भ्रम से बचा जा सकेगा। ऐसा क्यों हुआ जीवित्पुत्रिका व्रत की तिथि और समय को लेकर उत्पन्न संशय धर्मग्रंथों में वर्णित प्रदोष व्यापिनी तिथि के नियमों के कारण स्पष्ट किया गया है। • प्रदोष व्यापिनी अष्टमी का संयोग: निर्णयसिंधु ग्रंथ के अनुसार जीमूतवाहन की पूजा केवल उसी अष्टमी में की जाती है जो प्रदोष काल को स्पर्श करती हो। शनिवार को यह खगोलीय स्थिति पूर्ण रूप से निर्मित हो रही है। • आर्द्रा नक्षत्र की उपस्थिति: शाम 4:52 बजे से 6:20 बजे के बीच आर्द्रा नक्षत्र का प्रबल प्रभाव रहेगा। इस नक्षत्र को शास्त्रों में कल्याणकारी अनुष्ठानों के लिए विशेष रूप से फलदायी माना गया है। • परंपरा और शास्त्र का समन्वय: ज्योतिषाचार्य ने विभिन्न पंचांगीय गणनाओं का मिलान कर शनिवार का दिन पूजा और रविवार सुबह का समय पारणा हेतु श्रेष्ठ तय किया है। इससे तिथि के फैलाव को लेकर श्रद्धालुओं की दुविधा समाप्त हो गई। सवाल-जवाब 1. जीवित्पुत्रिका व्रत किस दिन रखा जा रहा है? आश्विन कृष्ण पक्ष की प्रदोष व्यापिनी अष्टमी तिथि मिलने के कारण यह व्रत शनिवार को रखा जा रहा है। 2. शनिवार को जीउतिया पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है? पूजा का शुभ समय शनिवार शाम 4:52 बजे से 6:20 बजे तक है, जब आर्द्रा नक्षत्र रहेगा। 3. जीवित्पुत्रिका व्रत में किन प्रतिमाओं का पूजन किया जाता है? कुश से बनी जीमूतवाहन की प्रतिमा तथा मिट्टी व गाय के गोबर से बनी चील और सियारिन की प्रतिमाओं की पूजा की जाती है। 4. व्रत का पारणा किस समय करना चाहिए? उपवास का पारणा रविवार की सुबह 7:27 बजे के बाद करने का विधान है। https://trendkia.com/lifestyle/sntana-ki-dirghayu-ka-mahaparva-jivitputrika-shanivara-ko-nirjala-upavasa-janen-pujana-ki-satika-bela-aura-parana-niyama-42103 TrendKia — Har trend, sabse pehle.