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  "title": "बालाघाट की टांडा नदी पर बना पुल: जहां कभी नक्सली दलम का खौफ था, अब वहीं से जुड़े तीन राज्य",
  "summary": "मध्य प्रदेश के बालाघाट में जिस टांडा नदी के नाम पर कभी नक्सल दलम सक्रिय था, आज उसी नदी पर बना हाई लेवल ब्रिज एमपी, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ को जोड़ रहा है और इलाके में विकास का नया रास्ता खोल रहा है।",
  "content": "करीब 35 साल तक जिस लाल आतंक ने बालाघाट ही नहीं, पूरे देश के कई हिस्सों को जकड़ रखा था, अब उसका लगभग अंत हो चुका है। बालाघाट में अब नक्सलवाद सिर्फ बीते दौर के किस्सों में सिमट गया है और इसके खात्मे के साथ ही यहां विकास की एक नई उम्मीद जागी है। इसी बदलाव की मिसाल मध्य प्रदेश के बालाघाट से सामने आई है, जहां कभी दहशत का पर्याय रही एक नदी आज तीन राज्यों को जोड़ने का जरिया बन गई है।\n\nसीमावर्ती इलाका और नक्सलियों की पैठ\nबालाघाट अपनी सीमाएं महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ से साझा करता है। इसी भौगोलिक स्थिति का फायदा उठाकर नक्सली इन्हीं रास्तों से बालाघाट में दाखिल होते थे। अपने संगठन को फैलाने के लिए वे अलग-अलग इलाकों में जोन, डिविजन और दलम बनाया करते थे। ऐसा ही एक दलम कभी यहां सक्रिय था, जिसका नाम एक नदी पर रखा गया था। आज उसी नदी पर बना हाई लेवल ब्रिज मध्य प्रदेश के बालाघाट, महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ को आपस में जोड़ता है।\n\nनदी जिसके नाम पर खड़ा हुआ दलम\nबालाघाट के लांजी क्षेत्र से सालेटेकरी की ओर बढ़ते हुए रास्ते में टांडा नदी पड़ती है। देखने में यह एक छोटी सी नदी है, जो मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में बहती है और दोनों राज्यों के बीच प्राकृतिक सीमा भी बनाती है। लेकिन कभी इसी नदी के नाम पर नक्सलियों का एक पूरा दलम काम करता था।\n\nवरिष्ठ पत्रकार अशोक मोटवानी बताते हैं कि यह साल 2009-10 की बात है, जब नक्सलियों ने अपने कार्यक्षेत्र को बढ़ाने के मकसद से एक नया दलम खड़ा किया और उसका नाम टांडा नदी पर रखा। यही वजह रही कि यह टांडा दलम के नाम से पहचाना जाने लगा। इसका दायरा बालाघाट के सालेटेकरी से लेकर देवरबेली इलाके तक फैला हुआ था। इसके ठीक तीन साल बाद नक्सलियों ने एक विस्तार प्लाटुन भी बनाई, जिसका मकसद संगठन को अमरकंटक तक पहुंचाना था। हालांकि सुरक्षा बलों की चौकसी ने उनके इस मंसूबे को कामयाब नहीं होने दिया। समय के साथ सशस्त्र आंदोलन लगातार कमजोर पड़ता गया और आखिरकार टांडा दलम का विलय मलाजखंड दलम में कर दिया गया।\n\nचार करोड़ की लागत से बना पुल\nनक्सल प्रभावित गांवों की दिक्कतों को दूर करने के लिए साल 2017-18 में एलडब्लू योजना के तहत इन इलाकों में खास सुविधाएं देने का काम हुआ। इसी कड़ी में करीब चार करोड़ रुपए की लागत से यह हाई लेवल ब्रिज तैयार किया गया, जिसकी लंबाई करीब 120 मीटर है। पुल बनने से पहले हालत यह थी कि बारिश के चार महीनों तक इस इलाके के लोग बाकी दुनिया से कट कर रह जाते थे। अब इस पुल ने न केवल ग्रामीणों की यह बड़ी परेशानी हल कर दी है, बल्कि सुरक्षा बलों की गश्त को भी रफ्तार दे दी है।\n\nगौरतलब है कि नक्सली हमेशा से सड़क, पुल और नेटवर्क जैसी सुविधाओं का विरोध करते रहे हैं। इनके अभाव में सूचना मिलने के बावजूद सुरक्षा बल समय पर मौके तक नहीं पहुंच पाते थे। लेकिन पुल बन जाने के बाद एंटी नक्सल ऑपरेशन में भी तेजी आई है।\n\nतीन राज्यों की कनेक्टिविटी हुई आसान\nटांडा नदी पर पुल बनने का सबसे बड़ा फायदा आम यात्रियों को मिल रहा है। पहले महाराष्ट्र की ओर से बैहर, मलाजखंड, बिरसा, गढ़ी और छत्तीसगढ़ के कवर्धा, गंडई, छुईखदान तथा खैरागढ़ तक पहुंचने के लिए लोगों को करीब 100 किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी तय करनी पड़ती थी। पुल का काम पूरा होते ही यह फासला काफी घट गया। अब महाराष्ट्र के गोंदिया, एमपी के बालाघाट और छत्तीसगढ़ के कबीरधाम के बीच की दूरी पहले के मुकाबले कहीं आसान हो गई है।\n\nइसका आप पर असर\nयह खबर सीधे तौर पर इस सीमावर्ती इलाके के लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी को छूती है।\n\n• भारत में: नक्सल प्रभावित इलाकों में सड़क और पुल बनने से दूरदराज के गांवों तक विकास और सुरक्षा दोनों पहुंच रही हैं, जो ऐसे ही दूसरे क्षेत्रों के लिए उम्मीद की किरण है।\n• बालाघाट में: टांडा नदी पर पुल बनने से अब बारिश के चार महीनों में भी इलाका कटा नहीं रहेगा और गोंदिया, बालाघाट तथा कबीरधाम के बीच करीब 100 किलोमीटर की अतिरिक्त दूरी की बचत होगी।\n\nसवाल-जवाब\n\n1. टांडा दलम का नाम कैसे पड़ा और यह कब बना?\nनक्सलियों ने साल 2009-10 में अपने कार्यक्षेत्र के विस्तार के लिए नया दलम बनाया और उसका नाम टांडा नदी पर रखा, इसलिए यह टांडा दलम कहलाया।\n\n2. टांडा नदी पर बना पुल कितने रुपए में और कितना लंबा बना है?\nयह हाई लेवल ब्रिज साल 2017-18 में एलडब्लू योजना के तहत करीब चार करोड़ रुपए की लागत से बना है और इसकी लंबाई करीब 120 मीटर है।\n\n3. पुल बनने से लोगों को क्या फायदा हुआ?\nपहले लोग बारिश के चार महीने तक कटे रहते थे, अब वह समस्या हल हो गई है और महाराष्ट्र तथा छत्तीसगढ़ के कई इलाकों तक की करीब 100 किलोमीटर अतिरिक्त दूरी घट गई है।\n\n4. टांडा दलम का आगे क्या हुआ?\nसुरक्षा बलों की चौकसी से नक्सलियों के मंसूबे नाकाम होते गए, सशस्त्र आंदोलन कमजोर पड़ा और आखिरकार टांडा दलम का मलाजखंड दलम में विलय कर दिया गया।",
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  "category": "मध्य प्रदेश",
  "publishedAt": "2026-06-17",
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